दिल्ली जब भी खुद को देख इठलाएगी, उसे शीला दीक्षित की याद आएगी

सौम्य मुस्कान वाली शीला दीक्षित ऐसी शख्सियत थीं जिनके इरादे फौलाद से मजबूत थे। दुनिया में अपनी एक अलग जगह बनाते भारत जैसे देश की राजधानी का भावी स्वरूप कैसा होना चाहिए, इसकी समझ तो थी ही, उसे कैसे पाया जाए, उनके दिमाग में इसका खाका भी एकदम स्पष्ट था।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

शीला दीक्षित 1998 से 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। जब वह मुख्यमंत्री बनीं, दिल्ली तमाम समस्याओं से जूझ रही थी जैसे- वायु प्रदूषण, जलसंकट, बिजली की किल्लत, खराब बुनियादी ढांचा वगैरह। लेकिन उनके मुख्यमंत्री रहते इन सब मामलों में काफी प्रगति हुई। यह सही है कि इनमें से कई समस्याएं आज भी हैं, लेकिन शीला दीक्षित ने इन सबका डटकर सामना किया और सफल भी रहीं। दिल्ली को एक उभरते देश की आधुनिक राजधानी बनाने का अपना सपना भी पूरा करने में वह काफी हद तक कामयाब रहीं।

शीला कहा करती थीं कि दिल्ली मानव संसाधन की धनी, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों में गरीब है। पानी और हवा, दोनों बाहर से आती हैं। वह एक प्रतिबद्ध पर्यावरणवादी थीं। उन्होंने दिल्ली की सभी बसों को डीजल से सीएनजी में बदलने की योजना पर बड़ी तेजी से काम किया और इससे दिल्ली के वायु प्रदूषण में काफी सुधार आया। इतना ही नहीं, जब सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में नई बसों के बेड़े को शामिल करने की बात थी, उन्होंने ज्यादा कीमत वाली लो-फ्लोर बसों को चुना और यह उनकी दूरगामी सोच ही थी कि उन्होंने एसी लो-फ्लोर बसों को भी बेड़े में शामिल किया।

इसके पहले डीटीसी के लिए ट्रक की चेसिस पर हाई-फ्लोर बसें तैयार की जाती थीं। इस कदम से सार्वजनिक परिवहन की स्वीकार्यता में आमूल-चूल सुधार हुआ। उन्होंने डीटीसी की नई बसों में हरे रंग को नॉन-एसी के लिए और लाल रंग को एसी बसों के लिए चुना। आज दिल्ली की परिवहन प्रणाली में ये रंग बने हुए हैं।

सभी तरह की गाड़ियों को सीएनजी पर लाने के लिए व्यापक स्तर पर ढांचागत सुविधाएं विकसित करने की जरूरत थी, जिसमें बसों, कारों, ऑटो के लिए सीएनजी फिलिंग स्टेशन से लेकर इतनी जगह बनानी थी कि सीएनजी भराने के लिए इंतजार कर रही गाड़ियां खड़ी हो सकें। इसके लिए उन्होंने दिल्ली सरकार और गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया के संयुक्त उद्यम इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड को बड़ा भूभाग आवंटित किया।

दिल्ली के लिए पानी हमेशा से एक चिंता का विषय रहा है। शीला दीक्षित के नेतृत्व में ही सोनिया विहार ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण हुआ जिससे गंगनहर से पूर्वी दिल्ली को पानी की सप्लाई की जा सकी। जलशोधन क्षमता को बढ़ाने, लीकेज से पानी की बर्बादी रोकने से लेकर पानी का मीटर लगाने के कारण राजधानी में जलापूर्ति व्यवस्था में खासा सुधार आया। लेकिन दिल्ली में पानी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अन्य स्रोतों से पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने की जरूरत है। उन्होंने रेणुका बांध परियोजना के रिसर्च को बढ़ावा दिया ताकि दिल्ली में पानी की भावी जरूरतों को पूरा करने के उपाय किए जा सकें।

उनके नेतृत्व के दौरान दिल्ली की ढांचागत सुविधाओं में बड़ा बदलाव आया। सड़क, पुल, फ्लाईओवर से लेकर मेट्रो के कारण परिवहन सुविधा में अभूतपूर्व इजाफा हुआ। संपर्क साधन में आए सुधार के कारण पूर्वी दिल्ली का तेजी से विकास हुआ। 2010 में कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान शीला दीक्षित के नेतृत्व में बड़े फैसले हुए और उस दौरान इमारत जिस रफ्तार से बन रही थीं, वह देखते बनता था। वह अक्सर कहा करतीं, दिल्ली मेट्रो से सीखना चाहिए कि किसी परियोजना को समय पर कैसे पूरा करें।

