यूपी तो बाद में, मायावती पहले अपना भविष्य तय कर लें, बीजेपी के सामने हथियार डालकर उसी से प्रदेश को कैसे बचाएंगी

सीएए-एनआरसी के खिलाफ आंदोलन में बीएसपी कहीं नहीं दिखी, अनुच्छेद-370 हटाए जाने का मायावती ने समर्थन ही किया, तीन तलाक विधेयक पर सदन के बहिष्कार से लाभ बीजेपी को ही हुआ और सबसे बड़ी बात सात महीने से चल रहे किसान आंदोलन से भी वह बिल्कुल ही गायब हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया
user

नवजीवन डेस्क

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने नारा दिया हैः यूपी को बचाना है, सर्वजन को बचाना है, बीएसपी को सत्ता में लाना है और जरूर लाना है। यूपी में राजनीतिक और पत्रकारिता वर्गों के कई लोग अपना दिमाग भिड़ा रहे हैं कि इससे पहले उन्होंने कब-कब यूपी को बचाने के प्रयास की बात कही है। उनकी जो सबसे जोरदार बात दिमाग में आती है, वह है मूर्तियां बनवाने वाली उनकी योजनाएं: उन्होंने अपनी प्रतिमाएं लगवाईं, दलित नेता कांशीराम और संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर की मूर्तियां स्थापित कीं।

उन्होंने हाथियों की भी काफी सारी प्रतिमाएं लगवाईं। दलित नेताओं को समर्पित पार्क और स्मारक बनवाने के लिए उन्होंने सार्वजनिक स्थानों का अधिग्रहण भी किया। ताज कोरिडोर बनवाने का भी उन्होंने प्रयास किया जिसके तहत आगरा में ताजमहल के पीछे के हिस्से को व्यावसायिक तौर पर विकसित करना था। इसके लिए मॉल तो बनने ही थे, होटल और रिसॉर्ट भी बनवाने थे!

और हां, राजा भैया उर्फ रघुराज प्रताप सिंह के खिलाफ उनके अभियान को भी लोग याद करते हैं। राजा भैया की पहचान डॉन के तौर पर थी और तब वह समाजवादी पार्टी के करीब थे। मायावती ने उन्हें जेल में बंद कर दिया था, उनकी संपत्तियां जब्त कर ली थीं और उन्हें टीस झेलने को छोड़ दिया था। इसके जरिये उन्होंने डॉन से नेता बने सभी लोगों को संदेश देने की कोशिश की थी। लेकिन उससे आगे कुछ नहीं हुआ। ऐसे में, ‘यूपी बचाना है, सर्वजन को बचाना है’ नारे का क्या मतलब?

मायावती को 2007 में जिस तरह विधानसभा में अपने दम पर बहुमत मिला था, तब भी उन्होंने इस दिशा में कुछ नहीं किया। तब कुल 403 में से 206 सीटें उनकी पार्टी को मिली थीं और उनका वोट शेयर 30.5 प्रतिशत था। उस वक्त त्रिशंकु विधानसभा, मिली-जुली सरकारें, राजनीतिक अनिश्चितता, पालाबदल आम बात थी। उस वक्त ऐसी जीत से वास्तविक सामाजिक बदलाव की अपेक्षाएं जन्मी थीं लेकिन मायावती जिस तरह अपनी ही छवि निखारने में आत्ममुग्ध हो गई थीं, उससे सबकुछ धूल-धुसरित हो गया। मूर्तियां लगाने का अभियान उस वक्त ही उन्होंने चलाया। हां, हर 15 जनवरी को अपने जन्मदिन पर वह भारी-भरकम हीरे जड़े आभूषण पहने भी दिखनी लगीं।


