मजरूह सुल्तानपुरी: जेल से राज कपूर के लिए लिखा गीत, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार
मजरूह सिर्फ शायर या गीतकार नहीं थे। वह अपने दौर के प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण रचनाकार थे। उनके विचार बेबाक थे और वह अपनी शायरी के जरिए सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर लिखते थे, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

आज हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की जयंती है। उनके लिखे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। प्यार, दर्द, दोस्ती और जिंदगी के अलग-अलग रंगों को उन्होंने इतने आसान शब्दों में लिखा कि उनके गीत आम लोगों से सीधे जुड़ गए। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि सत्ता विरोधी शायरी के लिए मजरूह को कई साल जेल में बिताने पड़े। फिर भी उनके तेवर में बदलाव नहीं आया। जेल से ही उन्होंने राज कपूर के लिए मशहरू गाना 'इक दिन बिक जाएगा…' लिखा था।
एक दिलचस्प किस्सा यह भी है कि जिस फिल्मी दुनिया में मजरूह सुल्तापुरी ने पांच दशक से ज्यादा लंबा करियर बनाया, उसमें आने के लिए वह शुरुआत में तैयार ही नहीं थे। उन्हें फिल्मों के लिए गीत लिखना कुछ खास पसंद नहीं था, इसलिए एक मशहूर शायर को उन्हें मनाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी थी।
1919 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्म
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था। उनका असली नाम असरार हसन खान था। उनके पिता पुलिस विभाग में थे और उन्होंने बेटे की पढ़ाई की शुरुआत मदरसे में कराई। आगे चलकर मजरूह ने यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और कुछ समय तक हकीम के तौर पर काम भी किया लेकिन उनका असली लगाव शायरी से था। मुशायरों में उनकी शायरी को लोगों से खूब तारीफ मिली और धीरे-धीरे उन्होंने शायरी को ही अपना रास्ता बना लिया।
जिगर मुरादाबादी ने फिल्मी गीत लिखने के लिए मनाया
मजरूह की शायरी को सबसे ज्यादा दिशा देने वालों में मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी का नाम आता है। साल 1945 में मुंबई के एक मुशायरे में मजरूह ने अपनी शायरी सुनाई। वहां फिल्म निर्माता एआर कारदार ने उन्हें सुना और अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का ऑफर दिया लेकिन मजरूह ने इस ऑफर को ठुकरा दिया। उनका मानना था कि फिल्मी गीत लिखना उनकी शायरी के मुकाबले कमतर काम है। इसके बाद जिगर मुरादाबादी ने उन्हें समझाया कि फिल्मों के लिए लिखने से अच्छी कमाई होगी और इससे वह अपने परिवार की मदद कर सकेंगे। आखिरकार मजरूह इसके लिए तैयार हो गए।
'शाहजहां' के बाद मजरूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा
इसके बाद कारदार उन्हें संगीतकार नौशाद के पास लेकर गए। नौशाद ने मजरूह को एक धुन और उसका मीटर दिया और उस पर कुछ लिखने को कहा। मजरूह ने उसी के आधार पर 'जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के' लिखा। नौशाद को उनका लिखा पसंद आया और इसके बाद 1946 में आई फिल्म 'शाहजहां' से मजरूह के फिल्मी गीतों का सफर शुरू हुआ। इसी फिल्म में उनका लिखा 'जब दिल ही टूट गया' भी था, जिसे के. एल. सहगल ने आवाज दी थी।
'शाहजहां' के बाद मजरूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'अंदाज', 'आर पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55', 'सीआईडी', 'नौ दो ग्यारह', 'काला पानी', 'सुजाता', 'गाइड' और 'ज्वेल थीफ' जैसी फिल्मों के लिए उन्होंने यादगार गीत लिखे। एसडी बर्मन, ओपी नैयर, आरडी बर्मन, नौशाद और कई दूसरे संगीतकारों के साथ उनकी शानदार जोड़ी बनी। इन सभी के साथ मजरूह ने एक से बढ़कर एक लोकप्रिय और अमर गीत दिए।
सत्ता विरोधी शायरी के लिए जेल जाना पड़ा
