अयोध्या ने बीजेपी की 'अतियों' से पीछा छुड़ाया!

अयोध्या को हमेशा अपना समतल तलाशते रहने की आदत है। अति किसी भी तरह की क्यों न हो, वह उसे स्वीकार नहीं करती और पहला मौका मिलते ही उसे चलता कर देती है। बीजेपी की ‘अतियों’ के साथ भी अंततः उसने यही किया।

अयोध्या ने बीजेपी की 'अतियों' से पीछा छुड़ाया!
अयोध्या ने बीजेपी की 'अतियों' से पीछा छुड़ाया!
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कृष्ण प्रताप सिंह

लोकसभा चुनाव में अयोध्या के मतदाताओं ने जिस तरह बीजेपी की कलाई मरोड़कर फैजाबाद लोकसभा सीट (जिसमें अयोध्या समाहित है) उससे छीनी और उसके प्रतिद्वंद्वी ‘इंडिया’ की घटक समाजवादी पार्टी की झोली में डाल दी, उसका त्रास बीजेपी को अरसे तक बेचैन किए रखेगा। यह भी उसकी बेचैनी का ही एक रूप है- बदहवासी का भी कि उसके खीझे हुए स्वयंभू समर्थक न सिर्फ अयोध्या और अयोध्यावासियों को खरी-खोटी और जली-कटी सुनाने पर उतर आए हैं बल्कि उनके प्रति ऐसी भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हिमाकत देखिए, वे कह रहे हैं कि अयोध्यावासी न भगवान राम के हुए, न ही उनकी पांच सौ साल की प्रतीक्षा खत्म कराने वालों के। ये बीजेपी समर्थक भगवान राम की त्रेतायुगीन प्रजा को भी नहीं बख्श रहे और अयोध्यावासियों की उससे तुलना करते हुए यह भी नहीं छिपा पा रहे कि उनका अयोध्यावासियों को अनंतकाल तक प्रजा ही बनाए रखने का मंसूबा है, नागरिक बनने देना गवारा नहीं। गवारा होता तो उनके द्वारा नागरिक के तौर पर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करके सुनाए गए फैसले को ससम्मान सिर आंखों पर लेते और ऐसी स्थिति न पैदा करते जिससे लगे कि अभी वे जनादेश का सम्मान करना ही नहीं सीख पाए हैं।

इसीलिए अयोध्या के उनकी जमात के चुनावी लाभ बढ़ाने के काम आते रहने तक वे उसके और उसके निवासियों के गुण गाते और उसके कण-कण को पवित्र बताते रहे। लेकिन जैसे ही उसने इस लाभ के लिए इस्तेमाल होने से मना किया, उनके निकट वह अघ (अपवित्र) और अवगुणों की खान हो गई और उसके निवासी खल!

लेकिन आज नहीं तो कल, बीजेपी को जब भी होश आए, उसे इस सवाल की पड़ताल करनी ही होगी कि अयोध्यावासियों ने उसकी किन कारस्तानियों को नाकाबिल-ए-माफी मानकर उसे यह सजा सुनाई है? उसके ही शब्दों में कहें तो जिन भगवान राम के मंदिर के निर्माण के मुद्दे ने उसे उसके दो लोकसभा सीटों वाले पतझड़ से ‘दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी’ के बसंत तक पहुंचाया और अवसर मिला तो जिनकी नगरी को ‘भव्य’ और ‘दिव्य’ बनाने में उसने कुछ भी उठा नहीं रखा, उसके निवासियों ने क्यों इस बार उसे लोकसभा में अपना प्रतिनिधित्व करने लायक भी नहीं समझा?


इस लिहाज से देखें तो 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और 2019 में आक्रामक होकर विवादास्पद अधूरे एजेंडे को पूरा करने की ओर बढ़ने के बाद से बीजेपी और अयोध्या का साथ ‘केर-बेर का संग’ हो गया था। न अयोध्या बीजेपी के आक्रामक हिन्दुत्व के साथ कदमताल कर पा रही थी, न ही बीजेपी को फुरसत थी कि वह अयोध्या के मर्यादाहीनता विरोधी सरल स्वभाव को ठीक से समझे।

उसने तो यह भी नहीं समझा कि अयोध्या को हमेशा अपना समतल तलाशते रहने की आदत है और अति किसी भी तरह की क्यों न हो, न वह उसे स्वीकार करती है, न ही उसके सामने सिर झुकाती है। हां, वह उससे सीधे भिड़ती भी नहीं। लेकिन पहला मौका हाथ आते ही उसका हिसाब-किताब बराबर कर उसे चलता कर देती है। बीजेपी की ‘अतियों’ के साथ भी अंततः उसने यही किया है। क्या करती, जब बीजेपी ने अपनी राजनीतिक हितसाधना के लिए न सिर्फ उसकी छाती पर मूंग दलने बल्कि उसके राम तक की अवमानना का रास्ता चुन लिया। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से बन रहे राम मंदिर को सबका बनाने के बजाय अपना और अपने लोगों का प्रोजेक्ट बना डाला और इस प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसके लोग भूमि की खरीद-बिक्री में घोटालों के आरोपों से घिरने लगे।

हद तो तब हो गई जब मंदिर निर्माण करा रहे ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने ‘सबके राम’ की परंपरा के विपरीत कह दिया कि वह शैवों, शाक्तों और संन्यासियों का है ही नहीं। फिर प्रधानमंत्री के हाथों रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को मात्र उनका ही इवेंट बना दिया गया और सुरक्षा के नाम पर अयोध्यावासियों से कह दिया गया कि वे उसे अपने घरों में बैठकर टीवी पर देखें या फिर दूसरे मंदिरों में एकत्र होकर भजन-कीर्तन करें। फिर तो रामलला का ‘वीवीआईपी दर्शन’ भी भ्रष्टाचार और अवैध धन उगाही जैसे कृत्यों से नहीं ही बच पाया।

