गुजरात चुनाव : जाति और जीएसटी से बिगड़ी बीजेपी की बिसात

आखिर बार-बार गुजरात जा क्यों रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी? यह तो तथ्य है कि ये सब चुनावी रणनीति का हिस्सा है, लेकिन इतनी बेचैनी और बेताबी क्यों?

नवजीवन  ग्राफिक्स
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तसलीम खान @TasleemKhan

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को गुजरात का दौरा किया। इस महीने यानी अक्टूबर में उनका ये तीसरा गुजरात दौरा था। वैसे इस साल गुजरात में उनका यह नौवां दौरा था। इन दौरों में उन्होंने तमाम उद्घाटन, शिलान्यास और परियोजनाओं की घोषणा की। माना जा रहा है कि गुजरात चुनाव की तारीखों का ऐलान होने से पहले शायद प्रधानमंत्री का यह आखिरी गुजरात दौरा था। लेकिन सवाल यह है कि आखिर बार-बार गुजरात जा क्यों रहे हैं प्रधानमंत्री? यह तो तथ्य है कि ये सब चुनावी रणनीति का हिस्सा है, लेकिन इतनी बेचैनी और बेताबी क्यों? जवाब के लिए कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं:

गुजरात में बिना नेता की बीजेपी

मोदी और बीजेपी की दिक्कत यह है कि उसके पास गुजरात में कोई नेता ही नहीं है। दरअसल 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनकर दिल्ली चले जाने के बाद बीजेपी की दिक्कतें गुजरात में लगातार बढ़ती रही हैं। गुजरात में बीजेपी नेतृत्व को लेकर एक शून्य पैदा हो गया है, जो अभी तक बरकरार है। इसका असर बीते तीन सालों के दौरान गुजरात में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों के नतीजों पर भी साफ देखने को मिला है। इन चुनावों में कांग्रेस ने न सिर्फ बीजेपी से अपने अंतर को कम किया है बल्कि कुछ जगह पर तो उसने 2014 के बाद बीजेपी को शिकस्त भी दी है।

कांग्रेस का बढ़ता जनाधार और लोकप्रियता

गुजरात में मोदी की गैर मौजूदगी का खामियाजा बीजेपी भुगत रही है। 2009 के गुजरात विधानसभा चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच 9.49 फीसदी वोटों का अंतर था, जो 2012 के चुनाव में घटकर 9 फीसदी रह गया था, जबकि उस समय तो नरेंद्र मोदी ही मुख्यमंत्री थे। 2014 में मोदी के आक्रामक प्रचार की बदौलत बीजेपी ने अपने 2009 के 46.5 फीसदी वोट शेयर को 59.1 फीसदी तक पहुंचा दिया। और कांग्रेस का वोट शेयर 43.2 से घटकर 32.9 पर पहुंच गया था।

गुजरात चुनाव : जाति और जीएसटी से बिगड़ी
बीजेपी की बिसात

लेकिन, कांग्रेस ने 2014 लोकसभा चुनावों के बाद हुए पंचायत चुनावों में जबरदस्त वापसी की। 2010 में जहां कांग्रेस सिर्फ एक जिले की पंचायत में सत्तारुढ़ थी और बीजेपी 30 जिलों में। लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 2015 में हुए पहले पंचायत चुनावों में कांग्रेस ने 24 जिलों में जीत दर्ज की और उसका वोट शेयर 47.85 फीसदी पहुंच गया। बीजेपी सिर्फ 6 जिलों में ही जीत दर्ज कर पाई।

वहीं 2010 के तालुका चुनावों में कांग्रेस के हिस्से में 230 में से सिर्फ 26 तालुका ही आए थे, लेकिन 2015 में कांग्रेस ने 46 फीसदी वोटों के साथ 134 तालुका में जीत दर्ज की। वहीं बीजेपी की जीत 150 तालुका से घटकर सिर्फ 67 रह गई और उसका वोट शेयर 48.51 से घटकर 42.32 फीसदी पहुंच गया।

