लोकतंत्र के पन्ने: लोकसभा चुनाव 1999, जब पहली बार कोई गैर कांग्रेसी सरकार ने पूरे किए पांच साल

1999 लोकसभा चुनाव में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार को पूर्ण बहुमत मिला था। भारतीय जनता पार्टी अकेले चुनाव में नहीं गई। उसके साथ 20 पार्टियों का गठबंधन था। कई दूसरी पार्टियां जो एनडीए का हिस्सा नहीं थीं, उन्होंने भी चुनाव बाद समर्थन देने का वायदा किया।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

1998 के चुनावों के बाद बीजेपी के नेतृत्व में 20 पार्टियों ने मिलकर एनडीए का गठन किया और केंद्र में उसकी सरकार बन गई। अटल बिहारी वाजपेयी इस बार विश्वास के साथ प्रधानमंत्री चुने गए, लेकिन इस बार उनकी सरकार 13 महीने ही चल पाई। इस दौरान वाजपेयी सरकार को लगातार किसी न किसी की ओर से धमकियां मिलती रही। कभी उनकी अपनी पार्टी में बगावत हुई और उमा भारती उसकी अगुवा बनी और कभी जयललिता ने उन्हें परेशान किया। 17 अप्रैल 1999 को यह सरकार विश्वासमत प्राप्त नहीं कर सकी और केवल एक वोट से सरकार का पतन हो गया। दरअसल अन्ना डीएमके की नेता जयललिता चाहती थीं कि तमिलनाडु की डीएमके सरकार को बर्खास्त किया जाए लेकिन वाजपेयी इसके लिए तैयार नहीं थे। ऐन वक्त पर संसद में हुई वोटिंग में अन्ना डीएमके ने सरकार के खिलाफ वोटिंग की और सरकार हार गई यानी पहले वाजपेयी 13 दिन तक और उसके बाद 13 महीने तक प्रधानमंत्री रहे। चूंकि कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी, इसलिए राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने नए चुनावों की घोषणा कर दी।

चुनावों के बाद नतीजे आए तो पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार को पूर्ण बहुमत मिला था। भारतीय जनता पार्टी अकेले चुनाव में नहीं गई। उसके साथ 20 पार्टियों का गठबंधन था। कई दूसरी पार्टियां जो एनडीए का हिस्सा नहीं थीं, उन्होंने भी चुनाव बाद समर्थन देने का वायदा किया। एनडीए को 269 सीटें मिलीं और उसे तेलुगु देशम के 29 सदस्यों का बाहर से समर्थन प्राप्त था। बीजेपी अकेले 182 सीटों पर जीतने में कामयाब रही थी। इस बार चुनावी इतिहास में बीजेपी के सबसे ज्यादा सांसद चुनकर आए थे। बीजेपी की सहयोगी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) को भी 21 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। शिवसेना 15 और डीएमके के 12 उम्मीदवार चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे।

दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में चुनाव में उतरी। पर एनडीए के मुकाबले कांग्रेस के साथ बहुत कम पार्टियां थीं। कांग्रेस का गठबंधन एनडीए के मुकाबले कमजोर था। कांग्रेस के महज 114 उम्मीदवार ही चुनाव जीत पाए थे। कांग्रेस की सहयोगी पार्टी एआईडीएमके को 10 और आरजेडी को 7 सीटों पर जीत मिली थी। लेफ्ट भी इस चुनाव में पीछे छूट गई। सीपीआई ने तो अपनी राष्ट्रीय पार्टी का स्टेटस ही गंवा दिया। सीपीआई को महज चार सीटें मिलीं। तो वहीं सीपीएम ने 33 सीटों पर जीत दर्ज की थी। समाजवादी पार्टी के 26 उम्मीदवार संसद पहुंचे थे। बहुजन समाज पार्टी ने भी 14 सीटों पर जीत हासिल की थी। इतिहास में पहली बार कोई गैर कांग्रेसी सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाई। इससे पहले 1977, 1989 और 1996 में भी गैर कांग्रेसी सरकार बनाने की कोशिश की गई लेकिन कोई भी पांच साल का कार्यकाल पूरी नहीं कर सकी। पहली बार वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में एनडीए ने पांच साल पूरे किए।

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