खतरे में दोबारा महाराष्ट्र जीतने का बीजेपी का सपना, शिवसेना से भी भीतरी चुनौती, लगाया पूरा जोर

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हालत यह है कि राज्य में बसे 40 लाख से ज्यादा हिंदी भाषी, उत्तर-भारतीयों को अपनी तरफ रिझाने के लिए उसे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के जिलास्तरीय नेताओं तक को अपने प्रचार अभियान में उतारना पड़ा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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आईएएनएस

महाराष्ट्र में जबर्दस्त सत्ताविरोधी लहर का सामना कर रही बीजेपी ने राज्य विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। दिल्ली से कई राष्ट्रीय नेताओं को चुनाव प्रबंधन के लिए महाराष्ट्र के मोर्चे पर लगाना पड़ा है। इसके पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं। दरअसल, महाराष्ट्र में जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही बीजेपी के लिए पीएमसी बैंक घोटाले ने नई मुश्किल खड़ी कर दी है। वहीं किसानों की समस्या पहले से पार्टी को परेशान किए हुए है।

इसके अलावा जो सबसे बड़ी परेशानी है, वह ये है कि महाराष्ट्र में बीजेपी की लड़ाई कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से तो है ही, अंदरखाने शिवसेना उसके लिए भारी चुनौती बनी हुई है। बीजेपी के एक बड़े नेता ने कहा, “देश के हर हिस्से की तरह महाराष्ट्र में भी विपक्ष बीजेपी का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। सच तो यह है कि महाराष्ट्र में हमारी लड़ाई विपक्ष से कम, शिवसेना से ज्यादा है।”

वहीं, सूत्रों का कहना है कि अगर शिवसेना पिछली बार से ज्यादा सीटें पाने में सफल रही तो वह सरकार में अपनी हिस्सेदारी को लेकर मोलभाव पर उतर आएगी। इससे आशंकित बीजेपी की कोशिश है कि वह अकेले पूर्ण बहुमत के आंकड़े को छू ले, जिससे शिवसेना की बैसाखी के सहारे की जरूरत ही न पड़े। यही वजह है कि पार्टी ने महाराष्ट्र में पूरी ताकत झोंक दी है।

बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर गोवा के सीएम प्रमोद सावंत और उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या लगातार महाराष्ट्र में डटे हुए हैं। मौर्या महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के सह प्रभारी भी हैं। बीजेपी की हालत यह है कि महाराष्ट्र में बसे 40 लाख से ज्यादा हिंदी भाषी, उत्तर-भारतीयों का वोट पाने के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के जिलास्तरीय नेताओं तक को यहां जनसंपर्क अभियान में उतारना पड़ा है।

शीर्ष नेताओं की बात करें तो बीजेपी के दो राष्ट्रीय महासचिव- भूपेंद्र यादव और सरोज पांडेय ने तो राज्य में एक महीने से भी अधिक समय से डेरा डाल रखा है। भूपेंद्र यादव जहां महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव प्रभारी हैं, तो सरोज पांडेय राज्य प्रभारी हैं। दोनों नेता राज्य के चुनाव प्रबंधन में इस कदर व्यस्त हैं कि इस दौरान वे दिल्ली आने के लिए भी समय नहीं निकाल पा रहे हैं।

बीजेपी में माना जाता है कि भूपेंद्र यादव को पार्टी अमूमन संकट वाले राज्यों में भेजती रही है। ऐसे में महाराष्ट्र में उनकी तैनाती का मतलब साफ समझा जा सकता है। इसके अलावा केंद्रीय मंत्रियों की बात करें तो बीजेपी के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी, पीयूष गोयल और स्मृति ईरानी भी महाराष्ट्र में अपना पूरा जोर लगाए हुए हैं। हालत ये है कि गडकरी और ईरानी की एक-एक दिन में कई रैलियां हो रही हैं।

खास बात यह है कि बीजेपी ने महाराष्ट्र चुनाव में मीडिया प्रबंधन के लिए भी अपने दोनों शीर्ष पदाधिकारियों को लगा रखा है। इसमें राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी और सह प्रभारी और बिहार के एमएलसी संजय मयूख हैं। जबकि महाराष्ट्र के साथ ही हो रहे हरियाणा में मीडिया प्रबंधन का काम राष्ट्रीय प्रवक्ता सुदेश वर्मा ही देख रहे हैं। मगर महाराष्ट्र की तरह यहां राष्ट्रीय नेताओं का जमावड़ा कम है।

सूत्र बताते हैं कि महाराष्ट्र पर बीजेपी के इस खास फोकस के पीछे कई वजहें हैं। एक तो हरियाणा में सिर्फ 90 सीटें हैं, वहीं महाराष्ट्र में 288 विधानसभा सीटें हैं। दूसरी बात कि महाराष्ट्र में बहुत ज्यादा चुनौतियां हैं। महाराष्ट्र में विपक्ष काफी मजबूत है। लेकिन बीजेपी को यहां दोहरी चुनौती से जूझना पड़ रहा है। एक तरफ उसे कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से लड़ना है तो दूसरी तरफ सीट बंटवारे से लेकर अब तक उसकी गठबंधन सहयोगी शिवसेना से विभिन्न मसलों पर नूराकुश्ती हलकान किए हुए है।

बता दें कि साल 2014 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन टूटने पर राज्य की सभी 288 विधानसभा सीटों पर अलग-अलग लड़ने पर बीजेपी को 122 सीटें मिलीं थीं, जबकि शिवसेना को सिर्फ 63 सीट हासिल हुईं थीं। जबकि कांग्रेस और एनसीपी को क्रमश: 42 और 41 सीटें मिलीं थीं। पूर्ण बहुमत से 20 सीटें कम रह जाने के कारण तब बीजेपी को शिवसेना के समर्थन से सरकार बनानी पड़ी थी।

इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन के कारण सिर्फ 150 सीटों पर खुद लड़ रही है, वहीं 14 सीटों पर उसके ही सिंबल पर अन्य सहयोगी दल लड़ रहे हैं। जबकि शिवसेना 124 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। ऐसे में बीजेपी को लगता है कि इस बार कम सीटों पर चुनाव लड़ने के कारण अगर पिछली बार से कम सीटें आईं और शिवसेना की सीटें बढ़ीं तो बीजेपी के लिए मुश्किलें होंगी।

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