गुजरात चुनाव : जाति और जीएसटी से बिगड़ी
बीजेपी की बिसात

गुजरात के शहरों, कस्बों, गांवों और तालुका में अंदर-अंदर चल रही कांग्रेस की लहर अब खुलकर सामने आ गई है। इसी से परेशान है बीजेपी और नरेंद्र मोदी। इसके अलावा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाल के गुजरात दौरों में उमड़ी भीड़, पाटीदार समाज का कांग्रेस से जुड़ाव, बीजेपी की जोड़-तोड़ और साम-दाम-दंड-भेद नीति के भांडाफोड़ से साफ संकेत मिल रहे हैं कि गुजरात की हवा बीजेपी के अनुकूल तो नहीं है।

गुजरात का जातीय समीकरण

2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी ने वडोदरा और वाराणसी दोनों जगह से चुनाव जीता था। लेकिन उन्होंने वाराणसी से सांसद रहने का फैसला किया और वडोदरा से इस्तीफा दे दिया। इस नाते वडोदरा की सीट भले ही बीजेपी के पास हो, लेकिन उसका प्रधानमंत्री से कोई नाता नहीं रह गया, और इसी के साथ टूट गया मोदी और गुजरात का रिश्ता। देखते देखते बहुत सारे सियासी खिलाड़ी मैदान में आ गए। पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग को लेकर हार्दिक पटेल ने पूरे गुजरात का दौरा किया और उनकी सभाओं में खूब भीड़ उमड़ी। हार्दिक की मांग है कि पटेलों को ओबीसी के तहत ही आरक्षण दिया जाए। गुजरात में पटेलों को ओबीसी का दर्जा हासिल नहीं है।

गुजरात की कुल आबादी में पटेलों की हिस्सेदारी 12 फीसदी है। गुजरात की राजनीति और कारोबार में उनका दबदबा हमेशा से रहा है। लेकिन युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी ने इस समाज को आरक्षण के लिए खड़े होने के मजबूर कर दिया। इस दौरान हार्दिक पटेल भी करीब एक साल के बनवास के बाद गुजरात आ गए हैं और पूरे राज्य में घूम-घूमकर बीजेपी विरोधी माहौल को हवा दे रहे हैं।

हार्दिक पटेल के प्रभाव का अंदाजा इसी से लगया जा सकता है कि नितिन पटेल और सौरभ पटेल जैसे पटेल समाज के ताकतवर नेता जनसभा तक नहीं कर पा रहे हैं। इस साल इन दोनों नेताओँ को पटेल बहुल इलाकों में अपनी जनसभाएं रद्द करनी पड़ीं।

ओबीसी का कोण

बात यहीं खत्म नहीं होती। बड़े और प्रभावी ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर ने भी हार्दिक के समानांतर आंदोलन शुरु कर दिया और मांग की कि पटेलों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। अल्पेश ठाकुर ओबीसी, एससी-एसटी एकता मंच और गुजरात क्षत्रिय ठाकुर सेना के अध्यक्ष हैं। अपनी रैलियों में ठाकुर दावा करते रहे हैं कि गुजरात की कुल आबादी में ओबीसी, एससी और एसटी की हिस्सेदारी 78 फीसदी है। उनका आरोप है कि इतनी बड़ी आबादी के बावजूद इन जातियों और समुदायों को बीजेपी सरकार ने पिछले 22 वर्षों से अनदेखा कर रखा है। अल्पेश ठाकुर ने सोमवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस का हाथ थाम लिया। उनके इस कदम का हार्दिक पटेल ने स्वागत भी किया है।