बारापुला फ्लाईओवर, जिसे आज बंदा बहादुर फ्लाईओवर के नाम से जानते हैं, 18 माह के रिकॉर्ड समय में बनकर तैयार हुआ जबकि सामान्यतः उसे बनने में पांच साल लग जाते। जब इसकी योजना बन रही थी, रेलवे और पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इसके खिलाफ थे क्योंकि यह निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास से गुजरता और हुमायूं के मकबरे के भी काफी करीब होता। लेकिन शीला दीक्षित केंद्रीय मंत्रियों को समझा-बुझाकर संबद्ध विभागों की आपत्तियां हटवाने में सफल रहीं और इस तरह फ्लाईओवर का काम पूरा हो सका। उन्होंने खुद कई बार जाकर निर्माण कार्यों का जायजा लिया। आज यह दिल्ली की लाइफलाइन बन गया है।

आज दिल्ली की पहचान बन गए सिग्नेचर ब्रिज का निर्माण भी शीला दीक्षित के ही समय शुरू हुआ। पारंपरिक चीजों के शौकीन लोगों के लिए दिल्ली हाट एक पसंदीदा जगह है और इसकी लोकप्रियता ऐसी है कि पीतमपुरा में भी एक दिल्ली हाट का निर्माण हुआ। गार्डन ऑफ फाइव सेन्सेज भी उतना ही दर्शनीय स्थल है।

मुझे याद है जब विकास भवन-2 का निर्माण हो रहा था तो मैंने उन्हें जानकारी दी कि इसमें केवल अधिकारियों के लिए एसी की सुविधा दी जा रही है। लेकिन शीला दीक्षित ने साफ कहा कि सभी कर्मचारियों को एक जैसी सुविधा मिलनी चाहिए, बेशक इसपर अधिक खर्च हो जाए। उसके बाद मैंने पीडब्ल्यूडी वालों को योजना बदलने को कहा और तब जाकर पूरे भवन को एयरकंडीशंड बनाया गया।

शीला दीक्षित के कार्यकाल में सबसे बड़ा और चर्चित फैसला रहा बिजली क्षेत्र का निजीकरण। यह फैसला विवादों में जरूर रहा, लेकिन ऐसा करना जरूरी हो गया था क्योंकि इन्फ्रास्टक्चर खराब था और दिल्ली विद्युत बोर्ड को भारी नुकसान हो रहा था। ऐसे में बिजली की लगातार बढ़ती मांग के मद्देनजर इस तरह की सर्जरी जरूरी हो गई थी। आज दिल्ली में बिजली की उपलब्धता के मामले में उल्लेखनीय सुधार आया है और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण यह क्षेत्र आत्मनिर्भर हो सका है।

कॉमनवेल्थ गेम्स के उद्घाटन समारोह से कुछ दिन पहले कुछ विदेशी टीम प्रबंधकों ने खेलगांव में अधूरी सुविधाओं की शिकायत की थीं और इस कारण मीडिया में आलोचनात्मक खबरें आ रही थीं। वैसी स्थिति में शीला दीक्षित खुद खेलगांव गईं और प्रतिनिधिमंडलों से मिलीं। उनकी बातचीत के तरीके और व्यक्तित्व का इतना सकारात्मक असर हुआ कि विदेशियों को खेल शुरू होने से पहले सब कुछ दुरुस्त करने के प्रति सरकार की गंभीरता का भरोसा हुआ और उन्होंने शिकायत करनी छोड़ दी। इस तरह वे तमाम आशंकाएं खत्म हो सकीं कि कुछ विदेशी टीमें खेलों का बहिष्कार कर सकती हैं।

