पुण्यतिथि विशेष: राजीव गांधी ने ही रखी थी देश में प्रगति की बुनियाद, तभी बन पाई विदेशों में खास जगह

सच तो यह है कि तमाम बड़े फैसले लेने वाले राजीव गांधी के कारण ही देश बाद में उदारीकरण की राह पर चल सका। बकौल पूर्व पीएम मनमोहन सिंह 1991-92 में आर्थिक उदारीकरण की घोषणा हुई, उस पर भी राजीव गांधी की ही छाप थी।

फोटो : Getty Images
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अरुण शर्मा

राजीव गांधी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे और उनकी सोच भी युवा थी। देश को आईटी क्रांति की राह पर ले जाने वाले वही थे। और सच तो यह है कि तमाम बड़े फैसले लेने वाले राजीव गांधी के कारण ही देश बाद में उदारीकरण की राह पर चल सका। इसके लिए हमें दिसंबर 2018 में जाना पड़ेगा। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी पुस्तक “चेंजिंग इंडिया” के विमोचन के मौके पर लोगों को संबोधित कर रहे थे। तभी डॉ. सिंह ने खुलासा किया कि 1991-92 में आर्थिक उदारीकरण के मुद्दे पर उन्होंने कैसे नरसिंह राव सरकार की कैबिनेट के विरोध को शांत किया था। डॉ. सिंह ने दावा किया कि उन्होंने नरसिंह राव को समझाया था कि उस समय उनकी सरकार कुछ भी नया नहीं करने जा रही थी। यह सब तो पहले से ही सरकार के एजेंडे में था और खुद राजीव गांधी उसे मंजूरी दे चुके थे। यह सुनते ही कैबिनेट ने तत्काल उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

वह काफी हद तक एक निर्दोष दौर था। तब तक किसी भी प्रधानमंत्री की हत्या नहीं की गई थी। यह उसी दौर का एक साल था- 1982 और महीना होगा जुलाई के आसपास का जब मेरी राजीव गांधी के साथ एक छोटी सी मुलाकात हुई। मैं अपनी पत्नी और नन्हे बेटे आदित्य के साथ इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट से पटना से गौहाटी – तब यही नाम हुआ करता था- जा रहे थे। प्लेन ने थोड़ी देर के लिए बागडोगरा में लैंड किया और चाय–स्नैक्स के लिए हम एयरपोर्ट लाउंज चले गए। थोड़ी देर बाद जब हम दोबारा प्लेन में चढ़ रहे थे और हम सीढ़ियों को पार करके प्लेन में घुसने ही वाले थे कि मेरी पत्नी ने कुछ ही सीढ़ियों पीछे राजीव गांधी को चढ़ते देखा। वह उसी प्लेन से जा रहे थे और अगले दिन के अखबार से पता चला कि वह मणिपुर प्रदेश कांग्रेस के निमंत्रण पर इंफाल जा रहे थे। वह असाधारण रूप से आकर्षक थे और हम तो जैसे सुध-बुध खोकर वहीं प्लेन के दरवाजे पर जड़ होकर उन्हें निहार रहे थे। हमारी तंद्रा तब टूटी जब बड़ी ही निश्छल मुस्कान के साथ उन्होंने मेरे बेटे की गाल पर प्यारी सी थपकी लगाई। उन्होंने पायलट के साथ कुछ बातचीत की। शायद उन्होंने साथ काम किया हो। फिर वह विमान की अपनी अगली सीट पर आकर बैठ गए। जो लोग सोचते हैं कि करिश्माई व्यक्तित्व जैसा कुछ नहीं होता, उन्हें राजीव गांधी को सामने से देखना चाहिए था।

