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आखिर क्या है मस्जिद और मीनार का रिश्ता?

अपने पिछले लेख में मैंने बताया था कि दिल्ली घूमने-घुमाने और उसके बारे में जानने और समझने का सिलसिला कैसे शुरु हुआ। आइए बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

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सुहेल हाशमी

मैं कह रहा था कि बचपन से यह पढ़ा और सुना था कि मस्जिद के मीनार अज़ान देने के लिए होते हैं, ठीक वैसे ही जिस तरह मंदिर के ऊपर शिखर होता है। हमारी शिक्षा प्रणाली इस तरह की है जिसमें सवाल पूछने की कोई गुंजाइश नहीं रखी गयी है और वैसे भी बड़ों के सामने बक-बक करना और उनसे बहस करना न केवल बुरा माना जाता है बल्कि यह इस बात का भी सबूत होता है बच्चों की परवरिश में कहीं कोई बड़ी खामी रह गई है। कभी कभी कोई सवाल उठता भी तो मन में ही रह जाता। इसी तरह हम मस्जिदों को मीनारों के बारे में आधी-अधूरी जानकारी के साथ बड़े हुए।

इस माहौल में आधी सदी से ज्यादा समय गुजारने के बाद पहली दिल्ली से सातवीं दिल्ली तक की संरक्षित और जीर्ण-शीर्ण हो चुकी इमारतों को एक के बाद एक देखने समझने का सिलसिला शुरू किया। दरअसल यह सिलसिला बचपन में हमारे पिता की पहल पर शुरु हुआ था लेकिन उनकी बीमारी और बाद में मृत्यु के बाद ये सिलसिला टूट गया। फिर जब 2004 में यह फिर से शुरू हुआ तो मीनारों, महराबों और गुंबदों को जरा गौर से देखना शुरू किया। कुछ थोड़ा बहुत पढ़ना भी शुरू किया और यह पता चला के 1192 में स्थापित दिल्ली सल्तनत में कुतुबुद्दीन ने 1198 में एक मस्जिद के निर्माण का काम शुरू करवाया, जिसे उसने 'मस्जिद-ए-जामी' नाम दिया। इस मस्जिद को कबत-ए-इस्लाम या खेमा-ए-इस्लाम या गुंबद-ए-इस्लाम भी कहा जाता था। इस मस्जिद के निर्माण में 24 जैन मंदिरों के पत्थरों का उपयोग किया गया और उस समय के ऐतिहासिक संदर्भों से पता चलता है कि मंदिरों का तोड़कर उनके पत्थरों से यह मस्जिद तैयार की गयी। यह हरकत क्यों की गई, इस बारे में बाद में कभी लिखूंगा। यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि अंग्रेजों ने इस मस्जिद का नाम बदल कर उसे मस्जिद कुव्वत-उल-इस्लाम कहना शुरू किया।

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मस्जिद का नाम बदलने की राजनीति के बारे में भी फिर कभी बात होगी। फिलहाल तो मस्जिद के साथ बने मीनारों के बारे में बातचीत पर ही संतोष करेंगे। मीनार 72.5 मीटर यानी 240 फुट ऊंचा है और ऊपर तक पहुंचने के लिए 379 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस मस्जिद के निर्माण का काम 1199 में शुरु हुआ।

कहा जाता है यह मीनार अज़ान देने के लिए बनवाया गया था। ज़रा कल्पना कीजिए, उस बेचारे मोअज़्ज़न पर क्या बीतती होगी, जिसे दिन में पाँच बार इन सीढ़ियों पर चढ़ना और उतरना पड़ता होगा। हफ्ते भर में घुटने जवाब दे देंगे। दिन भर में कुल मिलाकर 363 मीटर यानी 1000 फीट चढ़ाई और उतना ही उतरना। चढ़ने-उतरने में क्या हालत होती है, मुझे मालूम है, महीने भर पहले ही दौलताबाद में 465 सीढ़ियां चढ़कर आया हूं। धीरे-धीरे, रुकते-रुकाते, आराम से, मुझे कोई जल्दी नहीं थी, ऊपर जाकर अज़ान भी नहीं देना था। उतरने के घंटों बाद तक पैर कांपते रहे और कई दिन तक मांसपेशियों में दर्द रहा। तो मोअज़्ज़न बेचारे पर क्या बीतती होगी?

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ध्यान रखें हम लौटकर यहीं आएंगे। यह बात भी याद रखने लायक है कि जब कुतुबुद्दीन की जामी मस्जिद बनकर तैयार हुयी, तब तक मीनार की पहली मंजिल ही बन रही थी। 1210 में लाहौर में एक पोलो मैंच खेलते हुए जब कुतुबुद्दीन एक हादसे का शिकार हुआ, उस वक्त तक मीनार की एक ही मंजिल पूरी हुई थी। बाकी तीन मंज़िलें शमसुद्दीन अल्तमश ने पूरी करवायीं। और, बाद में फिरोज तुगलक ने खस्ताहाल हो चुकी चौथी मंजिल को उतरवा कर उसकी जगह दो मंज़िलें बनवा दीं।

