फेक न्यूज पर रोक का कानून जरूरी, लेकिन मोदी सरकार का ध्यान नहीं इस ओर, जानें क्यों

भारत में सोशल मीडिया पर मॉर्फ किए और फोटोशॉप किए गए चित्र और वीडियो खूब वायरल होते रहते हैं। बहुत ठोस आंकड़े नहीं हैं, पर यह मानने में गुरेज नहीं कि अपने यहां राजनीतिक तौर पर ‘फेक’ चित्र और वीडियो सोशल मीडिया पर जितनी संख्या में फॉरवर्ड किए जाते हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
फोटो : सोशल मीडिया

भारत में सोशल मीडिया पर मॉर्फ किए और फोटोशॉप किए गए चित्र और वीडियो खूब वायरल होते रहते हैं। बहुत ठोस आंकड़े नहीं हैं, पर यह मानने में गुरेज नहीं कि अपने यहां राजनीतिक तौर पर ‘फेक’ चित्र और वीडियो सोशल मीडिया पर जितनी संख्या में फॉरवर्ड किए जाते हैं, शायद ही किसी अन्य देश में किए जाते हों। वैसे, फैक्टचेकर वेबसाइट्स इनके बारे में रोजाना ही बताते रहते हैं लेकिन तब भी इन्हें फॉरवर्ड किया जाना कहीं नहीं रुकता बल्कि थोड़े-थोड़े दिनों बाद ये फिर फॉरवर्ड किए जाने लगते हैं।

अभी हाल का ही उदाहरण लें। किसानों का आंदोलन जब दिल्ली की सीमा पर पहुंचा था, तो कुछ चित्र वायरल हुए जिसमें सिख किसान हाथ में प्लेकार्ड लिए दिख रहे थे। इसमें अलग खालिस्तान की मांग लिखी हुई थी। हालांकि कई वेबसाइट्सऔर अखबारों ने लिखा कि इस तरह का प्लेकार्ड उस फोटो में अलग से चस्पा किया गया है इसलिए झूठा है, फिर भी इसे लेकर टीका-टिप्पणियों का सिलसिला थम नहीं रहा।

भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय के ट्वीट तो विवादास्पद रहते ही हैं। ऑल्ट न्यूज ने करीब एकदर्जन दफा बताया है कि उनकी फोटो या किसी अन्य नेता के मुंह से कहलवाई गई उनकी बात कैसे गलत है। यही नहीं, ट्विटर तकने फेक न्यूज फैलाते उन्हें पकड़ा है। पर उचित कानून न होने की वजह से उनके खिलाफ कोई उचित दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है। सोशल मीडिया पर सत्ता के मन-मिजाज के माफिक वाले गलत और झूठे पोस्ट पर तो कोई कार्रवाई नहीं होती, पर अगर जरा भी कोई विरोधी स्वर हो और उसे किसी ने रीट्वीट या फॉरवर्ड किया हो, तब भी उसकी गिरफ्तारी तक हो जाती है- भले ही वह पत्रकार हो या एक्टिविस्ट।

देश के गिने-चुने साइबर कानून विशेषज्ञ अधिवक्ता डॉ. पवन दुग्गल ने इसी संदर्भ में संडे नवजीवन के लिए बातचीत करते हुए फेक खबरों से निबटने के लिए कानूनी प्रावधानों की तत्काल जरूरत बताई।

किसान आंदोलन को बदनाम करने के खयाल से खालिस्तान समर्थतों ते मॉर्फ्ड चित्र सोशल मीडिया पर खूब फॉरवर्ड किए गए। इस तरह के प्रोपगंडा का किस तरह प्रतिकार संभव है?

भारत में कोई ऐसा कानून नहीं है जो पूरी तरह फेक न्यूज को लेकर ही हो और इसलिए फेक न्यूज फैलाने पर रुकावट नहीं है। अगर इस मुद्दे पर कुछ न किया गया, तो फेक न्यूज इसी तरह फैलाए जाते रहेंगे और यह देश की संप्रभुता, सुरक्षा और एकता पर विपरीत प्रभाव डालने वाला होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने जब आईटी एक्ट की धारा 66ए को एकपक्षीय मानते हुए निरस्त किया तो उसका व्यापक स्वागत हुआ। क्या आपको लगता है कि यह किसी तरह की गलती थी?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कानून, 2000 की धारा 66-ए को खारिज करने के बाद साइबर शरारत, ट्रॉलिंग, उत्पीड़न और उत्पात काफी बढ़ गए। इन्हें रोकने वाले कानूनी प्रावधान नहीं होने के कारण इस तरह की घटनाएं निश्चित तौर पर काफी बढ़ गईं। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर सही कहा था कि धारा 66-ए संविधान के अनुरूप नहीं है। लेकिन बहुत सोच-विचार के साथ साइबर ट्रॉलिंग, बदमाशी, उत्पीड़न और उत्पात को रोकने वाले कानूनी प्रावधान लाने का दायित्व सरकार पर था। लेकिन 2015 के बाद से अब तक सरकार कोई एक प्रावधान लेकर भी नहीं आई है।

लेकिन सरकार तो जब चाहती है, किसी भी पत्रकार या एक्टिविस्ट को मनमाने ढंग से गिरफ्तार कर लेती है और लगता है कि कोर्ट इसे रोकने में सक्षम नहीं हो पाती।

अभी जो कानूनी संरचना हैं, वे अस्पष्ट हैं और वे सरकार को विस्तृत अधिकारों के उपयोग की अनुमति देते हैं। इसके लिए अधिक चेक एंड बैलेंस बनाए जाने की जरूरत है। सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह एकतरफ तो संप्रभुता के हित का पालन करे और दूसरी तरफ नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करे।

कोई कैसे समझे कि राजनीतिक दलों के आईटी सेल के ट्वीट या वाट्सएप मैसज वास्तिवक हैं?

ट्वीट को लेकर तो इस तरह समझें: अगर कोई ट्वीट आधिकारिक तौर पर सत्यापित ट्विटर हैंडल से आया है, तो उसे जेनुइन ट्वीट मानना चाहिए। वाट्सएप मैसेज को लेकर लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है। अगर आप सत्यापित वाट्सएप मैसेज प्राप्त करते हैं, तो उस पर भरोसा कर सकत हैं। वैसे, यह जानी हुई बात है कि आज के फेक न्यूज के युग में आपको खुद ही ऑनलाइन जाकर पड़ताल करनी होगी कि सच्चाई क्या है। यह ऐसा समय है कि आपको अपनी डिजिटल गतिविधियों के लिए अविश्वास की संस्कृति को अपने दिल-दिमाग में बैठाना होगा।

अगर किसी को सोशल मीडिया पर परेशान किया जाता है या किसी ने धोखा देने के लिए झूठी पहचान वाला कोई एकाउंट बनाया हुआ है, तो आम आदमी को इसके लिए क्या सुरक्षा हासिल है?

आम आदमी कानून लागू करने वाली एजेंसियों के पास रिपोर्ट कर सकता है। गृह मंत्रालय के पोर्टल- www.cybercrime.gov.in पर जाकर ऑनलाइन रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है। सर्विस प्रोवाइडर के जरिये भी शिकायत की जा सकती है। अगर परेशान करने या धोखाधड़ी करने वाल की पहचान मालूम है तो उचित कानूनों के अंतर्गत क्षतिपूर्ति के लिए मुकदमा किया जा सकता है।

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