‘आनंद’ के लिए नहीं लिखा था योगेश ने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए...’

गीतकार योगेश चले गए। लेकिन उनके गीत हर पीढ़ी की जुबान पर हैं। आनंद फिल्म का कालजयी गीत कहीं दूर जब दिन ढल जाए, योगेश ने किसी और फिल्म के लिए लिखा था. लेकिन वह पूरी नहीं हो पाई, इसके बाद सलिल चौधरी के कहने पर ऋषिकेश मुखर्जी ने इसे आनंद में इस्तेमाल किया।

फोटो : सोशल मीडिया
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इकबाल रिजवी

सलिल चौधरी राजेश खन्ना की फिल्म आनंद का संगीत तैयार कर रहे थे। उन्हेें अचानक एक गीत याद आया जो उन्होंने योगेश से लिखवाया था। उन्होंने गीत आनंद के निर्देश ऋषिकेश मुखर्जी को सुनाया। उन्हें पसंद आ गया। लेकिन राजेश खन्ना ने इस गीत पर नाक भौं सिकोड़ीं। बहरहाल वह किसी तरह इस गीत के लिए मान तो गए, लेकिन इस गीत को बहुत ही अनमने ढंग से फिल्माने पर राजी हुए। नतीजतन सिर्फ 4 घंटे के शूट में मुंबई के जुहू बीच पर इस गीत को फिल्माया गया। यह कालजयी गीत था, कहीं दूर जब दिन ढल जाए....

उम्र महज़ 18 साल और अचानक पिता का साया सिर से उठ गया। मां और दो बहनो की ज़िम्मेदारी कंधों पर लिए अपने पैरों पर ख़ड़ा होने की कोशिश तो की, लेकिन जान पहचान वालों ने परिवार का साथ छोड़ दिया, रिश्तेदारों ने आंखें फेर लीं। हर जगह नकामी मिली। हर रास्ते पर ठोकर खायी। ऐसे कड़े समय में पूरी दुनिया में हौसला बढ़ाने वाले दो ही लोग थे, एक मां और दूसरा स्कूल का साथी सत्य प्रकाश। ये संघर्ष की दास्तान है गीतकार योगेश की।

वो योगेश जिन्होंने हिंदी फिल्मों में रोमांटिक गीतों को नया लहजा दिया।, मौत, तन्हाई और दर्द को इतने सरल और असरदार शब्दों में पिरोया कि पीड़ी दर पीढ़ी उनके गीत गुनगुना रही है। वही योगेश अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार को मुंबई मे उनका निधन हो गया। योगेश ने संख्या के लिहाज़ से कम गीत लिखे, लेकिन उन कम गीतों में बड़ी सूची अमर गीतों की है।

भला कौन फिल्म संगीत प्रेमी भूल सकता है “कहीं दूर जब दिन ढल जाए”, “जिंदगी कैसी है पहेली हाय” (आनन्द), “आए तुम याद मुझे गाने लगी हर धड़कन”, “बड़ी सूनी सूनी सूनी है, जिंदगी ये जिंदगी” (मिली) “कई बार यूं भी होता है, ये जो मन की सीमा रेखा है” (रजनी गंधा)। “ना जाने क्यों होता है ये ज़िंदगी के साथ अचानक ये मन किसी के जाने के बाद करे फिर उसकी याद छोटी छोटी सी बात’ (छोटी सी बात)। और “ना बोले तुम ना मैने कुछ कहा मगर ना जाने ऐसा क्यों लगा” (बातों बातों में)।या फिर बारिश पर तैयार किये गए सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीतों में से एक “ रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन“ (मंज़िल)।

लखनऊ के रहने वाले योगेश को जब लखनऊ में रोजगार का कोई रास्ता नहीं दिखायी दिया तो वे अपने दोस्त सत्यप्रकाश के साथ मुंबई चले आए क्यों कि यहां उनकी बुआ के बेटे बृजेंद्र गौड़ फिल्मों में लेखक के रूप में स्थापित हो चुके थे। और योगेश सोच रहे थे कि बृजेंद्र गौड़ के सहयोग से फिल्म निर्देश के क्षेत्र में काम करने का मौका मिल ही जाएगा। लेकिन योगेश को उनसे कोई मदद नहीं मिली।

