बहादुर शाह जफर के बहाने किंग थिबा की याद

अपनी म्यांमार यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के मजार पर भी गए। उसी म्यांमार के 19वीं सदी के निर्वासित राजा किंग थिबा का महल महाराष्ट्र के रत्नागिरी में है।



रत्नागिरी में किंग थिबा का पैलेस/ फोटो:Twitter
रत्नागिरी में किंग थिबा का पैलेस/ फोटो:Twitter

तसलीम खान

अप्रैल 2004 का दूसरा या तीसरा सप्ताह होगा। लोकसभा चुनाव हो रहे थे और स्टार न्यूज (आज का एबीपी न्यूज) तब मुंबई से संचालित होता था। उन दिनों मैं स्टार न्यूज में ही काम करता था और चुनाव कवर करने वाली टीम का हिस्सा था। हम इस चुनाव में देश के अलग-अलग हिस्सों में घूम-घूमकर आम लोगों के मुद्दे, प्रत्याशियों के वादे, चुनाव क्षेत्रों के गणित आदि पर आधारित कार्यक्रम बना रहे थे और अलग-अलग चुनावी चरणों के हिसाब से कुछ खास लोकसभा क्षेत्रों में विशेष कार्यक्रम भी कर रहे थे। इन्हीं कार्यक्रमों की कड़ी में हमने एक कार्यक्रम महाराष्ट्र के रत्नागिरी में भी आयोजित करने का फैसला किया था।

मुंबई से रत्नागिरी की दूरी लगभग 350 किलोमीटर है। हम सुबह करीब 10 बजे मुंबई से निकले और मुंबई-नासिक रोड से रत्नागिरी की तरफ रवाना हुए। मैं पहली बार इस रास्ते पर आया था तो एक कौतूहल भी था और उत्सुकता भी। खूबसूरत घुमावदार रास्तों, पहाड़ों से गिरते झरनों, दूर-दूर तक फैले खेतों, नारियल के बागों, छोटे-छोटे गांवों का मनोरम दृश्य हमें आनंदित करता रहा। रास्ते में चिपलून में रुक कर हमने खाना खाया और फिर आगे बढ़े।

फोटो: Google
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हम शाम करीब 7 बजे रत्नागिरी पहुंचे। हमारी एक टीम पहले से रत्नागिरी में मौजूद थी। उन्होंने चुनावी शो करने के लिए लोकेशन आदि की व्यवस्था कर रखी थी। बहरहाल, हम होटल पहुंचे और रास्ते में हुई थोड़ी बहुत थकान के कारण जल्द ही खाना खाकर सो गए।

अगली सुबह हम सबसे पहले लोकेशन देखने पहुंचे। इसी दिन शाम को हमें लाइव शो करना था। इसलिए सारी तैयारियों का जायजा लेना जरूरी था। शो के लिए थिबा पैलेस चुना गया है। मुझे उस समय तक इस पैलेस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। थिबा पैलेस पहुंचने के लिए जब हमारी गाड़ी आबादी वाले इलाके से निकलकर एक पहाड़ी की तरफ बढ़ रही थी, तो एक छोर से दूर-दूर तक समुद्र लहरें मारता नजर आ रहा था। हम लगभग इस पहाड़ी की चोटी तक पहुंच गए और एक पुरानी सी इमारत के गेट पर हमारी गाड़ी रुक गयी।

यह कोई दो-ढाई हजार वर्गमीटर का एक अहाता सा था, जिसके बीच में पुराने ढंग की एक इमारत बनी हुई थी। पूरे परिसर में काफी घास और झाड़ियां उग आई थी। इमारत के आगे बने हिस्से तक जाने वाले रास्ते में जरूर थोड़ी साफ-सफाई दिख रही थी। तभी हमें पता चला कि दरअसल यह बर्मा (अब म्यांमार) के निर्वासित राजा किंग थिबा का महल है।

