जब महारानी एलिजाबेथ के स्वागत के लिए इंदिरा गांधी ने खुद खिसकाया सोफा और सही किए चेयर्स...

जब पश्चिमी पाकिस्तान के प्रभुत्व वाली सैन्य तानाशाही के उत्पीड़न से पूर्वी पाकिस्तान से लाखों शरणार्थी भारत आने लगे, तो इंदिरा गांधी ने इससे निबटने में अपनी राजनयिक समझ का प्रदर्शन किया। उन्होंने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेक शाॅ पर भरोसा जताया और उनकी सलाह पर सर्दियों तक इंतजार किया।

1969 में ब्रिटेन की महारानी के साथ श्रीमती इंदिरा गांधी (फोटो: Getty Images)
1969 में ब्रिटेन की महारानी के साथ श्रीमती इंदिरा गांधी (फोटो: Getty Images)
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आशीस रे

प्रधानमंत्री के तौर पर श्रीमती इंदिरा गांधी का सबसे प्रभावशाली समय 1969-72 का था। विपरीत स्थितियों में उनकी राजनीतिक कुशलता महत्वपूर्ण थी जब उन्होंने शक्तिशाली बुजुर्गों को निपुणता के साथ किनारे किया और केंद्र तथा विभिन्न राज्यों में दो दफा उल्लेखनीय चुनावी विजय पाईं।

जब पश्चिमी पाकिस्तान के प्रभुत्व वाली सैन्य तानाशाही के उत्पीड़न की वजह से पूर्वी पाकिस्तान से भारी संख्या में लाखों शरणार्थी भारत आने लगे, तो उन्होंने इस संकट और अवसर से निबटने में अपनी राजनयिक समझ प्रदर्शित की। उन्होंने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ में जिस तरह अपना विश्वास दिखाया, आक्रमण के लिए सर्दियों के सहायक मौसम के लिए इंतजार करने की उनकी सलाह पर टिके रहने का धैर्य प्रदर्शित किया और सबसे अधिक, अमेरिका से स्पष्ट चेतावनियों के बाद भी इस तरह का साहस दिखाया, यह सब उनके धीरज, अनुभव और जूझने की शक्ति का परिचायक था।

1971 में जब भारतीय फौज पूर्वी पाकिस्तान में पैठ की सतर्क योजना बना रही थी, पश्चिमी शक्तियों को भारत के दृष्टिकोण से परिचित कराने के लिए श्रीमती गांधीने बीबीसी के पीटर स्नो को दिए इंटरव्यू में कई बातें कहीं।

स्नोः क्या ऐसी हालत है कि आप पाकिस्तान पर चढ़ाई कर सकती हैं?

श्रीमती गांधीः मैं ऐसी उम्मीद नहीं करती। भारत सब दिन शांति और बातचीत के पक्ष में रहने की कोशिश करता रहा है। लेकिन, हां, हम अपनी सुरक्षा को किसी भी तरह खतरे में नहीं डाल सकते... हम इसे (युद्ध को) टालने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं।

स्नोः लेकिन क्या आप बांग्लादेशी छापामारों का समर्थन करती हैं? क्या आप पूर्वी पाकिस्तान में अलग राज्य का समर्थन करती हैं?

श्रीमती गांधीः देखिए, यह समर्थन करने या न करने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि क्या होने की संभावना है। मुझे नहीं लगता कि हम पड़ोस के देश की हालत से अपनी आंखें बंदकर रख सकते हैं। मैं व्यक्तिगत तौर पर सोचती हूं कि अधिकतर दुनिया इसी तरह यकीन करती है- भले ही वे इसे खुलकर नहीं कहना चाहें- कि पाकिस्तान जैसा आज है, वैसा सब दिन नहीं रह सकता।

स्नोः आपको नहीं लगता कि आपकी सीमाओं की स्थिति कम खतरनाक हो सकती है, अगर आप व्यक्तिगत तौर पर (पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल) याह्या खान से मिलें ताकि आप दोनों एक-दूसरे की स्थितियों को ज्यादा अच्छी तरह समझें।

श्रीमती गांधीः क्या आपने राष्ट्रपति याह्या खान के कुछ भाषण और इंटरव्यू पढ़े हैं?

स्नोः हां।

श्रीमती गांधीःठीक है, और क्या तब भी आप सोचते हैं कि इससे कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा होगा?.. मुझे नहीं लगता कि आप मुझे किसी दूसरे शासनाध्यक्ष के बारे में बता सकते हैं जो वर्तमान स्थितियों में इतना शांत हो जबकि पूरा देश शांत नहीं हो। मेरा मतलब है कि जो स्थितियां हैं, उनमें हमारे लिए बहुत मुश्किल है। और फिर हमें जो बाहर से मिल रहा है, हमें उसे ऐसी सरकार से बराबर करना पड़ा है जिसने दस लाख से अधिक लोगों की हत्या की है, जिसने नृशंसता की स्थितियां पैदा की हैं, ऐसी जिसे दुनिया ने बहुत कम देखी हैं, शायद(एडोल्फ) हिटलर के वक्त में यहूदियों के खिलाफ जैसा हुआ था, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इतिहास में किसी अन्य वक्त ऐसा वक्त देखा गया।

स्नोः क्या आप खुद को इस रूप में पाती हैं जब किसी को इस तरफ धकेला जा रहा है, इस तरह शामिल होना पड़ रहा है कि पूर्वी पाकिस्तान में आपको हस्तक्षेप करना पड़े, मानवीयता के कारण ही?

