टीएम कृष्णा: शास्त्रीय संगीत को दी नई दिशा, सुरों के साथ समाज और सत्ता पर उठाए सवाल
कृष्णा ने अपनी कला को सिर्फ सामाजिक मुद्दों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने पर्यावरण और विकास की अंधी दौड़ के खिलाफ भी संगीत का इस्तेमाल किया। तमिलनाडु में एनोर क्रीक पर चल रहे अतिक्रमण के खिलाफ उनके विरोधी गीत और प्रदर्शन इसके जीवंत उदाहरण हैं।

टीएम कृष्णा सिर्फ कर्नाटक संगीत के महान गायक ही नहीं हैं, बल्कि वो इस कला को समाज और सत्ता के नजरिए से भी देखने वाले कलाकार हैं। कृष्णा शास्त्रीय संगीत को सिर्फ सुर और रागों तक सीमित नहीं मानते हैं। उन्होंने संगीत के जरिए यह दिखाया है कि कला सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं होती, बल्कि सवाल उठाने और बदलाव लाने का हथियार भी हो सकती है।
थोडुर मदबुसी कृष्णा का जन्म 22 जनवरी 1976 को मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था। कृष्णा के माता-पिता दोनों को कर्नाटिक संगीत में विशेष रुचि थी। यही वजह है कि कृष्णा ने कम उम्र में ही संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी, लेकिन उन्होंने इसे सिर्फ एक मनोरंजन की तरह कभी नहीं देखा, बल्कि समाज और सत्ता की बुराइयों को खुलकर सबके सामने रखने का माध्यम बना लिया।
हिंदी जगत में शायद उनका नाम उतना प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन उनके लेख और विचार जरूर पढ़े होंगे। उनकी किताब 'ए साउदर्न म्यूजिक- द कर्नाटक स्टोरी' हिंदी पाठकों के लिए दक्षिण भारतीय संगीत की दुनिया खोल देती है। इसमें सिर्फ संगीत के इतिहास और रागों की बात नहीं है, बल्कि समाज में संगीत की भूमिका, उसके परंपरागत ढांचे और उसमें मौजूद असमानताओं पर भी प्रकाश डाला गया है।
टीएम कृष्णा ने कर्नाटिक संगीत की दुनिया में ऊंची जातियों के वर्चस्व को लेकर काफी मुखर आवाज उठाई है। वे लगातार कोशिश कर रहे हैं कि इस पारंपरिक मंच में दलित और पिछड़ी जातियों की प्रतिभाएं भी अपने मुकाम तक पहुंचें। इस वजह से उन्हें कई बार पुराने और पारंपरिक उस्तादों की नाराजगी झेलनी पड़ी, लेकिन कृष्णा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनका मानना है कि संगीत केवल कुछ लोगों का अधिकार नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए खुला होना चाहिए।
कृष्णा ने अपनी कला को सिर्फ सामाजिक मुद्दों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने पर्यावरण और विकास की अंधी दौड़ के खिलाफ भी संगीत का इस्तेमाल किया। तमिलनाडु में एनोर क्रीक पर चल रहे अतिक्रमण के खिलाफ उनके विरोधी गीत और प्रदर्शन इसके जीवंत उदाहरण हैं। एनोर क्रीक, एक संकरी खाड़ी, जहां कोसास्थलियर नदी समुद्र में मिलती है, अब कारखानों और उद्योगों के कब्जे में है।
कृष्णा इस गीत में बताते हैं कि कैसे हमारी लापरवाह विकास की भूख ने इस प्राकृतिक जगह को पूरी तरह बदल दिया है। उनके गाने में उन्होंने 'पोरंबोक' शब्द का इस्तेमाल किया है। पोरंबोक का मतलब होता है सामूहिक भूमि या बिना पट्टे वाली जमीन। इसका एक और मतलब है आवारा। कृष्णा इसे एक प्रतीक बनाकर बताते हैं कि कैसे सामूहिकता का मतलब समाज में लांछन में बदल जाता है।
उनका गाना एनोर क्रीक के बीचों-बीच खड़े होकर गाया गया है, जिसमें वे कारखानों और पावर प्लांट के कारण नदी और समुद्र के बीच के प्राकृतिक मेल को खत्म होते हुए दिखाते हैं। उनका कहना है कि अगर विकास की यह भूख इस तरह जारी रही तो यही पोरंबोक हमारी जिंदगी को भी निगल जाएगा।
सबसे खास बात यह है कि कृष्णा सिर्फ विरोध नहीं करते, बल्कि अपनी आवाज को संगीत में बदल दिया है। वो शास्त्रीय संगीत को लोक संगीत के करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी कला में सिर्फ राग और ताल नहीं हैं, बल्कि सवाल, चेतना और चेतावनी भी हैं। उत्तर भारत में बहुत कम शास्त्रीय कलाकार हैं जो सत्ता या दबाव को चुनौती देते हैं, और कृष्णा उन्हीं चुनिंदा लोगों में से हैं।
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