यादों में राहत इंदौरीः वो 'फकीर' जिसकी शायरी ने हमेशा सत्ता को दिखाया आईना, आम आदमी के दर्द को दी आवाज
इंटरनेट के दौर में उनकी पुरानी शायरी को नई पीढ़ी ने भी खूब अपनाया। लेकिन इस लोकप्रियता के पीछे दशकों की मेहनत थी। वह केवल इंटरनेट से मशहूर हुए शायर नहीं थे, बल्कि उन्होंने लंबे समय तक देश-विदेश के अनगिनत मुशायरों से अपनी अलग पहचान बनाई थी।

आज उर्दू के मशहरू शायर राहत इंदौरी की पुण्यतिथि है। राहत इंदौरी का नाम आते ही सबसे पहले उनकी वायरल शायरी 'बुलाती है, मगर जाने का नहीं' याद आ जाती है। उनकी शायरी में जिंदगी, रिश्ते और आम आदमी की छोटी से छोटी बातें भी दिखाई देती थीं। मंच पर जब वह अपनी बात कहते थे तो लोग ध्यान से सुनते थे।
उन्होंने शायरी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई, लेकिन उनका एक अनोखा पहलू भी था कि वह खेल में काफी दिलचस्पी रखते थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में खुद बताया था कि शुरुआती दौर में वह खुद को खिलाड़ी के रूप में देखते थे और हॉकी-फुटबॉल दोनों खेलते थे।
इंदौर में जन्म, वहीं बीता बचपन
राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनका असली नाम राहत कुरैशी था। आगे चलकर इंदौर उनकी पहचान का इतना बड़ा हिस्सा बना कि उन्होंने अपने नाम के साथ 'इंदौरी' जोड़ लिया। उनका बचपन इंदौर में ही बीता और इसी शहर ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। उनकी शायरी में बाद में आम लोगों की जिंदगी, शहर और समाज की तस्वीर दिखाई दी।
हॉकी और फुटबॉल दोनों खेलते थे
खेल से लगाव के बारे में खुद राहत इंदौरी ने एक इंटरव्यू में कहा था, ''मैं शुरुआती दिनों में खुद को खिलाड़ी के तौर पर देखता था। मैं हॉकी और फुटबॉल दोनों खेलता था। मैंने स्कूल और कॉलेज के स्तर पर इन खेल टीमों की कप्तानी भी की। उस समय मेरे लिए मैदान सिर्फ खेलने की जगह नहीं था, बल्कि नेतृत्व सीखने की जगह भी था। टीम के दूसरे खिलाड़ियों के साथ खेलना, जिम्मेदारी संभालना और अपनी टीम को आगे ले जाना मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका था। लेकिन, वक्त के साथ मेरा रूझान उर्दू साहित्य और शायरी की तरफ बढ़ा।''
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शायरी में व्यवस्था से सवाल और विरोध
राहत इंदौरी ने उर्दू साहित्य में उच्च शिक्षा हासिल की। आगे चलकर वह मुशायरों के बीच बड़े नाम बन गए। उनकी शायरी में आम आदमी की भाषा थी, इसलिए लोग उनसे जल्दी जुड़ जाते थे। वह मोहब्बत पर लिखते थे तो उनकी पंक्तियां दिल तक पहुंचती थीं और जब समाज या व्यवस्था पर लिखते थे तो उनके शब्दों में सवाल और विरोध साफ नजर आता था।
उनकी शायरी को नई पीढ़ी ने खूब अपनाया
इंटरनेट के दौर में उनकी पुरानी शायरी को नई पीढ़ी ने भी खूब अपनाया। 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' जैसी पंक्ति सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रही। इस पंक्ति के साथ कई तरह के मीम्स बने। लेकिन इस लोकप्रियता के पीछे दशकों की मेहनत थी। वह केवल इंटरनेट से मशहूर हुए शायर नहीं थे, बल्कि लंबे समय तक देश-विदेश के मुशायरों में अपनी अलग पहचान बना चुके थे।
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अनगिनत ऐसे शेर जो बेहद मशहूर हैं
राहत इंदौरी के अनगिनत ऐसे शेर हैं जो बेहद मशहूर हैं। उनमें से कई शेर तो आज सोशल मीडिया के जमाने में खूब इस्तेमाल किए जाते हैं। उनके कुछ मशहूर शेरः अब के जो फैसला होगा वह यहीं पर होगा, हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली, मैं मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पर हिन्दुस्तान लिख देना, बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर, जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाए, सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है।
कई फिल्मों के लिए गाने भी लिखे
राहत इंदौरी ने कई फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। उनके लिखे मुख्य गानों में 'इश्क' का 'नींद चुराई मेरी', 'करीब' का 'चोरी-चोरी जब नजरें मिलीं', 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' का 'छन छन' और 'मर्डर' फिल्म का 'दिल को हजार बार रोका' शामिल हैं। 11 अगस्त 2020 को 70 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। कोरोना संक्रमण के दौरान उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, और अगले दिन उनके निधन की खबर से साहित्य और फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
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