यादों में पृथ्वीराज कपूर: फिल्मों में सफल होने के बाद भी नहीं छोड़ा थिएटर, 112 शहरों में जाकर किए 2,662 शो
पृथ्वीराज कपूर ने 1944 में अपनी थिएटर कंपनी 'पृथ्वी थिएटर्स' की शुरुआत की। उनका मकसद अच्छे नाटक तैयार करना और उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों तक पहुंचाना था।

हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे रहे हैं, जिन्होंने सिर्फ फिल्मों में अभिनय करके ही नहीं, बल्कि थिएटर के जरिए भी अपनी अलग पहचान बनाई। ऐसे ही कलाकारों में पृथ्वीराज कपूर का नाम शामिल है। वह फिल्मों के बड़े सितारे होने के साथ-साथ थिएटर के प्रति भी काफी समर्पित थे। उनकी इस लगन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सांसद बनने के बाद भी उन्होंने अपनी थिएटर टीम के साथ थर्ड क्लास में सफर करना जारी रखा। उनकी कंपनी ने देश के 112 शहरों में 2,662 शो किए और पृथ्वीराज ने हर शो में खुद मुख्य भूमिका निभाई।
पंजाब के समुंदरी में हुआ जन्म
पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब के समुंदरी में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में अधिकारी थे। बचपन से ही पृथ्वीराज को अभिनय और नाटक देखने का शौक था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई पंजाब में की और आगे की पढ़ाई के लिए पेशावर पहुंचे। यहां पढ़ाई के दौरान उनका झुकाव थिएटर की तरफ बढ़ने लगा। उन्होंने कानून की पढ़ाई भी शुरू की, लेकिन अभिनय के शौक के कारण इसे बीच में ही छोड़ दिया।
पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' से मिली पहचान
अपने सपने को पूरा करने के लिए वह 1928 में मुंबई पहुंचे। यहां शुरुआत में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्होंने फिल्मों में छोटे रोल किए और धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। 1930 में आई मूक फिल्म 'सिनेमा गर्ल' से उन्हें एक अभिनेता के रूप में पहचान मिलने लगी। इसके बाद 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' में उन्होंने काम किया। उनकी दमदार आवाज और अभिनय ने दर्शकों का ध्यान खींचा।
फिल्म 'सिकंदर' में सिकंदर का यादगार किरदार निभाया
इसके बाद पृथ्वीराज कपूर ने कई फिल्मों में काम किया। वह कोलकाता के न्यू थिएटर्स से भी जुड़े और वहां कई फिल्मों में अभिनय किया। फिल्म 'विद्यापति' में उनके काम को काफी सराहना मिली। 1941 में आई सोहराब मोदी की फिल्म 'सिकंदर' में उन्होंने सिकंदर का किरदार निभाया। इस भूमिका ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। इसके बाद वह 'आवारा', 'दहेज' और 'मुगल-ए-आजम' जैसी फिल्मों में नजर आए।
1944 में थिएटर कंपनी 'पृथ्वी थिएटर्स' की शुरुआत की
फिल्मों में सफलता मिलने के बावजूद पृथ्वीराज कपूर का थिएटर से लगाव कभी कम नहीं हुआ। 1944 में उन्होंने अपनी थिएटर कंपनी 'पृथ्वी थिएटर्स' की शुरुआत की। उनका मकसद अच्छे नाटक तैयार करना और उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों तक पहुंचाना था। कंपनी का पहला नाटक 'शकुंतला' था। इसके बाद उन्होंने 'दीवार', 'पठान', 'गद्दार', 'आहूति' और 'पैसा' जैसे नाटक पेश किए। इन नाटकों में परिवार, देश के बंटवारे, हिंदू-मुस्लिम एकता, गरीबी और समाज से जुड़े मुद्दों को उठाया गया।
कंपनी के कलाकारों के साथ थर्ड क्लास में सफर
पृथ्वी थिएटर्स का सफर आसान नहीं था। कंपनी को एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था। थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, कंपनी ने 16 साल के सफर में 112 शहरों में कुल 2,662 शो किए। पृथ्वीराज कपूर ने इन सभी शो में मुख्य भूमिका निभाई। वह अपनी टीम के साथ लगातार यात्रा करते थे। कंपनी के कलाकार और दूसरे सदस्य थर्ड क्लास में सफर करते थे और पृथ्वीराज भी उनके साथ ही यात्रा करते थे।
1952 से 1960 तक राज्यसभा के सदस्य रहे
इस दौरान वह राज्यसभा के मनोनीत सांसद भी बने। वह 1952 से 1960 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। सांसद बनने के बाद उन्हें हवाई जहाज या फर्स्ट क्लास में यात्रा करने की सुविधा मिल सकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी थिएटर टीम से अलग सफर करना पसंद नहीं किया। उनके लिए टीम के साथ रहना ज्यादा जरूरी था।
पृथ्वीराज कपूर का निधन 1972 को मुंबई में हुआ
पृथ्वी थिएटर्स 1960 में उनकी खराब सेहत के कारण बंद हो गया। पृथ्वीराज कपूर को भारतीय थिएटर और सिनेमा में योगदान के लिए कई सम्मान मिले। उन्हें 1954 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और 1969 में पद्म भूषण से नवाजा गया। भारतीय सिनेमा और थिएटर के विकास में उनके ऐतिहासिक और अतुलनीय योगदान को देखते हुए पृथ्वीराज कपूर को भारत सरकार ने वर्ष 1971 में प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया था। पृथ्वीराज कपूर का निधन 29 मई 1972 को मुंबई में हुआ। वह कैंसर से पीड़ित थे।
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