भले ही पेले को फुटबॉल का भगवान कहा जाए, लेकिन सत्य यही, इस खूबसूरत खेल का ईश्वर भी नश्वर है

पेले अपने देश में 2014 विश्व कप के लिए बतौर अमीरात एयर लाइंस के ब्राण्ड अंबेसडर सामने आए थे, हालांकि तब भी उनकी उस उपस्थिति की वैसी प्रतिध्वनि नहीं हुई जैसी कि कतर में उनकी अनुपस्थिति में भी देखी जा रही है।

फोटो: Getty Images
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गौतम भट्टाचार्य

गूगल पर ‘पेले’ खोजें या ‘द किंग’, जैसा कि फुटबॉल दीवाने ब्राजील के चर्चित नाटककार नेल्सन रोड्रिग्स उन्हें उनकी किशोरावस्था में बुलाया करते थे, ज्यादातर फुटबॉल आइकॉन के स्वास्थ्य बुलेटिन ही दिखते हैं जो बीते कुछ सालों में इस महान खिलाड़ी की सेहत के बारे में हुए हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि भले ही पेले को फुटबॉल का भगवान कहा जाए, लेकिन सत्य यही है कि इस खूबसूरत खेल का ईश्वर भी नश्वर है।

लेकिन निश्चित रूप से जो अमर है वह है फुटबॉल की विरासत, ‘खूबसूरत खेल’ के लिए पुर्तगाली ‘जोगो बोनिटो’ है, जिसे वह हमारे लिए छोड़ते हैं। और है वह गुणवत्ता जिसने ब्राजील को फीफा विश्वकप के लिए सबकी पसंद बना डाला। हर चार साल में, विश्वकप के लिए कोई और पसंदीदा बनकर सामने आ सकता है लेकिन फिर-फिर तो ब्राजील आ ही जाता है। ऐसा तथ्य जो पेले बाद वाली पीढ़ी की टीमों पर न सिर्फ दबाव बनाता है, जिको, रोमारियो, रोनाल्डो या नेमार की पसंद भी बनाता है। 

1977 की बात है जब पेले ने अपनी आत्मकथा ‘माई लाइफ एंड द ब्यूटीफुल गेम’ जारी की और समर्पण में लिखा: “मैं यह पुस्तक उन सभी को समर्पित करता हूं जिन्होंने इस महान खेल को सुंदर खेल बनाया।” 

फुटबॉल का इतिहास गवाह है कि पेले के इस खेल में आने से पूर्व पांच विश्वकप हो चुके थे जब जीते जी किंवदंती बन जाने वाले इस खिलाड़ी ने 1958 के स्वीडन विश्व कप में 18 वर्ष की उम्र में कमान संभाली। दो दशक बाद जब उत्तरी अमेरिकी लीग में न्यूयॉर्क कॉसमॉस के साथ शानदार पारी के बाद पेले ने प्रतिस्पर्धी फुटबॉल छोड़ा, तब वह बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी बन चुके थे। अकेला खिलाड़ी जो तीन बार विश्वकप जीत चुका था। चार में खेल कर 1,279 के विपुल स्कोर के साथ अकेले ब्राजील के लिए जड़े गए 77 गोल (92 गेम में) का रिकॉर्ड भी जिसके खाते में था। मील का ऐसा पत्थर जिसे कोई छू न सका और आज नेमार कतर में इसी का शिद्दत से पीछा करते दिख रहे हैं। 

अब यह अगर-मगर की बात भले लगे, फुटबॉल इतिहासकारों को लगता है कि स्पेन, अर्जेंटीना और कोलंबिया का प्रतिनिधित्व करने वाले अर्जेंटीनी आइकॉन अल्फ्रेड डी स्टेफानो विश्वयुद्धों के कारण विश्वकप से दूर नहीं रह गए होते तो शायद तस्वीर कुछ और भी हो सकती थी। आखिरकार 1978 में पेले ने फुटबॉल को अलविदा तो कहा लेकिन शायद डिएगो माराडोना जैसे फुटबाल दिग्गज की तरह सौदेबाजी नहीं की जो ब्राजील की बाजार हिस्सेदारी में भारी सेंधमारी कर चुका था और क्षितिज पर सदी का महानतम फुटबॉलर बनने के मुद्दे पर कहर बरपा रखी थी। इसने उनके रिश्तों में काफी कड़वाहट घोल दी थी। हालांकि बाद में पेले ने ही यह रुतबा बरकरार रखा।

नवंबर, 2020 में माराडोना के निधन पर पेले ने ट्वीट किया: “मैंने आज एक महान दोस्त खो दिया और दुनिया ने एक दिग्गज। बहुत कुछ कहने को है लेकिन अभी इतना ही कि ईश्वर उनके परिवार को हिम्मत दे। उम्मीद है एक दिन हम आकाश में एक साथ फुटबॉल खेलेंगे।” 

शब्द मार्मिक हैं लेकिन सच यही है कि पेले या माराडोना या उनके असहज रिश्तों से नई सहस्त्राब्दी के मोड़ पर अच्छा खासा उबाल था। 2000 में फीफा के ‘प्लेयर ऑफ द सेंचुरी’ पुरस्कार की घोषणा के साथ यह चरम पर पहुंच गया। खेल के विश्व-शासी निकाय ने जनता के लिए अपनी तरह का पहला, एक वैश्विक ऑनलाइन पोल किया जिसे माराडोना ने खूबसूरत अंतर से जीत लिया। 