मजरूह सुल्तानपुरी सिर्फ गीतकार नहीं थे। वह अपने दौर के मशहूर शायर और प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण रचनाकार थे। उनके विचार बेबाक थे और वह अपनी कविताओं के जरिए सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर लिखते थे। देश में 1940 के दशक के आखिर में राजनीतिक माहौल काफी तनावपूर्ण था। मजरूह के वामपंथी विचारों और सरकार की नीतियों पर उनकी तीखी कविताओं के कारण वह भी सरकारी कार्रवाई की चपेट में आ गए। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
कहा जाता है कि जेल में रहते हुए भी मजरूह ने लिखना नहीं छोड़ा। उनके पास परिस्थितियां मुश्किल थीं, लेकिन शब्दों पर उनकी पकड़ पहले जैसी ही मजबूत थी। इसी दौर में उन्होंने वह कविता लिखी, जिसकी पंक्तियां आगे चलकर एक सदाबहार फिल्मी गीत का हिस्सा बनीं। दरअसल मजरूह के जेल जाने के बाद उनके परिवार के सामने आर्थिक परेशानियां बढ़ने लगीं। घर चलाना मुश्किल हो रहा था। लेकिन जेल में होने के कारण उनके पास काम का कोई जरिया नहीं था।
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जेल से ही राज कपूर के लिए लिखा अमर गीत
इसी बीच राज कपूर को मजरूह की मुश्किलों के बारे में पता चला। राज कपूर और मजरूह एक-दूसरे के काम से परिचित थे। राज कपूर मजरूह की मदद करना चाहते थे। कहा जाता है कि राज कपूर ने मजरूह को आर्थिक मदद देने की पेशकश की। लेकिन उन्होंने सीधे पैसे लेने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्हें खैरात नहीं चाहिए, बल्कि काम चाहिए।
मजरूह की बात सुनकर राज कपूर ने उन्हें काम देने का फैसला किया। उन्होंने मजरूह से कहा कि उन्हें एक गीत चाहिए। मजरूह के पास जेल में लिखी हुई अपनी रचना थी, जिसे उन्होंने राज कपूर को दे दिया। हालांकि, यह रचना उस समय तुरंत फिल्मी गीत के रूप में सामने नहीं आई। कई साल बाद राज कपूर ने इसे अपनी फिल्म 'धरम करम' के लिए इस्तेमाल किया। वह गीत था "इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल…"। यह गीत आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। मुकेश की आवाज, आरडी बर्मन का संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों ने इसे ऐसा गीत बना दिया, जिसे कई पीढ़ियां आज भी गुनगुनाती हैं।
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मजरूह ने नई पीढ़ी के लिए भी गीत लिखे
मजरूह को करीब दो साल मुंबई की आर्थर रोड जेल में बिताने पड़े। जेल से निकले तो मुंह में पान दबाया और फिर लिखना शुरू कर दिया। सिर्फ क्रांति की बातें ही नहीं बल्कि इश्क, जुनून, मदहोशी, शोखी, मिलन और जुदाई समेत हर जज़्बात पर कलम चली। यानी जिंदगी के एक एक मोड़ को गीतों में ढाल दिया। वे गीत फिल्मी पर्दे से हो कर आज तक लाखों दिलों में सुरक्षित हैं।
उनके गीत अलग-अलग दौर के हिसाब से बदलते रहे। मजरूह ने नई पीढ़ी के लिए भी गीत लिखे। 'कयामत से कयामत तक' का 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा', 'जो जीता वही सिकंदर' का 'पहला नशा' और 'हम किसी से कम नहीं' जैसे गीत लोगों को काफी पसंद आए। उन्होंने पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में करीब 350 फिल्मों के लिए हजारों गीत लिखे।
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दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार
उनके काम को कई बड़े अवॉर्ड्स मिले। 'दोस्ती' के गीत 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' के लिए उन्हें 1965 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार मिला। साल 1993 में वह दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बने। साहित्य के लिए भी उन्हें गालिब पुरस्कार और इकबाल सम्मान जैसे अवार्ड मिले।
उन्होंने करीब 700 फिल्मों में 3000 से ज्यादा गीत लिखे। मजरूह सुल्तानपुरी का निधन 80 साल की उम्र में 24 मई 2000 को मुंबई में हुआ था। भले मजरूह आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनके लिखे गीत फिल्म इतिहास का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
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