पिता की मृत्यु के बाद ज़िंदगी से लड़ते लड़ते कब योगेश के मन में एक गीतकार पैदा हो गया उन्हें पता ही नहीं चला। उनकी कुछ रचनाएं सुन चुके उनके मित्र सत्यपाल ने उन्हें राय दी कि वे गीत लिखें। योगेश राजी हो गए। लेकिन हर दरवाजे से वे वापस कर दिये जाते। आखिरकार 1963 में आयी स्टंट फिल्म सखी राबिन में उन्हें संगीतकार रॉबिन बनर्जी ने मौका दिया।

पहली फिल्म ही सी ग्रेड की मिली तो फिर ऐसी फिल्मों में ही इक्का दुक्का मौके मिलने लगे। मशहूर संगीतकारों की नज़रों में वे सी ग्रेड की फिल्मों के गीतकार थे। इसलिये उन्होंने योगेश को मौके नहीं दिये। लिहाज़ा फिल्मों में प्रवेश मिलने का बाद भी योगेश का कड़ा संघर्ष जारी रहा।

रॉबिन बनर्जी ने ही योगेश का परिचय संगीतकार सलिल चौधरी से कराया। सलिल चौधरी योगेश के गीतों से प्रभावित हुए। उन्होंने योगोश से फिल्म “मिट्टी के देव” के लिए दो गीत लिखवाए, लेकिन फिल्म डब्बा बंद हो गयी। योगोश हताश हो गए, लेकिन किस्मत तो सबकी पलटती है। इसी डिब्बा बंद फिल्म का एक गीत सलिल चौधरी को इतना पसंद था कि उन्होंने फिल्म आनन्द का संगीत देते समय फिल्म के निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से योगेश को गीत को शामिल करने का अनुरोध किया। ऋषिकेश मुखर्जी राजी हो गए वह गीत था “ कहीं दूर जब दिन ढल जाए”। इसी फिल्म में योगोश का एक और गीत शामिल किया गया। “ जिंदगी कैसी है पहेली हाय “।

आनन्द की सफलता ने योगेश को उपेक्षा के अंधेरे से चर्चा के उजाले में ला खड़ा किया। मंद मुस्कान के साथ धीमे लहजे में बात करने वाले योगेश आनन्द की सफलता को उस तरह नहीं भुना सके जिस तरह कोई दूसरा करता। लेकिन सलिल चौधरी ने योगेश की हमेशा परवाह की। उन्हें जो भी फिल्में मिलतीं उनमें योगेश से एक दो गीत ज़रूर लिखवाते थे। 1974 में फिल्म रजनी गंधा में सलिल चौधरी ने योगेश के दो गीतों की बेहद मधुर धुने तैयार कीं। ये दो गीत थे “ कई बार यूं भी होता है, ये जो मन की सीमा रेखा है “ और “ रजनी गंधा फूल तुम्हारे “।

1975 में योगेश और सलिल चौधरी की जोड़ी ने फिल्म छोटी सी बात में एक बार फिर बेहद कर्णप्रिय गीत दिये जैसे “ जानेमन जानेमन तेरे दो नयन “ और“ ना जाने क्यों होता है ये ज़िंदगी के साथ“। इस बीच 1975 में ही फिल्म मिली में योगेश ने यादगार गीतों की झ़ड़ी लगी दी “ मैने कहा फूलों से कि हंसो तो वो खिलखिला के हंस पडे “ , “ बड़ी सूनी सूनी है ज़िंदगी ये ज़िंदगी “ और “ आए तुम याद मुझे गाने लगी हर धड़कन“।

योगेश के गीत श्रोताओं के कान में रस ज़रूर घोल रहे थे लेकिन अस्सी और नब्बे के दश्क में हिंदी सिनेमा में बही हिंसा की आंधी ने बहुत कुछ खत्म कर दिया। इसमें संगीत और गीत भी शामिल थे। फिल्मकार फिल्म संगीत में मैलोडी और अर्थपूर्ण शायरी के पक्षधर नहीं रहे। योगेश और सलिल चौधरी जैसों की मांग घटने लगी। तब योगेश ने टीवी का रूख किया और करीब 150 धारावाहिकों के लिए गीत लिखे। बीच बीच में एक दो फिल्मों में उन्हें गीत लिखने को मिलते थे मगर हिंदी सिनेमा से मैलोडी का दौर खत्म हो चुका था। योगेश गुमनामी के उसी अंधेरे में रहने लगे जिसमें वे करियर के शुरूआती दौर में रह रहे थे।

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