बाद में, बीजेपी ‘जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे’ का अहमन्यताभरा नारा लगवाने लगी और कई पोस्टरों में रामलला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उंगली पकड़कर मंदिर की ओर जाते दिखाई देने लगे। इसे लेकर एतराजों की उसने रामद्रोहियों की करतूत बताकर छुट्टी कर दी। एक लोकगायिका का ‘जो सबको लाए हैं, तुम उनको लाओगे, ईश्वर से डरो साहेब!’ वाला वीडियो वायरल होने पर भी नहीं ही चेती। दूसरी ओर, चुनावी लाभ के लिए प्रधानमंत्री मोदी नया चोला धारणकर विभिन्न कर्मकांडों में धर्माचार्यों की भूमिका निभाते हुए भी अपनी भाषा असंयमित होने से नहीं बचा पाए। उनसे धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्य की कौन कहे, अयोध्या की सर्वधर्म समभाव की पुरानी परंपरा की रक्षा भी संभव नहीं हुई।


चुनाव सभाओं में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहना आरंभ किया कि लड़ाई राम भक्तों और राम द्रोहियों के बीच है। प्रधानमंत्री नुक्कड़ नेताओं के स्तर पर उतर कर कहने लगे कि कांग्रेस सत्ता में आई तो राम मंदिर पर फिर से बाबरी ताला लगा देगी, तो मतदाताओं ने चिढ़कर बीजेपी से न सिर्फ फैजाबाद बल्कि अयोध्या मंडल और उसके आसपास की प्रायः सारी सीटें भी छीन लीं।

चुनाव नतीजों के बाद अयोध्या में कई लोग कहते सुने गए कि बीजेपी को यह सजा जरूरी थी क्योंकि उसने मान लिया था कि ‘हिन्दुत्व’ के नाम पर कितनी भी मनमानियां करती रहे, अयोध्या के मतदाता उसे छोड़ेंगे नहीं। उसके लिए यह बड़ा सबक है कि अयोध्या की सैकड़ों परियोजनाओं पर केन्द्र और प्रदेश सरकार के राजकोष से कोई पचास हजार करोड़ रुपये खर्च करवाकर भी वह मतदाताओं को बिदकने से नहीं रोक पाई।

पिछले साल अयोध्या की सड़कें चौड़ी करने का अभियान चला, तो समुचित मुआवजे और पुनर्वास के वादे निभाए बिना नागरिकों के हजारों घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों को ध्वस्त कर दिया गया। वे नाराज हुए तो बेदर्द भाजपाई हलके यह आभास कराते दिखे कि इससे देश भर के राम भक्त खुश हैं और राम जी शेष देश में बीजेपी का बेड़ा पार लगा दें तो अयोध्यावासियों की नाराजगी से फैजाबाद की एक सीट हार जाना बहुत छोटी कीमत होगी।

प्रधानमंत्री ने ‘चार सौ पार’ का नारा दिया, तो अयोध्या के सांसद और बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह एक वीडियो में संविधान बदलने के लिए उसकी सफलता को जरूरी बताते नजर आए। फिर तो यह नारा भी ‘जो राम को लाए हैं...’ के नारे की तरह बैक फायर कर गया। दलित और पिछड़ी जातियों के मतदाता ‘इंडिया’ के बैनर तले एकजुट हो गए कि उनके पास बाबा साहब के संविधान और उसके दिए आरक्षण को बचाने का यह अंतिम अवसर है। वे दलित और पिछड़े भी जो 2019 में अलग-अलग कारणों से बीजेपी की ओर चले गए थे, लौट आए।

प्रशंसा करनी होगी सपा की भी कि उसने इस सीट के जातीय समीकरणों के मद्देनजर खूब सोच-समझकर अपने नौ बार के दलित विधायक अवधेश प्रसाद को प्रत्याशी बनाया। अवधेश प्रसाद समूचे प्रचार अभियान में पार्टी के इस प्रयोग को ‘क्रांतिकारी’ बताते हुए याद दिलाते रहे कि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने कभी दलितों के लिए आरक्षित लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन्हें पहली-पहल इटावा सीट से लोकसभा पहुंचाया था। इसका बड़ा असर हुआ और दलितों ने जून, 1995 के बहुचर्चित गेस्ट हाउस कांड के वक्त से ही सपा से चली आ रही दुश्मनी भूलकर उसके पक्ष में एकजुट मतदान किया।


कई हलकों में अवधेश प्रसाद की जीत की 1989 में इस सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मित्रसेन यादव को मिली जीत से तुलना की जा रही है। तब मित्रसेन की जीत ने राम मंदिर के बहुप्रचारित शिलान्यास के बाद फूली-फूली फिर रहीं विश्व हिन्दू परिषद और बीजेपी को हतप्रभ कर डाला था।

यह अयोध्या ही कर सकती है कि 1989 में सांप्रदायिक राजनीति से खफा हो, तो पिछड़ी जाति के वामपंथी को अपना सांसद चुन ले और 2024 में खफा हो, तो समाजवादी दलित को। आइए, कामना करें कि सांप्रदायिकता की राजनीति का क्लाइमेक्स देख चुकी अयोध्या के लिए यह उसका ऐंटीक्लाइमेक्स सिद्ध हो।

(कृष्ण प्रताप सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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