उस वक्त उनके प्रधान सचिव रहे और अब कांग्रेस नेता पी. एल. पूनिया कहते भी हैं कि ‘अपनी सरकार पर उनका जिस तरह पूर्ण नियंत्रण था, वह सचमुच वास्तविक बदलाव ला सकती थीं। लेकिन वह इसमें पूरी तरह विफल रहीं। उनमें शासन करने के तौर-तरीकों की समझ नहीं है।’ लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार भी कहते हैं कि ‘जब भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए विपक्ष में एकता समय की जरूरत है, मायावती की अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा, दरअसल, भाजपा को वॉकओवर दे देना है। मेरा तो मानना है कि यूपी को इस वक्त उनसे बचाना समय की जरूरत है।’

इस वक्त उत्तर प्रदेश में विपक्ष को उस तरह की जरूरत है जैसा बीजेपी के खिलाफ पश्चिम बंगाल में हुआ- दौड़ में जो सबसे आगे है, उसके पीछे बीजेपी-विरोधी सभी शक्तियों का एकजुट होना। 2015 में यही बिहार में भी हुआ था। उस समय थोड़े ही दिनों पहले नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे और उनकी कथित सुनामी को बिहार में राष्ट्रीय जनता दल-जनता दल (यूनाइटेड)-कांग्रेस गठबंधन ने थाम लिया था। लेकिन मायावती तो पल में तोशा, पल में माशा वाली राजनीति करती हैं।

पिछले साल अक्टूबर अंत में विधान परिषद सदस्य चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी को हराने के लिए भाजपा तक को समर्थन देने की घोषणा तो की ही, यह भी कह दिया कि गठबंधन के लिए 1995 का मुकदमा वापस लेना उनकी ‘गलती’ थी। समाजवादी पार्टी के साथ यह गठबंधन 2019 लोकसभा चुनावों के वक्त हुआ था। हालांकि इस गठबंधन के परिणाम ने संभावनाओं के द्वार भी खोले थे, फिर भी मायावती नाराज हैं। ठीक है कि आम चुनावों के कारण इसे उतनी सफलता नहीं मिल पाई थी, लेकिन दोनों पार्टियों ने मिलकर 15 सीटें जीती थीं जिनमें बीएसपी की संख्या दस रही। दोनों का सम्मिलित वोट शेयर 40 प्रतिशत था। तब भी मायावती ने एक माह बाद ही गठबंधन से अलग हो जाने की एकतरफा घोषणा कर दी। कई लोगों का मानना है कि ऐसा उन्होंने उनके खिलाफ दायर मामलों की वजह से बीजेपी के दबाव के कारण किया।

अगर बीजेपी को हराकर यूपी को बचाना है, तो आखिर, मायावती की क्या योजना है, यह रहस्य ही है। लोकसभा चुनावों के बाद से वह राजनीतिक आदोलनों से लगभग गायब ही रही हैं। इससे वस्तुतः बीजेपी को ही फायदा हुआ है। संशोधित नागरिकता कानून (सीएए)-राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ आंदोलन में बीएसपी कहीं नहीं दिखी; अनुच्छेद 370 हटाए जाने का उन्होंने समर्थन किया; तीन तलाक विधेयक पर सदन के बहिष्कार से लाभ बीजेपी को ही हुआ; और सबसे बड़ी बात, किसान आंदोलन से भी वह बिल्कुल ही गायब रहीं।


इन सबसे यही भाव जन्मा है कि वह और उनकी पार्टी बीजेपी की बी टीम है। बीजेपी ने भी इसमें सहयोग ही किया है- राज्यसभा चुनाव में उनके उम्मीदवार रामजी गौतम को बीजेपी ने समर्थन दे दिया क्योंकि बीएसपी के पास पर्याप्त वोट नहीं थे। ऐसी हालत में मायावती को अपने भविष्य को लेकर सोचना चाहिए। 2019 में जिस तरह बीजेपी विरोधी वोटों को एकजुट करने का प्रयास उन्होंने किया था, वैसा ही कुछ उन्हें करना होगा। लेकिन असली सवालः क्या वह ऐसा करेंगी?

(नवजीवन के लिए पूर्णिमा एस त्रिपाठी की रिपोर्ट)

नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia


Published: 02 Jul 2021, 7:11 PM