जहां तक गुजरात में अलग-अलग जातियों की आबादी की बात है, तो जातिगत जनसंख्या के आंकड़े 1931 के ही उपलब्ध हैं, और इसके मुताबिक गुजरात में ओबीसी समुदायों की आबादी 40 फीसदी है। वैसे 2011 की जनगणना के दौरान जातीय जनगणना भी हुई थी, लेकिन उसके आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। फिर भी एक बात तो तय है कि गुजरात की आधी से ज्यादा आबादी ओबीसी समुदाय से है। ऐसे में क्या बीजेपी इन समुदायों को नाराज कर सत्ता पर काबिज हो सकती है।

दलितों का गुस्सा

गुजरात के दलित भी बीजेपी से बेहद नाराज हैं और उना की घटना के बाद तो उनका गुस्सा खुलकर सामने आया है। उना में एक दलित परिवार के युवाओं को स्वंयभू गौरक्षकों ने गौहत्या के शक में बुरी तरह मारा-पीटा था। इस घटना के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और बीजेपी की बहुत छीछालेदार हुई थी। पेशे से वकील दलित नेता जिग्नेश मेवानी दलितों के अधिकारों और उनकी एकता के लिए लगातार आवाज उठा रहे हैं। वे दलितों को बीजेपी के खिलाफ एकजुट करने में लगे हुए हैं। उना की घटना के बाद आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था। हालांकि उन्हें हटाए जाने के पीछे हार्दिक पटेल के आंदोलन को ठीक से न संभाल पाने को भी वजह बताया गया। लेकिन बीजेपी ने अधिकारिक तौर पर यह कहा था कि आनंदीबेन अधिक उम्र के कारण सक्रिय राजनीति से रिटायर हो रही हैं।

उना की घटना के बाद से जिग्नेश मेवानी लगातार दलितों पर गुजरात में हो रहे अत्याचारों की घटनाओं को उठाते रहे हैं। इससे बीजेपी की दिक्कतें लगातार बढ़ती चली जा रही हैं। अत्याचार की इन घटनाओं से गुस्साएं दलित प्रदर्शनकरियों ने पिछले साल दलित सांसद कीर्ति सोलंकी और असरवा के विधायक रजनीकांत पटेल के घर का घेराव भी किया था।

इन सब तथ्यों और जातिगत समीकरणों के बीच क्या जीएसटी में रियायत का लॉलीपॉप गुजरातियों को लुभा पाएगा? और क्या अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओबीसी और पटेलों को बीजेपी के लिए रिझा पाएंगे? जीएसटी से कारोबारी मान भी जाएं, तो भी दलितों और मुस्लिमों को कैसे मनाएंगे, क्योंकि गुजरात में दोनों की संयुक्त आबादी करीब 32 फीसदी है।

नोटबंदी और जीएसटी से परेशान है बीजेपी!

नोटबंदी और जीएसटी ने गुजरात के कारोबारियों की हालत खराब कर दी है और वे बीजेपी से बुरी तरह नाराज हैं। गुजराती कारोबारी नोटबंदी और जीएसटी के खिलाफ आवाज़े उठाते रहे हैं। शायद इसीलिए हाल ही में गुजरात के कारोबारियों को ध्यान में रखते हुए जीएसटी नियमों में कुछ बदलाव किए गए थे, और पीएम ने ऐलान किया था कि गुजरात के लिए समय से पहले ही दिवाली आ गई। ध्यान रहे कि जीएसटी काउंसिल की घोषणाओं से पहले पीएम ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और वित्त मंत्री अरुण जेटली से लंबी बातचीत की थी।

इस मुद्दे पर पीएम की बेचैनी का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि मोदी ने केरल दौरे पर गए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को बीच अभियान में दिल्ली तलब कर लिया था। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने वित्त मंत्री अरुण जेटली को खास निर्देश दिए थे कि गुजरात के कारोबारियों को ध्यान में रखते हुए जीएसटी में बदलाव किया जाए।

ऐसे में इस बार गुजरात चुनाव में क्या होने वाला है, कहना तो जल्दबाजी होगी, लेकिन संकेत बहुत कुछ कह रहे हैं।

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