व्यक्तिगत अनुभव कहते हैं कि ऐसे पोल में पलड़ा अक्सर इसलिए भी कहीं और झुक सकता है कि उस अवधि के ज्यादातर लोगों ने पेले को मैदान में नहीं देखा था (मैंने भी नहीं) जबकि 1986 के विश्वकप में माराडोना के कारनामे सबके जहन में ताजा थे। यह सामान्य बात है जो ऐसे पोल को सचमुच प्रभावित कर सकती है। लेकिन पेले के साथ सिर्फ ऐसा ही नहीं हुआ होगा क्योंकि तब वह न सिर्फ सिस्टम का हिस्सा बल्कि ब्राजील के खेल मंत्री भी थे। बाद में फीफा ने डैमेज कंट्रोल के लिए एक और पोल किया जिसमें पत्रकारों, अधिकारियों और कोच से निर्मित ‘फुटबाल परिवार’ ने वोट डाले और पेले भारी मतों से विजयी हुए। ‘फुटबॉलर ऑफ द सेंचुरी पुरस्कार’ अंतत: पेले और माराडोना के बीच साझा हुआ लेकिन स्वाभाविक रूप से अर्जेंटीना इससे खुश नहीं था। वह समारोह में शामिल हुए, अपना पुरस्कार लिया, इसे अपनी पत्नी और क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो को समर्पित किया और मंच से चले गए, पेले को अपना पुरस्कार लेने के लिए अकेला छोड़कर। 

यहां से शुरू हुआ यह एक ऐसा असहज ‘युद्धविराम’ था जिसके बाद बहस का सिरा धीरे-धीरे मेसी या रोनाल्डो की ओर घूम गया। 2017 के अंत तक पेले बतौर खिलाड़ी माराडोना के अपने आकलन में हो रही चूक को समझने की कोशिश ही कर रहे थे। गोल डॉट कॉम ने पेले के हवाले से कहा: “अब हम यह नहीं कह सकते कि माराडोना बेहतरीन हेडर थे। उन्होंने हेडर से गोल नहीं मारे।” और “हम यह भी नहीं कह सकते कि माराडोना ने दोनों पैरों से बहुत अच्छा शॉट लगाया, क्योंकि उन्होंने अपने दाएं नहीं बल्कि मुख्य रूप बाएं से शूट किया था… इसलिए समय-समय पर, जब लोग तुलना करते हैं तो मैं उसका मजाक बनाता हूं। मेरे लिए वह एक महान खिलाड़ी थे, बस आप माराडोना की तुलना पेले से नहीं कर सकते।” 

यह चैंपियंस का सुपर अहंकार भले हो, इतना तो साफ है कि अल दिएगो से लगातार तुलना ‘ब्लैक पर्ल’ (पेले का एक और उपनाम) के लिए सामान्य बात नहीं थी। हाल के वर्षों में पेले ने कहा भी: “हम हमेशा मजाक करते हैं। मैं हमेशा उनसे कहता हूं: ‘माराडोना जब आप 1,000 से अधिक गोल कर लेंगे तो आप पेले के बराबर हो सकते हैं और वह कहते हैं: “मैं अभी नहीं कर पाया लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।” 

आमतौर पर ‘फुटबॉल के शहर’ के रूप में चर्चित कोलकाता में पले-बढ़े मुझ किशोर को आज भी उस उत्साह की स्मृति है जब 1977 में पेले कॉसमॉस टीम के सदस्य के तौर पर यहां आए। मेरे उत्साह को हवा देने के लिए इतना ही पर्याप्त था कि वह मोहन बागान के खिलाफ खेलने वाले थे और मेरे ज्यादातर दोस्त जिसके कट्टर समर्थक थे। यह मैच खचाखच भरे ईडन गार्डेन में खेला गया और जब पेले अपने प्राइम के बाद पहली बार लगभग 30 मिनट तक पैरों के नीचे गीले मैदान पर खेले, मोहन बागान ने उन्हें  2-2 पर ड्रॉ करके रोक दिया।

पेले 38 साल बाद 2015 में एक बार फिर ‘सिटी ऑफ ज्वॉय’ (कोलकाता) आए। लेकिन तबतक माराडोना शहर के कट्टर फुटबॉल प्रेमियों के बीच ब्राजील और अर्जेंटीना कैंप के तौर पर दरार बना चुके थे। 2008 में साल्ट लेक स्टेडियम की भीड़ से यह जाहिर भी हो चुका था।

पेले जब अपने देश में आयोजित होने वाले 2014 विश्व कप के लिए बतौर अमीरात एयर लाइंस के ब्राण्ड अंबेसडर सामने आए, यह एक अपेक्षित कदम था। हालांकि उनकी उस उपस्थिति की वैसी प्रतिध्वनि नहीं हुई जैसी कि कतर में उनकी अनुपस्थिति में भी देखी जा रही है। नेमार के खिलाड़ी 16वें राउंड के मैच में अपनी आसान जीत के बाद महान खिलाड़ी की फोटो वाले बैनर के साथ ‘जोगो बोनिटो के लिए अपनी प्रार्थनाओं के साथ’ अंदर चले गए- यह एक विरासत है जो परीक्षा के दौर में भी सलामत है।

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