ममता बनर्जी ने टीएमसी में व्यापक संगठनात्मक फेरबदल किया, वफादारों, अनुभवी नेताओं पर भरोसा जताया
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि यह महज पुनर्गठन नहीं है। ऐसे समय में जब पार्टी अपने सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है, ममता बनर्जी उन नेताओं पर भरोसा जता रही हैं जिनकी वफादरी दशकों से परखी जा चुकी है। इन नियुक्तियों में यही रणनीति झलकती है।

तृणमूल कांग्रेस के 28 वर्ष के इतिहास में पहली बार फूट पड़ने के बाद अस्तित्व के संकट से जूझ रही अपनी पार्टी पर पकड़ मजबूत करने का संकेत देते हुए पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने शुक्रवार को पार्टी में व्यापक संगठनात्मक फेरबदल किया जिसमें उन्होंने अपने वफादारों और अनुभवी नेताओं पर भरोसा जताया है।
ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद एक नयी संगठनात्मक कमेटी की घोषणा की गई। इस नयी कमेटी से यह साफ संकेत मिलता है कि पार्टी हाल के वर्षों में राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में उभरे नयी पीढ़ी के नेताओं से कुछ दूरी बना रही है। अभिषेक को हालांकि राष्ट्रीय महासचिव पद पर बरकरार रखा गया लेकिन पार्टी ने उनकी सहायता के लिए राज्यसभा सदस्यों डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को राष्ट्रीय संयुक्त सचिव नियुक्त किया है।
तृणमूल नेतृत्व के पूरे पश्चिम बंगाल में पार्टी की सभी समितियों और अग्रिम मोर्चों को भंग किये जाने के दो दिन बाद ये बदलाव किये गये। यह कदम पार्टी के विधायकों के एक बड़े समूह के विद्रोह के बाद उठाया गया है, जिन्होंने हाल में चुनावी हार के बाद पार्टी नेतृत्व को सीधी चुनौती दी है।
एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय में, वरिष्ठ मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया और उन्होंने सुब्रत बक्शी का स्थान लिया। पार्टी सूत्रों ने बताया कि बख्शी ने उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए बार-बार अनुरोध किया था।
नयी राज्य कमेटी में ममता बनर्जी का पुराने सदस्यों और वफादारों पर भरोसा साफ तौर पर दिखाई देता है। हालांकि, पुनर्गठित संगठनात्मक संरचना से फिरहाद हकीम की अनुपस्थिति भी उतनी ही चौंकाने वाली है। ममता बनर्जी के दो दशकों से अधिक समय तक भरोसेमंद सहयोगी और पार्टी के सबसे जाने-माने अल्पसंख्यक चेहरों में से एक हकीम ने कोलकाता के महापौर पद से इस्तीफा दे दिया है।
ममता बनर्जी के प्रति व्यक्तिगत रूप से वफादार माने जाने वाले और पुराने नेताओं में से कई को महत्वपूर्ण पद सौंपे गए हैं, जबकि अभिषेक बनर्जी के करीबी माने जाने वाले कई युवा नेता इस सूची से गायब पाए गए। सजदा अहमद, ममता ठाकुर, नयना बंद्योपाध्याय और स्वाति खांडेकर को पश्चिम बंगाल प्रदेश तृणमूल कांग्रेस कमेटी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। बाबर अली, पुलक रॉय, आशिमा पात्रा, अरूप बिस्वास और राजीव बनर्जी को राज्य महासचिव बनाया गया है।
इनके अलावा ज्योतिप्रिय मल्लिक, राणा चटर्जी, त्रिनानकुर भट्टाचार्य, जया दत्ता, तापस चटर्जी, वसुंधरा गोस्वामी और गौतम देब को कार्यकारी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। सायनी घोष को तृणमूल युवा कांग्रेस का अध्यक्ष और मधुरिमा ठाकुर को महासचिव के रूप में पुनः नियुक्त किया गया है। माला रॉय को महिला तृणमूल कांग्रेस का अध्यक्ष नामित किया गया है और प्रियंका अधिकारी को तृणमूल छात्र परिषद का प्रभार दिया गया है।
इसके अलावा मदन मित्रा को हॉकर्स संगठन का प्रभार, बेचाराम मन्ना को किसान इकाई का, पूर्णेंदु बोस को कृषि श्रमिक इकाई का और बिरबाहा हांसदा को अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ का प्रभार सौंपा गया। चंद्रिमा भट्टाचार्य, कल्याण बनर्जी, मदन मित्रा और कुणाल घोष पार्टी के प्रवक्ता होंगे, जबकि सुभाषिश चक्रवर्ती को कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इस प्रक्रिया को महज एक सामान्य फेरबदल से कहीं अधिक बताया।एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, ‘‘यह महज पुनर्गठन नहीं है। ऐसे समय में जब पार्टी अपने सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है, ममता बनर्जी उन नेताओं पर भरोसा जता रही हैं जिनकी वफादरी दशकों से परखी जा चुकी है। इन नियुक्तियों में यही रणनीति झलकती है।’’
तृणमूल कांग्रेस को बुधवार को अपने 28 साल के इतिहास में पहली फूट का सामना करना पड़ा, जब पार्टी के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता रिताब्रता बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुनकर विधायक दल पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके साथ ही उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता भी प्राप्त कर ली, जिससे ममता बनर्जी की पार्टी अपने गठन के बाद से अब तक के सबसे गंभीर आंतरिक संकट में घिर गई।
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