पंजाबः बादल परिवार को ढींडसा देंगे पंथक और कानूनी मोर्चे पर चुनौती, असली-नकली अकाली दल की जंग का हुआ आगाज

नए शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखदेव सिंह ढींडसा ने कहा कि अकाली दल का गठन मिलजुल हुआ था, लेकिन एक परिवार का कब्जा हो गया। अब हम एकजुट होकर बादल घराने का किला ढहा देंगे। पहले पड़ाव पर एसजीपीसी और दिल्ली एसजीपीसी चुनाव में बादल दल को उसकी औकात बताई जाएगी।

फोटोः अमरीक
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अमरीक

शिरोमणि अकाली दल में कभी प्रकाश सिंह बादल के बाद सबसे वरिष्ठ नेता रहे सुखदेव सिंह ढींडसा ने नए शिरोमणि अकाली दल का गठन करके सिख सियासत में एक किस्म का तूफान ला दिया है। नए शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष राज्यसभा सदस्य ढींडसा ने दो टूक कहा है कि वह बादलों की सरपरस्ती वाले शिरोमणि अकाली दल को पंथक मोर्चे के साथ-साथ कानूनी स्तर पर भी गंभीर चुनौती देंगे।

प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल के आगे ऐसी नागवार स्थिति पहली बार दरपेश हुई है कि लगभग उनकी 'जागीर' बन चुके शिरोमणि अकाली दल के वजूद को किसी कद्दावर सिख राजनेता ने खुलकर ललकारा है। अब 'असली' और 'नकली' शिरोमणि अकाली दल की जंग का भी बाकायदा आगाज हो गया है।

नया शिरोमणि अकाली दल बनाने वाले सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींडसा बादलपरस्त अकाली दल के संस्थापकों में से एक हैं। उनके बेटे परमिंदरजीत सिंह ढींडसा सूबे के पहली कतार के युवा नेताओं में शुमार हैं और अकाली-बीजेपी गठबंधन सरकार में वित्त मंत्री रहे हैं। ढींडसा पिता-पुत्र को ईमानदार सियासतदान माना जाता है।

बादलों के लिए दिक्कत का एक बड़ा सबब यह भी है कि जो मालवा उनका गढ़ है, सुखदेव सिंह ढींडसा भी वहीं के हैं। मालवा के दम पर ही बादल सत्ता हासिल करते रहे हैं। लेकिन ढींडसा परिवार का इस इलाके में अच्छा असर-रसूख है। मूल अकाली दल के आम कार्यकर्ताओं पर भी सुखदेव सिंह ढींडसा और परमिंदरजीत सिंह ढींडसा की मजबूत पकड़ है। ऐसे में ढींढसा के कदम से उनके वर्चस्व में एक बड़ी सेंध लगी है। ढींडसा बादल दल के कई अन्य सुखबीर विरोधी मालवाई नेताओं के संपर्क में हैं।

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जगजाहिर है कि सुखदेव सिंह ढींडसा और परमिंदरजीत सिंह ढींडसा ने सुखबीर सिंह बादल की कार्यशैली से नाराज होकर शिरोमणि अकाली दल से बगावत की थी, जिसका नतीजा 7 जुलाई को बना नया शिरोमणि अकाली दल है। यकीनन यह समानांतर शिरोमणि अकाली दल बादलों से खफा पुराने अकालियों की पनाहगाह बनेगा। एक अकाली विधायक ने बताया कि वह और उनके दो हमख्याल साथी कभी भी ढींडसा के साथ जा सकते हैं।

फिलहाल नाम नहीं दिए जाने की शर्त पर उन्होंने 'नवजीवन' से कहा, "प्रकाश सिंह बादल नाम मात्र को ही शिरोमणि अकाली दल के सरपरस्त हैं। असल में दल को सुखबीर सिंह बादल, बिक्रमजीत सिंह मजीठिया और उनकी मंडली चला रही है। पार्टी अपने मूल एजेंडे से भटक गई है। सत्ता मोह में इसे भी दरकिनार कर दिया गया है कि संघीय ढांचे की पुख्ता पैरवी के साथ शिरोमणि अकाली दल का गठन हुआ था। बीजेपी इस पर एक के बाद एक प्रहार कर रही है, लेकिन अकाली दल के कॉरपोरेट मैनेजर इस पर दोगला रवैया अख्तियार किए हुए हैं।"

नए शिरोमणि अकाली दल के रहनुमा सुखदेव सिंह ढींडसा कहते हैं, "शिरोमणि अकाली दल को मिलजुल कर बनाया गया था, लेकिन उस पर एक परिवार का कब्जा हो गया। सुखबीर सिंह बादल को दुनिया भर के लालच हैं और ढलती उम्र में प्रकाश सिंह बादल को पुत्र और पुत्रवधू के हितों का लालच! मालवा ही नहीं बल्कि पूरे पंजाब के अकाली कार्यकर्ता हमारे संपर्क में हैं। वे इंतजार कर रहे थे कि कब नया अकाली दल बने और उन्हें उनका असली मुकाम और सम्मान मिले। हम अपने साथ आने वाले तमाम अकाली कार्यकर्ताओं के साथ एकजुट होकर बादल घराने का सियासी किला ढहा देंगे। पहले पड़ाव पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और दिल्ली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव में बादल दल को उसकी औकात बताई जाएगी।"

दरअसल, दोनों शिरोमणि अकाली दलों के बीच जमीनी स्तर पर पहला मुकाबला एसजीपीसी के आम चुनाव में होगा। एसजीपीसी पर फिलहाल बादल गुट का कब्जा है, लेकिन काफी सदस्य सुखदेव सिंह ढींडसा के संपर्क में हैं। दिल्ली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष और बादलों से बागी हुए मनजीत सिंह जीके भी ढींडसा के साथ हैं। दिल्ली की सिख राजनीति में मनजीत सिंह जीके का अच्छा प्रभाव है। नए शिरोमणि अकाली दल के गठन के मौके पर वह विशेष तौर पर दिल्ली से लुधियाना जाकर शामिल हुए।

मनजीत सिंह जीके के अनुसार, "पंजाब और दिल्ली में बादलों को बेमिसाल चुनौती दी जाएगी। आने वाले दिनों में बादलों के तमाम भ्रम टूट जाएंगे।" बलवंत सिंह रामूवालिया, सेवा सिंह सेखवां, तलवंडी परिवार और बीबी गुलशन कौर भी ढींडसा खेमे में शामिल हो गए हैं। इन सब की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के मतदाताओं में अच्छी-खासी पैठ है। रामूवालिया कहते हैं, "बादल दल एसजीपीसी के खर्चे पर सब कुछ करता है। आम सिख इसे जानते हैं, लेकिन पहले उनके पास विकल्प नहीं था और अब ढींडसाजी ने बदल दे दिया है।"

बहरहाल, अकाली दल अपने सौ साल के इतिहास में 7 जुलाई को 21वीं बार टूटा है, लेकिन इस बार की टूट सामान्य नहीं, असाधारण है। प्रकाश सिंह बादल को ऐसा झटका पहले कभी नहीं लगा और सुखबीर बादल को भी पहली बार लगा है। ऐसे में तय है कि अपने अकाली दल के वजूद को बरकरार और मजबूत रखने के लिए पुराने अकालियों में आने वाले दिनों में बड़ी जंग होगी। अब देखना होगा कि इस जंग में जीत किस अकाली खेमे की होती है।

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