श्रीमती गांधीः पूर्वी बंगाल पूर्वी बंगाल के नेताओं का मामला है। यह उन पर निर्भर है कि वहां क्या होता है।

भारत की प्रभावशाली विजय, बांग्लादेश की मुक्ति और पाकिस्तानी सेना के लगभग एक लाख अफसरों और सैनिकों के आत्मसमर्पण के बाद पश्चिम ने बेमन से स्वीकार किया कि श्रीमती गांधी ऐसी शक्ति हैं जिन्हें गंभीरता से लेना होगा। लेकिन, युद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट पैदा किया। इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त बनने से पहले 1980-84 के दौरान उनके प्रधान सचिव रहे डॉ पी सी अलेक्जेंडर ने बताया कि आर्थिक मामले उन्हें उत्तेजित नहीं करते थे। वे आम तौर पर अपने सहयोगियों को वित्तीय मामलों को निबटाने का उत्तरदायित्व सौंप देती थीं। 1972- 75 के दौरान चुनौतियों से जूझने में दिक्कत आने लगी तो जनता में बेचैनी और नाराजगी बढ़ने लगी और जयप्रकाश नारायण आंदोलन के लिए यह काम आई। एक सांसद के तौर पर उन्हें हटाने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने इसमें आग में घी का काम किया। उस वक्त आपातकाल लगाने का फैसला अनुपयुक्त और अलोकप्रिय साबित हुआ, इसे उन्होंने स्वीकार भी किया, क्योंकि आम तौर पर यह माना गया कि यह अनुपयुक्त कारणों से लगाया गया। जबकि वह यह बताते हुए इसे सही बता सकती थीं कि विपक्ष ने न सिर्फ रेल का पहिया ठप कर दिया था बल्कि यहां तक कि सेना से भी विद्रोह के लिए आह्वान किया था, लेकिन श्रीमती गांधी ने ऐसा नहीं किया। इन सबसे ऊपर, आपातकाल के दौरान ज्यादतियों की कांग्रेस ने कीमत चुकाई और इस तरह जनता पार्टी सरकार बनने का रास्ता बना।

ब्रिटिश मीडिया, खास तौर से टाइम्स, आपातकाल का कठोर आलोचक था। मजेदार यह है कि भारतीय उच्चायुक्त बी के नेहरू इसके बचाव को लेकर सतर्क रहते थे जबकि उनके सहायक के नटवर सिंह निडर थे। दोनों ने अपने बचाव के लिए लेबर पार्टी के दिग्गज माइकेल फूट को अपने साथ जोड़ लिया था। श्रीमती गांधीने 1977 में चुनाव कराया। इसने और अपनी हार की लोकतांत्रिक स्वीकारोक्ति ने फूट को दोषमुक्त कर दिया।

श्रीमती गांधी नवंबर, 1978 में कर्नाटक में चिकमंगलूर से उपचुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचीं। इस परिणाम के कुछ ही हफ्तों बाद वे इंडियन ओवसीज कांग्रेस के निमंत्रण पर लंदन में थीं। एयरपोर्ट से बाहर निकलते वक्त सड़क पर कुछ अकालियों ने उनके काफिले को काले झंडे दिखाए। यहां जिन इलाकों में सिख रहते हैं, वहां उनका मिश्रित स्वागत हुआ। लेकिन वी के कृष्ण मेनन द्वारा स्थापित इंडिया लीग और इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (यूरोप) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित डिनर में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

कलकत्ता के बिजनेसमैन स्वराज पॉल जिनका परिवार उत्साहपूर्वक श्रीमती गांधी का समर्थन करता था, ने उन्हें प्रतिष्ठित क्लैरिजेज होटल में ठहराया जहां वे प्रधानमंत्री होतीं, तो रुकतीं। मुझे जानकारी मिली कि उनका स्वागत ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स कैलेघन ने किया। ऐसा आम तौर पर नहीं होता क्योंकि उस वक्त श्रीमती गांधी विपक्ष में थीं। वह बैठक की बातों का लेकर ऑॅन रिकॉर्ड बोलने को अनिच्छुक थीं। लेकिन उनकी आंखों की चमक कांग्रेस और लेबर पार्टी के बीच निकटवर्ती रिश्ते को बता रही थी।