जिस समय मस्जिद का निर्माण हुआ, तब मीनार मस्जिद के बाहर था। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मस्जिद का विस्तार हुआ और अलायी दरवाजे का निर्माण हुआ, उसके बाद ही मीनार को मस्जिद परिसर में शामिल कर लिया गया। इसका मतलब यह हुआ कि कुतुबुद्दीन के समय से लेकर अलाउद्दीन खिलजी के समय तक यानी 100 साल तक मीनार मस्जिद परिसर का हिस्सा नहीं था।

कुतुबुद्दीन की बनायी हुयी मस्जिद दिल्ली की पहली मस्जिद है। गुलाम वंश के बाद एक के बाद एक, खिलजी, तुगलक, लोदी राजाओं का दौर आया। इन राजाओं ने, उनके अमीरों ने, सूफ़िया-ए-किराम के मुरीदों ने, दिल्ली और उसके आसपास सैकड़ों छोटी - बड़ी मस्जिदों का निर्माण करवाया। फीरोज तुगलक के वज़ीर खान जहां मकबूल जूना शाह तिलंगानी ने ही चार भव्य मस्जिदों का निर्माण करवाया। ये हैं बेगम पुर, खिड़की, कलां मस्जिद और बस्ती निजामुद्दीन की जामी मस्जिद। इसके अलावा उसने कोटला फीरोज़शाह, कालू सराए और जिस जगह बाद में शाहजहां के दौर में काबुली दरवाजे का निर्माण हुआ, वहाँ भी मस्जिदें बनवायीं।

इन मस्जिदों के अलावा दरगाह निज़ामुद्दीन औलिया के नजदीक, खिज़र खान मस्जिद, सेरी के पास मोहम्मदी मस्जिद, लाडो सराय के पास मढ़ी मस्जिद, हौजखास बाजार के पास नीली मस्जिद, तुगलकाबाद मस्जिद, लोदी गार्डन मस्जिद, वज़ीराबाद मस्जिद, शेख फजलुल्लाह मस्जिद जिसे जमाली कमाली भी कहा जाता है। इसके साथ ही शेरशाह सूरी की बनवायी हुयी मस्जिद किला-ए-कुहना, अकबर के दौर में निर्माण हुई मस्जिद अब्दुल नबी और कई अन्य मस्जिदें है जिनकी संख्या सैकड़ों में होगी।

पता नहीं, आपने इनमें से कितनी देखी हैं, लेकिन आज भी उनमें से कई पुरातात्विक संरक्षण में हैं और मध्ययुगीन वास्तुकला के दुर्लभ नमूनों में उनकी गिनती होती है। आप अगर इन मस्जिदों को ध्यान से देखें, तो आप पाएंगे कि उनमें से किसी में भी मीनार नहीं हैं!

दिल्ली की वह पहली मस्जिद जिसमें ऐसे मीनार हैं जिन पर चढ़कर अज़ान दी जा सकती है, उसका निर्माण शाहजहां ने करवाया और उसे मस्जिद जहांनामा का नाम दिया गया, और हम उसे जामा मस्जिद के नाम से जानते हैं। दिल्ली में मीनार वाली पहली मस्जिद दिल्ली की जामा मस्जिद है, इसका ख्याल मुझे उस समय आया जब कुछ साल पहले नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा – एनएसडी के कुछ छात्रों को शाहजहानाबाद की जामा मस्जिद घुमाने लेकर गया था।

कुतुब मीनार का जिक्र करते समय मैंने आपसे वादा किया था कि हम लौटकर वहाँ जाएँगे, तो चलिए वहां। आज से करीब 60 साल पहले हम सब कुतुबमीनार गए। उस ज़माने में ऊपर जाने की अनुमति थी। हमारे साथ हमारे एक अदद भारी-भरकम चची थीं, जिन्होंने ऊपर जाने से इनकार कर दिया। हम सारे बच्चे, चचा जान के साथ ऊपर गए और हम लोगों ने हर मंजिल पर पहुंचकर चचीजान को बहुत आवाजें दीं, लेकिन उन्होंने एक बार भी हमारी तरफ सिर उठाकर नहीं देखा। क्या हमारी आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी? और अगर यह सही है तो मोअज़्ज़िन की आवाज जमीन पर नीचे कैसे पहुंचता होगी?

इस सवाल का जवाब खोजने का मौका उस दिन हाथ लगा, जब नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के छात्रों को जामा मस्जिद दिखाने लेकर गया। सबसे ज्यादा शोर करने वाले चार लड़कों को मैंने टिकट खरीद कर दिए और उनसे कहा कि मीनार पर चढ़ जाओ और वहां पहुंचकर हमें आवाज दो। हम बाकी लोग मस्जिद के आंगन में बैठकर इंतजार करते रहे। आधे घंटे बाद चारों लौटे, चीखते-चीखते उनके गले बैठ गए थे, लेकिन हम में से किसी ने भी उनकी आवाज नहीं सुनी।

ऐसा क्यों हुआ? मीनार-मस्जिद और मीनार-मोअज़्ज़िन क्या संबंध है? इसके बारे में इस लेख की अंतिम किस्त में बात करेंगे।

Published: 24 Aug 2017, 8:05 PM
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