जिस बर्मा में बहादुरशाह जफर को निर्वासित किया गया था, इसी बर्मा के कॉनबांग वंश के आखिरी राजा 26 वर्षीय किंग थिबा को अंग्रेजों ने बर्मा से निर्वासित कर कोई तीन हजार किलोमीटर दूर भारत के रत्नागिरी में भेज दिया था। अंग्रेजों के साथ युद्ध में बर्मा की हार के बाद 1885 में बर्मा पर अंग्रेजी शासन हो गया। अंग्रेजों ने किंग थिबा और उनके परिवार को निर्वासित कर दिया। निर्वासन के लिए अरब सागर के किनारे बसे एक टापू शहर रत्नागिरी को चुना गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी म्यांमार की यात्रा पर गए थे। उनकी यात्रा के राजनयिक और राजनीतिक पहलुओं के अलावा ये खबर भी आयी कि नरेंद्र मोदी आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के मजार पर भी गए। बहादुरशाह जफर को अंग्रेजी हुकूमत ने निर्वासित कर बर्मा भेज दिया था और वहीं उनकी मृत्यु हुयी। अपने निर्वासन के दौरान बहादुरशाह जफर भारत को बहुत याद करते थे। उनकी इस तकलीफ पर उनका एक शे’र बहुत मशहूर है:

कैसा है बदनसीब जफर, दफ्न के लिए

दो गज जमीं भी न मिली कुए यार में...

जिस बर्मा में बहादुरशाह जफर को निर्वासित किया गया था, इसी बर्मा के कॉनबांग वंश के आखिरी राजा 26 वर्षीय किंग थिबा को अंग्रेजों ने बर्मा से निर्वासित कर कोई तीन हजार किलोमीटर दूर भारत के रत्नागिरी में भेज दिया था। अंग्रेजों के साथ युद्ध में बर्मा की हार के बाद 1885 में बर्मा पर अंग्रेजी शासन हो गया। अंग्रेजों ने किंग थिबा और उनके परिवार को निर्वासित कर दिया। निर्वासन के लिए अरब सागर के किनारे बसे एक टापू शहर रत्नागिरी को चुना गया। उस समय रत्नागिरी की आबादी बमुश्किल 10-11 हजार रही होगी। शुरुआती 5-6 सालों तक किंग थिबा और उनके परिवार (इसमें उनकी महारानियां और दो बेटियां शामिल थीं) को धरंगांव में बने सर जेम्स ऑटरम के बंगले में रखा गया। इसी दौरान उनके लिए एक महल का निर्माण भी शुरु हो गया जो बाद में थिबा पैलेस के नाम से जाना गया। थिबा पैलेस को करीब बीस एकड़ जमीन पर बनाया गया था।

फोटो: Google
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किंग थिबा को शुरुआती दिनों में करीब एक लाख रुपए की पेंशन मिलती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसे कम कर दिया गया। 57 बरस की उम्र में दिंसबर 1916 में जब किंग थिबा की मृत्यु हुयी तो उनकी पेंशन 25 हजार रुपए भी नहीं थी। उनके शव को इसी महल के करीब दफ्नाया गया। कुछ दिन तक परिवार के लोग वहीं रहे और फिर एक-एक कर पूरा परिवार बिखर गया।

इसी थिबा पैलेस में आज किंग थिबा और रानी का मकबरा भी है। उनके कुछ शाही साजो-सामान का एक म्यूजियम भी यहां है और कुछ पत्र-लेख भी मिलते हैं। हमें कार्यक्रम शाम को करना था इसलिए हमारे पास थिबा पैलेस के इतिहास को समझने-जानने का वक्त था।

गुरुवार को जब खबर आयी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी म्यांमार में बादशाह बहादुरशाह जफर की मजार पर गए तो अचानक ये बात याद आ गई। थिबा पैलेस में पूरा एक दिन गुजारने के बाद बार लगा था कि अगर थिबा भी शायर होते तो शायद ऐसा ही कुछ लिखते:

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दो गज जमीं भी न मिली कूए यार में...

Published: 7 Sep 2017, 4:48 PM
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