श्रीमती गांधी से मेरी अगली मुलाकात नवंबर, 1981 में पेरिस में हुई। वह फिर प्रधानमंत्री बन गई थीं और यह दौरा महत्वपूर्ण था क्योंकि फ्रांस भारत की तुलना में पाकिस्तान से अधिक निकट हो गया था। लेकिन वहां पहले सोशलिस्ट राष्ट्रपति फ्रैंकोइस मितरां बने थे। निश्चित तौर पर, यह टर्निंग प्वाइंट बना और रिश्तों की ऐसी शुरुआत हुई जो आज इस रूप में दिख रही है। भारतीय पत्रकारों के साथ अनौपचारिक बातचीत में वे सोवियत संघ पर निर्भरता घटाने और इस तरह रक्षा आपूर्ति के स्रोतों को बढ़ाने की भारत की जरूरत को लेकर आश्चर्यजनक तौर पर स्पष्टवादी थीं।

1982 में श्रीमती गांधी किसी भी देश में होने वाले पहले फेस्टिवल ऑफ इंडिया के उद्घाटन के लिए लंदन आईं। उन्होंने प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर के साथ बातचीत की और उनसे वैसे भी मिलीं। अपने भिन्न राजनीतिक मतों के बाद भी यह दो बड़े व्यक्तित्वों का संवाद था। जब श्रीमती गांधी की शहादत कीखबर आई, तो श्रीमती थैचर की उद्विग्नता साफ दिख रही थी।

नेहरू-गांधी और ब्रिटिश राज परिवारों के बीच अनौपचारिक संबंध खास तौर से भिन्न थे। फेस्टिवल ऑफ इंडिया के उद्घाटन समारोह के बाद आयोजित समारोह में श्रीमती गांधी ने चार्ली कहते हुए प्रिंस चार्ल्स की ओर हाथ हिलाया और उन्हें डिनर के लिए आमंत्रित किया और जहां तक मुझे याद है, वे उसमें शामिल भी हुए।

दिल्ली में 1983 की सर्दियों में राष्ट्रमंडलीय देशों के शासनाध्यक्षों की बैठक हुई। इससे कुछ माह पहले कानकुन में हुए सम्मेलन से लौटते हुए श्रीमती गांधी अनपेक्षित तौर पर लंदन में रुकीं। उनका उद्देश्य भारतीय उच्चायुक्त के आवास का निरीक्षण करना था। कुछ ही हफ्ते बाद उन्हें ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ दो के सम्मान में डिनर का आयोजन करना था। यह रीति थी कि राष्ट्रमंडलीय देशों के शासनाध्यक्षों की बैठक का आयोजन करने वाले देश में जाने से पहले इस तरह का डिनर आयोजित किया जाए। अपना कोट उतारकर श्रीमती गांधी ने व्यक्तिगत तौर पर ड्राइंग रूम को फिर से व्यवस्थित किया- सोफा खिसकाया, चेयर्स को घसीटा और घर के नए इंटीरियर डेकोरेशन के लिए अपने स्टाफ को निर्देश दिया।

लंदन के अपने दौरों में वे अपने पुराने दोस्तों से रीकनेक्ट होती थीं, थिएटर जाती थीं और बिना तामझाम प्रतिष्ठित रेस्तरां में खाती थीं और समय मिले, तो हेयर ड्रेसर के पास भी जाती थीं।

31 अक्टूबर, 1984 को अलस्सुबह मैं बीबीसी टीवी के ब्रेकफास्ट प्रोग्राम से जगा और उससे ही पता चला कि श्रीमती गांधी को गोलीमार दी गई है और वे मृत्यु से जूझ रही हैं। मैं छह बजे सुबह स्टूडियो की ओर दौड़ा। सूचना छन-छनकर आने लगी थीं जिनका मतलब था कि वे नहीं रहीं; लेकिन जब तक पूरी तरह मुतमईन न हो जाएं, हम कोई स्टोरी नहीं कर सकते थे।

अंततः, 8 बजे- जो भारतीय समयानुसार 1:30 बजे दिन था- बीबीसी के दक्षिण एशिया प्रमुख मार्क टुली ने ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) में उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों से बातचीत के बाद निधन की पुष्टि की। मेरा काम उन दो बंगलों के भूगोल को लोगों को बताना था जिनमें से एक उनका आवास था और दूसरा वह जगह थी जहां उन्हें गोली मारी गई थी।

मुझे पहले की उन दो घटनाओं की याद है जब भारतीय प्रधानमंत्रियों का निधन हुआ था। दोनों ही बार गुलजारी लाल नंदा अंतरिम प्रधानमंत्री बनाए गए थे। लेकिन इस बार इतिहास ने अपने आपको नहीं दोहराया था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। उन्होंने ‘लेड टु रेस्टः द कंट्रोवर्सी ओवर सुभाष चंद्र बोसेस डेथ’ नामक किताब लिखी है। इस लेख में विचार उनके अपने हैं। नवजीवन का इन विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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