आईसीसी पर एक प्रभावशाली सदस्य का कब्जा : पूर्व सीईओ हारुन लोगार्ट
आईसीसी ने ऐसा माहौल बना दिया है, जहां ताकतवर सदस्यों की राजनीतिक सुविधा ही असल में भागीदारी नियम तय करती है।

टी20 वर्ल्ड कप (7 फरवरी-8 मार्च) से पहले दो दिक्कतें आईं: पहले, बांग्लादेश को बाहर कर दिया गया और फिर पाकिस्तान ने 15 फरवरी को भारत के साथ होने वाले अहम मैच के सोचे-समझे बॉयकॉट की घोषणा कर दी। गौतम भट्टाचार्य के साथ इंटरव्यू में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) के पूर्व सीईओ हारून लोरगाट ने इसे ‘ग्लोबल गवर्निंग बोर्ड के नाकाम होने का चेतावनी संकेत’ बताया।
क्रिकेट में शायद ही कोई प्रशासनिक भूमिका हो, जो लोरगाट ने अपने शानदार कॅरियर में नहीं निभाई। भारतीय जड़ों वाले दक्षिण अफ्रीकी लोरगट 2008 से 2012 तक इस पद पर रहे, श्रीलंका क्रिकेट के विशेष सलाहकार बने और अगले ही साल क्रिकेट साउथ अफ्रीका के सीईओ।
65 साल के लोरगट पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और दक्षिण अफ्रीका के प्रतिस्पर्धी घरेलू परिदृश्य में ईस्टर्न प्रोविंस और ट्रांसवाल के काबिल ऑलराउंडर रह चुके हैं। आईसीसी में कई चुनौतियां स्वीकारीं, जिनमें निर्णय समीक्षा प्रणाली की शुरुआत और भ्रष्टाचार निरोधी उपायों का विस्तार शामिल है। अपने देश में टी20 फ्रेंचाइजी लीग की कल्पना को साकार करने में अपने अनुभव और नजरिये का इस्तेमाल किया और बतौर सलाहकार पाकिस्तान सुपर लीग की नींव रखने में मददगार रहे। संपादित अंश:
भारत के साथ मैच का पाकिस्तान द्वारा चुनिंदा बहिष्कार करने के बारे में आपका क्या कहना है?
अगर सच में ऐसा होता है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। यह सुझाव ही एक नाकाम गवर्निंग बोर्ड की चेतावनी है, जिसे एक ताकतवर सदस्य ने स्ट्रक्चरली अपने कब्जे में कर लिया है, जिससे छोटे बोर्ड के पास जबरदस्ती की पावर का विरोध करने के लिए लगभग कोई सही रास्ता नहीं बचा है।
आईसीसी ने ऐसा माहौल बना दिया है, जहां ताकतवर सदस्यों की राजनीतिक सुविधा ही असल में भागीदारी नियम तय करती है। जब कोई एक बोर्ड बिना मंजूरी के चुनिंदा तौर पर अलग हो सकता है, तो यह इस बात की पुष्टि है कि अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में जिम्मेदारियों का विभाजन असमान रूप से लागू होता है और वे सिद्धांतों के बजाय ‘शक्ति’ से तय होती हैं। इस लिहाज से, पाकिस्तान की धमकी - या फैसला- गवर्नेंस का एक गहरा संकट उभारता है, और धमकी भरे बहिष्कार को अलग राजनीतिक कदम के बजाय एक खराब और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के लक्षण के तौर पर प्रस्तुत करता है।
यह एक बहुत बड़ी समस्या को दिखाता है जहां जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात है। ऐसा लगता है कि दुनिया भर के नेताओं ने निष्पक्षता, समानता और न्याय जैसी बातों को नजरअंदाज कर दिया है।
यह एक ऐसा मामला है जिसमें जियोपॉलिटिक्स को बाकी सब चीजों से ज्यादा अहमियत दी जा रही है। क्या आईसीसी इससे बच सकता था?
