हिदीं साहित्य में चल रहा आशा और अपेक्षा का विवाद, जानने और न जानने को लेकर सोशल मीडिया पर बहस 

इसकी शुरुआत हुई इस दुखद सूचना से कि समकालीन हिदीं कहानी के प्रमुख हस्ताक्षर और पत्रकार शशिभूषण द्विवेदी का 7 मई को निधन हो गया। ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार और कथाक्रम कहानी पुरस्कार से सम्मानित शशिभूषण की भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित ‘ब्रह्महत्या और अन्य कहानियां’ काफी चर्चित रही हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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राम शिरोमणि शुक्ल

आप किसी को जानते हैं या नहीं, कई दफा यह सवाल नितांत व्यक्तिगत नहीं रह जाता। किसी क्षेत्र में अगर आप प्रसिद्ध या आदरणीय हैं, तो आम तौर पर आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप कम-से-कम पिछली-अगली पीढ़ियों के लोगों के कामों को जानते तो होंगे ही। इसे आप पीढ़ीगत अपेक्षा भी कह सकते हैं और आदर देने तथा सम्मान करने की आशा भी मान सकते हैं। कुछ इसी तरह की आशा और अपेक्षा का विवाद इन दिनों हिदीं साहित्य में चल रहा है।

इसकी शुरुआत हुई इस दुखद सूचना से कि समकालीन हिदीं कहानी के प्रमुख हस्ताक्षर और पत्रकार शशिभूषण द्विवेदी का 7 मई को निधन हो गया। ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार और कथाक्रम कहानी पुरस्कार से सम्मानित शशिभूषण की भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित ‘ब्रह्महत्या और अन्य कहानियां’ काफी चर्चित रही हैं। करीब दो साल पहले उनका कहानी संग्रह ‘कहीं कुछ नहीं’ राजकमल प्रकाशन से आया।

प्रमुख लेखक और jankipul.com के संस्थापक-संपादक प्रभात रंजन शशिभूषण के मित्र रहे हैं। शशिभूषण के निधन की सूचना के साथ उन्होंने प्रमुख कवि-कथाकार उदय प्रकाश को फोन किया। इस बातचीत को सार्वजनिक करते हुए उदय प्रकाश ने फेसबुक पर लिखा कि वह शशिभूषण को नहीं जानते। यह बात जब उन्होंने प्रभात रंजन को बताई, तो उन्होंने मुझे गालियां भी दीं।

चूंकि पोस्ट फेसबुक पर था, तो इसे लेकर सोशल मीडिया पर विवाद शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर न जानने और जानने को लेकर न केवल साहित्य जगत बल्कि पाठकों और आम लोगों की भी राय आने लगी। लंबी-लंबी पोस्टों के साथ फेसबुक लाइव तक हुआ। यह फेसबुक लाइव कवि-कहानीकार पंकज सुबीर ने आयोजित किया जिसमें सुधा ओम धींगरा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, गीताश्री, प्रभात रंजन, कुणाल सिंह, महेश्वर दत्त शर्मा, नीरज गोस्वामी और विमल चंद्र पांडेय आदि शामिल रहे। इसमें कहा गया कि हम शशिभूषण को जानते हैं। व्यक्तिगत हमलों की निदां की गई। यह भी तय किया गया कि शशिभूषण को जानते हैं शीर्षक किताब जल्द प्रकाशित की जाएगी। खैर।

इस पूरे प्रसंग की तह में जाने के खयाल से हमने जब उदय प्रकाश से बात करनी चाही, तो उन्होंने कहा कि वह इस पर कुछ भी नहीं कहना चाहते। लेकिन प्रभात रंजन इस पर खुलकर बोले। उन्होंने कहा कि किसी रचनाकार को उसकी रचनाओं से ही जाना जा सकता है। हो सकता है कि उससे भौतिक रूप से मिलने पर वह सुख न मिल पाए जो उसकी रचनाओं के माध्यम से प्राप्त होता है। आखिर, क्या कारण है कि सुदूर मैक्सिको में जब गाब्रिएल गार्सिया मार्केज का निधन हुआ तो मैं वैसे ही शोकाकुल हुआ जिस तरह अपने गुरु मनोहर श्याम जोशी के निधन से हुआ। हम सबको नहीं जान सकते, सबको नहीं पढ़ सकते लेकिन संवेदना के तार से हम आपस में जुड़े रहते हैं।