जून, 1980 में अपने छोटे भाई संजय गांधी की विमान हादसे में मौत के बाद मां इंदिरा गांधी की मदद के लिए राजीव गांधी राजनीति में आए थे लेकिन उस स्थिति में भी उन्हें यह फैसला लेने में कुछ समय लग गया था। “टॉक्स विद नेहरू” के लेखक और चिकित्सा मानविकी के प्रोफेसर नॉर्मन कजिन्स ने 14 नवंबर, 1984 को दि क्रिश्चियन साइंस मॉनीटर में प्रकाशित एक लेख में यह रहस्योद्घायन किया है कि जनता पार्टी के शासनकाल में जिस तरह इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के खिलाफ जान-बूझकर कार्रवाई की जा रही थी, उससे इंदिरा बेहद दुखी थीं और इसका जिक्र उन्होंने जून 1977 में लिखे एक निजी पत्र में किया था। हालांकि 1980 में इंदिरा जीतकर फिर से सत्ता में आ गईं लेकिन अब वह खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी थीं और संजय गांधी की मृत्यु के बाद तो वह एकदम टूट सी गई थीं। ऐसी मनःस्थिति में उन्होंने राजीव गांधी से मदद की अपेक्षा की और राजीव इनकार नहीं कर सके।

राजीव के राजनीति में आने के तीन साल बाद ही 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों ने ही हत्या कर दी और यह राजीव और देश, दोनों के लिए बड़ा दुखदायी था। बड़ी राष्ट्रीय विपदा की उस घड़ी में तत्काल ही राजीव गांधी को सबसे युवा प्रधानमंत्री के तौर पर देश की बागडोर अपने हाथ में लेनी पड़ी।

राजीव गांधी मानवीय मूल्यों के प्रति बड़े संवेदनशील थे और फिल्म अभिनेत्री व टीवी होस्ट सिमी ग्रेवाल से बातचीत में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया था कि उनमें यह गुण अपने नानाजी जवाहरलाल नेहरू से आया था जिनके साथ किशोर उम्र में वह तमाम विषयों पर बातें किया करते थे। राजीव गांधी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भविष्य की दृष्टि भी नेहरू से ही आई थी। लोकसभा चुनाव में 400 से ज्यादा सीटें जीतकर एक विशाल बहुमत के साथ उन्होंने देश को 21वीं सदी में ले जाने के अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाए। इस लेख की तैयारी करते समय मुझे महसूस हुआ कि राज्यों के मामले हों, या राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय नीति से जुड़े विषय, उनकी उपलब्धियां उल्लेखनीय थीं। यहां मैं उनकी कुछ खास उपलब्धियों का जिक्र करूंगा।

पंजाब और पूर्वोत्तर

प्रधानमंत्री बनते ही राजीव गांधी का पहला टास्क था पंजाब को संभालने का जिसके साथ किसी भी दूसरे राज्य की अपेक्षाकृत कहीं समझदारी से पेश आना था। राजीव गांधी सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय से ही जेल में बंद अकाली नेताओं को रिहा किया। ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन पर लगाया गया प्रतिबंध वापस लिया। सिख-विरोधी दंगे में जांच बैठाई। जनवरी 1985 में राजीव-लोंगोवाल समझौता हुआ। हालांकि स्वर्ण मंदिर से हथियार और हथियारबंद लोगों को निकाल बाहर करने के लिए मई, 1988 में उनकी सरकार को ऑपरेशन ब्लैक थंडर का मुश्किल फैसला भी लेना पड़ा। इन सबका असर यह हुआ कि राजीव गांधी के उस कार्यकाल के अंत तक पंजाब का आतंकवाद लगभग खत्म हो तुका था। 1985 में राजीव गांधी ने असम समझौते पर हस्ताक्षर किया और इससे राज्य में शांति आ सकी। उनकी सरकार ने 1987 में मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को राज्य बनाया।

विदेश मामले

कूटनीति और विदेश मामलों में राजीव गांधी की उपलब्धियां कम नहीं थीं। दिसंबर, 1988 में राजीव गांधी ने चीन के प्रधानमंत्री ली पेंग के निमंत्रण पर चीन की यात्रा की और तब 34 साल के बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर गया था। भारत-चीन संबंधों के लिहाज से यह यात्रा एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी। इसके कारण तत्काल ही चीन के साथ व्यापार में तेजी आ गई और फिर 90 के दशक के आरंभ तक निजी कंपनियों और सरकारी प्रतिष्ठानों के लोग चीन की यात्रा पर जाने लगे। मैं तब नाबार्ड में काम करता था और मुझे याद है कि हमारे यहां से कुछ लोगों की टीम परस्पर प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत 1995 में चीन गई थी। अगर आज हमें चीन का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारी सहयोगी होने का गौरव प्राप्त है तो द्विपक्षीय रिश्तों में इसकी बुनियाद तैयार करने का श्रेय राजीव गांधी को जाता है।