जियोपॉलिटिक्स को बहुत पहले ही क्रिकेट पर हावी होने दिया गया था। आईसीसी ने पैसे के लिए अपनी आजादी बेच दी, और एक सदस्य की मार्केट पावर को शेड्यूलिंग, होस्टिंग और पॉलिसी पर पॉलिटिकल कंट्रोल में बदलने दिया। अगर आईसीसी ने वूल्फ रिपोर्ट में सुझाए गए सुधारों को लागू किया होता - बोर्ड और वोटिंग स्ट्रक्चर, जरूरतों के हिसाब से फंडिंग और नैतिक सुरक्षा उपायों में, तो वह इस संकट को कम कर सकती थी, बजाय इसके कि वह एक ऐसे रेवेन्यू और गवर्नेंस मॉडल को मंजूरी दे जो दबदबे और प्रभुत्व को मजबूत करता है। गवर्नेंस सुधार से इनकार करके और राजनीतिक तथा कार्यकारी अथॉरिटी - चेयरमैन और सीईओ- को एक ही जगह केन्द्रित होने की छूट देकर आईसीसी ने लगभग यह पक्का कर दिया कि दबदबे वाले सदस्यों से जुड़ा कोई भी विवाद कभी भी जियोपॉलिटिक्स टकराव में बदल सकता है।
एक या चंद चुने हुए लोगों के प्रति यह पक्षपात जियोपॉलिटिक्स पाखंड को बढ़ावा देने वाला है, जिससे पाकिस्तान जैसे देशों को ऐसी स्थिति में धकेल दिया जाता है जो आईसीसी की कमज़ोर लीडरशिप में क्रिकेट के राजनीतिकरण को उजागर करती है। सच्ची निष्पक्षता के लिए जवाबदेहीजरूरी है, न कि ऐसा भेदभावपूर्ण रवैया जो कुछ लोगों का पक्ष ले।
आपको लगता है कि एक मैच (भारत-पाकिस्तान) पर ज्यादा निर्भरता की भी इस संकट में भूमिका है?
मुझे ऐसा ही लगता है और इसके लिए आईसीसी ही जिम्मेदार है। भारत-पाकिस्तान मैच को आईसीसी के सारे इवेंट्स का सबसे कीमती हिस्सा बनाया गया, क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप का व्यावसायिक इकोसिस्टम और टेलीविजन दर्शक ग्लोबल ब्रॉडकास्ट रेवेन्यू का आधार हैं।
एक बार जब आईसीसी ने एक ऐसा मॉडल अपनाया जिसमें फ्लैगशिप इवेंट्स, होस्टिंग पैटर्न और यहां तक कि ग्लोबल कैलेंडर को भी ऐसे ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स के हिसाब से ढाला गया, तो इसने असल में एक ही गेम को वर्ल्ड क्रिकेट का फाइनेंशियल आधार बना दिया, जिससे पाकिस्तान के धमकी भरे बॉयकॉट जैसी कोई भी रुकावट बहुत ज्यादा असरदार हो गई। और यह भी तय था। एक मैच पर अति निर्भरता सीधे तौर पर एक ऐसे सिस्टम का नतीजा है, जो खेल में बराबरी के बजाय पावर को अहमियत देता है। वह एक मैच हटा क्या लिया जाता है, पूरे टूर्नामेंट का ढांचा ही बिगड़ जाता है।
इससे सामान्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
व्यावसायिक पार्टनर्स ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लिए कम वैल्यूएशन का संकेत दे दिया है। यह भी सच है कि फ्रेंचाइजी लीग के कारण अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खतरे में है। इसके अलावा, आईसीसी टूर्नामेंट का डिजाइन, स्थान और उसकी आर्थिकी मुख्य रूप से कुछ प्रभावशाली सदस्यों के इर्द-गिर्द बने हैं और प्रतिस्पर्धी संतुलन पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।
यह बहिष्कार न सिर्फ आईसीसी इवेंट्स पर बतौर एक असली वैश्विक प्रतिस्पर्धी भरोसा कम करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की साख पर भी बट्टा लगेगा। ज्यादातर सदस्य पहले से ही ‘खराब आर्थिक स्थिति’ और सीमित होते अवसरों से परेशान हैं। किसी वैश्विक खेल प्रतिस्पर्धा के लिए यह सही नहीं हो सकता कि एक सदस्य को 38.5 प्रतिशत हिस्सा मिले, जबकि बाकी को गेम को आगे बढ़ाने की तो बात ही छोड़िए, सिर्फ जिंदा रहने के लिए भी उस रकम का एक छोटा सा हिस्सा मिले।
आपको लगता है कि इससे एशियन क्रिकेट काउंसिल (एसीसी) की नींव पर भी असर पड़ेगा?
साफ है कि एसीसी पर भी इन्हीं मुद्दों का असर पड़ेगा क्योंकि यह ऐसे इकोसिस्टम में काम करता है जहां यही असंतुलन मौजूद है। भारत के पास एक ऐसा जरूरी बाज़ार है जिस पर दूसरे एशियाई बोर्ड बहुत ज्यादा निर्भर हैं। बांग्लादेश को टी20 वर्ल्ड कप से हाल ही में बाहर करने और पाकिस्तान की धमकी भरी बॉयकॉट से एसीसी की नींव हिल जाएगी।
बांग्लादेश की अपने मैच दूसरी जगह ले जाने की कोशिश से यह संकेत मिला कि एशिया के अंदर भी, अगर सुरक्षा, संप्रभुता और समानता व्यावसायिक प्राथमिकताओं से टकराते हैं, तो उन पर समझौता संभव है, जिससे एक संतुलित और खुशहाल एशियाई गुट की किसी भी धारणा पर दबाव पड़ता है।
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