शीला दीक्षित बड़े-बड़े सरोकार वाले अभियानों से बच्चों को जोड़कर इन्हें एकदम सहज बना देती थीं। दिल्ली को दिवाली पर पटाखों की विभीषिका से बचाने के अभियान में बच्चों को जोड़ने के बड़े सकारात्मक परिणाम सामने आए। पेड़ों के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए उन्होंने बड़े पैमाने पर पौधारोपण कराए और सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों की बैठकों में गिफ्ट के रूप में पौधे देने का चलन शुरू किया। उन्होंने पूरी दिल्ली में स्त्रीशक्ति अभियान चलाया जिसमें मां और बच्चे के स्वास्थ्य की समय-समय पर जांच की जाती थी। जाहिर है, वह हर वर्ग के लिए सोचती थीं और उनके सरकारी आवास के दरवाजे लोगों के लिए खुले रहते थे और वह रोजाना तमाम लोगों से मिलतीं, उनके दुःख-दर्द सुनती थीं।

प्रशासन में सुधार लाना उनकी कार्यशैली का मूलमंत्र था। तेलगी स्टांप घोटाले के बाद व्यवस्था में बदलाव समय की जरूरत थी। उन्हीं के समय इलेक्ट्रॉनिक स्टांप की सुविधा शुरू हुई जिससे तेलगी जैसा कोई घोटाला न हो सके। इसके लिए स्टॉक होल्डिंग कारपोरेशन के साथ मिलकर ई-स्टांपिंग की सुविधा देने का रास्ता निकाला गया। आज यह व्यवस्था में रच-बस गया है। उन्होंने स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा शुरू कराई ताकि दिल्ली सरकार के स्कूलों के छात्र डिजिटल जानकारी में पिछड़ न जाएं। इसके साथ शीला दीक्षित ने यह भी सुनिश्चित किया कि दिल्ली में कला और संस्कृति की अलख जलती रहे। उन्होंने बेहतरीन कलाकारों को पुरस्कृत करने के लिए दिल्ली कला एकेडमी अवार्ड शुरू किया और हर साल नेहरू गार्डन्स में होने वाला सांस्कृतिक कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हुआ।

एमसीडी का कमिश्नर होने के नाते मैं उनसे सप्ताह में एक बार मिलता और उन्हें अपनी तमाम समस्याएं बताता। जब भी मैंने उन्हें वित्तीय कठिनाइयों की जानकारी दी, उन्होंने अधिकारियों को इसे हल करने को कहने में देर नहीं की। एक बार मैंने उनसे दिल्ली में कूड़े की समस्या पर बात की। उसके बाद जब वह संयुक्त राष्ट्र गईं, उन्होंने यूनाइटेड नेशन्स ऑफिस फॉर प्रोजेक्ट सर्विसेज से कहा कि कूड़े की समस्या पर एक अध्ययन करा दें और इस तरह उन लोगों ने हॉलैंड और भारतीय सलाहकार को अध्ययन करके रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त कर दिया। कूड़े से बिजली, कूड़े को उठाने, लाने-ले जाने में मशीनों का इस्तेमाल और कूड़े से लैंड फिलसाइट का निर्माण उसी रिपोर्ट का नतीजा है।

कुल मिलाकर शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते इन्फ्रास्ट्रक्टर, पर्यावरण जागरुकता, कूड़ा प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और ई-प्रशासन के मामले में दिल्ली में अभूतपूर्व काम हुए। उन्होंने बड़े और साहसिक फैसले लिए और एक बार फैसला लेने के बाद कभी उसे पलटा नहीं। वह खुद दिल्ली के कोने-कोने में जातीं, लोगों से मिलतीं, उनकी समस्याएं सुनतीं, चुने हुए प्रतिनिधियों से बात करतीं। अधिकारियों की बैठकों में वह बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनतीं और उसके बाद फैसला करतीं। एक बार फैसला हो जाने के बाद अधिकारी उसे पूरा करने में जुट जाते क्योंकि उन्हें पता होता था कि इसमें अब कोई बदलाव नहीं होने जा रहा।

शीला दीक्षित का नेतृत्व ऐसा था जिसमें करुणा और ज्ञान था। उनकी मुस्कुराहट के पीछे फौलादी संकल्प था। उन्हें पता था कि एक महानगर के रूप में दिल्ली की भावी जरूरतों के लिए क्या करना होगा। दिल्ली की संवैधानिक स्थिति का उनको भली-भांति भान था और उनमें केंद्र सरकार को विश्वास में लेकर चलने की समझ-बूझ थी और इस मामले में उन्होंने हमेशा आगे रहकर दिल्ली का नेतृत्व किया।

(लेखक राकेश मेहता दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव हैं)

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