फरवरी, 1987 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक दिल्ली आए और फिर 1988 में प्रधानमंत्री बेनजरी भुट्टो से मिलने के लिए राजीव गांधी खुद भी पाकिस्तान गए जहां दोनों देशों ने 1972 के शिमला समझौते के प्रति वचनबद्धता दोहराई। इसके अलावा जुलाई, 1987 में राजीव गांधी ने भारत-श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर किया जिससे तमिल बहुल इलाके को शक्ति के हस्तांतरण, लिट्टे को भंग करना और तमिल को श्रीलंका की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का वह समझौता दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुआ और इसी के कारण राजीव गांधी की जान भी चली गई।

राष्ट्रीय मुद्दे

राजीव गांधी ने दून स्कूल से शिक्षा पाई थी और उसी की तर्ज पर उन्होंने 1986 में गांवों में जवाहर नवोदय विद्यालय की शुरुआत की जिसमें गांव के बच्चों को छठी से 12वीं कक्षा तक मुफ्त में आवासीय शिक्षा की सुविधा देने की रूपरेखा तैयार की गई। उसी साल उनकी सरकार उच्च शिक्षा के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति लेकर आई।

हालांकि राजीव गांधी को देश को दूरसंचार के काल में ले जाने के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। उन्होंने दूरसंचार की संभावनाओं को महसूस किया और देश में आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए पूर्व रॉकवेल इंटरनेशनल एक्जीक्यूटिव सैम पित्रोदा को सलाहकार नियुक्त किया। कुछ ही समय पहले गठित सेंटर फॉर डोवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (सी-डॉट) मुख्य भूमिका में आ गया। डिजिटल एक्सचेंज की रूपरेखा तैयार करने और इसे स्थापित करने के मूल उद्देश्य के साथ गठित सी-डॉट का बाद में दायरा बढ़ाते हुए इसमें कंप्यूटर सॉफ्टवेयर तैयार करना भी शामिल कर दिया गया। पूर्णतः असेंबल्ड मदर बोर्ड आयात करने के उनके फैसले से देश में कंप्यूटर की कीमत काफी नीचे आ गई। इस तरह राजीव गांधी के कार्यकाल में देश में आईटी क्रांति का बीजारोपण किया गया।

सैम पित्रोदा के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर से जबर्दस्त दबाव था कि भारत दूरसंचार सेवाओं में विकास की योजना को छोड़ दे लेकिन राजीव गांधी पर इसका कोई असर नहीं हुआ और भारत के विकास में यह एक बड़ा कारक रहा। पित्रोदा कहते हैं कि दूरसंचार क्षेत्र राजीव गांधी की मदद से ही फैल सका और इसी कारण 2007 आते-आते भारत में हर महीने 60 लाख फोन जुड़ने लगे।

दिसंबर 2018 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “चेंजिंग इंडिया” के विमोचन के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस मौके पर डॉ. मनमोहन सिंह ने इस बात का खुलासा किया कि 1991-92 में आर्थिक उदारीकरण के आरंभिक चरण में औद्योगिक नीति को उदार बनाने के मुद्दे पर उन्होंने कैसे नरसिंह राव सरकार की कैबिनेट के विरोध को शांत किया था। डॉ. सिंह ने दावा किया कि उन्होंने नरसिंह राव को समझाया था कि उस समय उनकी सरकार कुछ भी नया नहीं करने जा रही थी। वे लोग उस समय जो करने के बारे में सोच रहे थे, वह तो पहले से ही सरकार के एजेंडे में था और खुद राजीव गांधी उसे मंजूरी दे चुके थे और उनकी इच्छा देश को उदारीकरण के रास्ते पर ले जाने की थी। यह सुनते ही कैबिनेट ने तत्काल उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इस तरह कहा जा सकता है कि 1991-92 में जो आर्थिक उदारीकरण की घोषणा हुई, उसपर भी राजीव गांधी की ही छाप थी।

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