प्रतिष्ठित कवि, कहानीकार और उपन्यासकार अनामिका ने कहा कि फिलहाल वह अस्वस्थ हैं और उन्हें इस तरह के किसी विवाद की कोई जानकारी नहीं है और जिस बारे में जानकारी न हो, उस पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं है। फिर भी, उन्होंने यह जरूर कहा कि ज्यादा अच्छा यह होता है कि किसी लेखक के बारे में व्यक्तिगत बातचीत के बजाय उसके लेखन पर बात हो। लेकिन कथाकार और पत्रकार गीताश्री इस पूरे विवाद पर खुलकर बोलीं। उन्होंने कहा कि शशिभूषण हमारे समय के प्रखर कथाकार थे। उनका स्वभाव खिलंदड़ था, पर लेखन में वह गंभीर थे। गीताश्री ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के लेखन के बावजूद उन्हें न जानने की बात कहकर एक पूरी पीढ़ी को खारिज करने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि इनकार करने वाले कोई मामूली लोग नहीं। उनसे इतनी तो उम्मीद की ही जाती है कि वे जानें, न भी जानें, तो इस तरह की सूचना मिलने के बाद कम-से- कम औपचारिक संवेदना तो प्रकट करें। दो लोगों के बीच फोन पर क्या बातें हुईं, हम उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते। यह दुखद प्रसंग है। इससे साहित्य की बहुत बदनामी हुई है। यह मामला उछलना नहीं चाहिए था। दोनों तरफ तलवारें खिंची हुई हैं। कुछ को मौका मिल गया है। वे अपना निजी स्कोर सेट कर रहे। अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप हो रहे।

वैसे, सुपरिचित लेखक-पत्रकार सुधांशु गुप्त इस पूरे विवाद को निरर्थक और सारहीन मानते हैं। उनका कहना है कि हिदीं समाज अपने लेखकों को कितना जानता है, यह किसी से छिपा नहीं है। शैलेश मटियानी-जैसे लोग शाहदरा मेन्टल हाॅस्पिटल में पागलपन से अकेले जूझते रहे। कितने लोग उनसे मिलने गए होंगे, यह याद करना मुश्किल है। ब्रजेश्वर मदान से लेकर यादवेंद्र शर्मा चंद्र तक कितने ही लेखकों को हमने हाशिये पर जाते देखा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि शशिभूषण बेहद प्रतिभाशाली लेखक थे। लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि उनके जीते जी अधिकांश लोगों ने उन्हें अनदेखा किया। जिस तरह से हिदीं में आज लेखकों की बाढ़ आई हुई है, कौन होगा जो सब लेखकों को जान सकता है। उदय प्रकाश हिदीं के प्रतिष्ठित लेखक हैं। उनके-जैसी कहानियां लिखने के लिए अभी हमें वर्षों किसी नए लेखक का इंतजार करना पड़ेगा। इसके बावजूद अगर वह शशिभूषण को नहीं जानते, तो यह कोई अपराध नहीं है। बेहतर होता, हम शशि की रचनात्मकता को अब वह स्पेस देने की कोशिश करते जो उन्हें जीवित रहते नहीं मिल पाया।

कहानीकार-पत्रकार राम जनम पाठक एक और बात भी कहते हैं। पाठक का कहना है कि एक तो किसी व्यक्तिगत बातचीत को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए था। जहां तक बात है न जानने की, तो बड़े-से-बड़े लेखक को भी नई पीढ़ी के लेखक और लेखन के बारे में जानना चाहिए। शशिभूषण की आखिरी पोस्ट देखी जा सकती है जिसमें उसने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। एक झटके में शशिभूषण-जैसे प्रखर कथाकार को न जानने की बात पचती नहीं है। एक कथाकार की मौत से दुखी होने, उसके प्रति औपचारिक संवेदना व्यक्त करने के बजाय कोई अपने मानहानि का पोथा खोल कर बैठ जाए, यह हद ही कहा जा सकता है।

उदय प्रकाश और शशिभूषण- दोनों को काफी करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिनेश श्रीनेत्र की राय थोड़ी भिन्न है। वह कहते हैं कि किसी का किसी को न जानना कोई अपराध नहीं है। उदय जी की उम्र अधिक हो चुकी है और उनकी दुनिया भर की व्यस्तताएं रहती हैं। उदय जी खुद स्वीकार करते हैं कि बहुत हाल के बहुत से नए रचनाकारों को वह नहीं पढ़ पाते या बहुत सारे रचनाकारों के बारे में वह उस तरह नहीं जानते। यह सामान्य-सी बात है और इसके लिए किसी लेखक को कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। मुझे तो कागज के फूल की याद आती है कि लेखक के निधन के बाद सारे लोग उसके नाम को भुनाने लगते हैं। वही शशिभूषण प्रकरण में लग रहा है। दिनेश को यह अमानवीय तक लग रहा है, इसलिए भी कि अभी शशिभूषण की रस्में भी शायद ठीक से न पूरी हुई हों और आप सोशल मीडिया पर विवाद खड़े कर रहे हैं।

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