दिल्ली का संदेश साफ, बीजेपी की जीत का मंत्र ही अब उसका सबसे बड़ा दुश्मन

साल 2014 के आम चुनाव के बाद से मोदी-शाह की जोड़ी ने हर चुनाव में जीत हासिल करने का एक मॉडल खड़ा कर लिया था। इस मॉडल की सबसे बड़ी खामी यह रही कि इससे बीजेपी और उसके नेता-कार्यकर्ताओं ने मान लिया कि वे अजेय हैं। फिर लगातार जीत ने बीजेपी को अहंकार से भर दिया।

फोटोः सोशल मीडिया
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तसलीम खान

हर चुनाव से एक सबक होता है, राजनीतिक दलों के लिए भी और वोटर के लिए भी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में निश्चित रूप से केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने शानदार जीत हासिल की है, लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बीजेपी के लिए इस जनादेश से जो संदेश निकलता है वह यह कि उसका जीत का मंत्र अब बीजेपी का ही सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है।

लोकसभा के 2014 के चुनाव के बाद से मोदी-शाह की जोड़ी ने चुनाव-दर-चुनाव जीत हासिल करने का एक मॉडल खड़ा कर लिया था और देखते-देखते देश का अधिकांश हिस्सा भगवा रंग में नजर आने लगा था। इस मॉडल की सबसे बड़ी खामी यह रही कि इससे बीजेपी और इसके नेता-कार्यकर्ताओं ने मान लिया कि वे अजेय हैं। साथ ही 2014 के बाद कई राज्यों में विजय और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में असाधारण जीत ने बीजेपी को अहंकार से भर दिया।

अहंकार में चूर बीजेपी ने न सिर्फ उन वादों-इरादों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जिनके आधार पर वह सत्ता में आई थी, बल्कि सारी नीतियों के दरकिनार कर एक ऐसा राजनीतिक कॉकटेल वोटर के सामने रखा जिसमें हिंदुत्व, पाकिस्तान, मुसलमान, विपक्षियों को एंटी-नेशनल कहना, छोटे-छोटे से चुनाव में भी वीआईपी नेताओं की फौज उतारना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशालकाय रोड शो करने जैसे फार्मूलों का तड़का लगा था।

2014 के बाद के शुरुआती वर्षों में इस कॉकटेल ने कई राज्यों में बीजेपी को जीत दिलाई, लेकिन जैसे-जैसे बीजेपी सरकार की आर्थिक नीतियों का कवच उतरना शुरु हुआ, एक-एक कर राज्य उसके हाथ से निकलने लगे। साल 2014 के बाद से मोटे तौर पर देखें तो बीजेपी ऐसे 7 राज्यों को खो चुकी है, जहां उसकी या उसके सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार थी। लेकिन बीजेपी ने अपना नैरेटिव और रणनीति नहीं बदली। उसे ध्रुवीकरण पर पूरा भरोसा था।

ऐसे में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देश भर में जारी विरोध का प्रतीक बना शाहीन बाग मानो प्लेट में सजकर उसके सामने था। 2019 में बीजेपी ने मुस्लिम पाकिस्तान के नाम पर लोगों को रिझाया और बालाकोट एयरस्ट्राइक कर देश और धर्म के रक्षक के तौर पर मोदी की छवि को गढ़ा था, लेकिन दिल्ली में यही आख्यान, यही रणनीति और देश और धर्म के रक्षक की छवि वोटर को रिझाने में बुरी तरह नाकाम रही।

आखिर क्या कारण रहा?

दरअसल दिल्ली में एक मजबूत मुख्यमंत्री सामने था, जिसने आम आदमी की तरह अपने काम का रिपोर्ट कार्ड हाथ में लेकर वोटर का समर्थन मांगा। साथ ही हिंदुत्व विहीन राष्ट्रवाद की बानगी भी उसने सामने रखी और हिंदू धर्म मानने वाले के रूप में लोगों के सामने खुद को पेश किया। सांप्रदायिक छौंक के साथ हिंदुत्व का राष्ट्रवादी फार्मूला इस साधारण हिंदू और कट्टरता से दूर राष्ट्रवादी और धार्मिक केजरीवाल के सामने बौना साबित हुआ।

बीजेपी को ऐसे धार्मिक राष्ट्रवाद की आदत ही नहीं थी, क्योंकि उसका विजय रथ तो हिंदुत्व की पताका लहराते राष्ट्रवादी पथ पर दौड़ रहा था। दिल्ली में उसे सर्विस डिलीवरी का ठप्पा लगा रिपोर्ट कार्ड दिख तो रहा था, लेकिन अहंकार से भरे आत्मविश्वास में उसे अपनी नीति और नीयत बदलने की आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई। होती भी क्यों, आखिर अभी 6 महीने पहले ही तो लोकसभा चुनाव में करीब 59 फीसदी वोट हासिल कर उसने दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।

एक और रोचक बात दिल्ली के चुनाव में हुई। आपको याद होगा कि 2014 के चुनाव से कोई दो साल पहले ही गुजरात मॉडल की चर्चा होने लगी थी और 2019 के लोकसभा चुनाव से कोई साल भर पहले ही बीजेपी ने अपने काम की उपलब्धियां गिनानी शुरु कर दी थीं। 2014 में लोगों ने जहां गुजरात मॉडल को दूर से देखा था और उस समय तक न तो सोशल मीडिया इतना मजबूत था और न ही फैक्टचेक के फंडे, लिहाज़ा लोगों ने उस मॉडल को हाथों हाथ लिया और अच्छे दिनों की आस और सबका साथ, सबका विकास के नारे से आह्लादित हो मोदी को सत्ता के शिखर पर पहुंचा दिया था।

लेकिन 2019 में बीजेपी के हर दावे और नारे की पड़ताल हुई, हर दावे का फैक्टचेक हुआ और संकेत मिलने लगे कि बीजेपी की पकड़ चुनाव पर कमजोर पड़ रही है। ऐसे में बीजेपी ने हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का तड़का लगाया और ध्रुवीकरण की लहर पर सवार होकर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की।

दिल्ली में केजरीवाल ने बीजेपी के इसी फार्मूले को अपनाया और 2020 का विधानसभा चुनाव होने से कोई दो साल पहले ही मोहल्ला क्लीनिक, दिल्ली की बेहतर होती शिक्षा व्यवस्था, महिलाओं के लिए सौगातें आदि देने का जो काम किया था, उसका प्रचार शुरु कर दिया था। मोदी की विकास पुरुष की छवि को दाग लग चुका था, लेकिन केजरीवाल ने दिल्ली के विकास पुरुष का चोला पहन खुद को दिल्ली का बेटा बताकर लोगों के सामने पेश कर दिया।

बीजेपी अपने ध्रुवीकरण, सांप्रदायिकता, शाहीन बाग के नाम पर लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करती रही, और जब उसे केजरीवाल की रणनीति समझ आई तो उसने कुछ स्कूलों का स्टिंग आदि कर ‘आप’ के दावों की पोल खोलने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

और, आज के नतीजों ने साफ कर दिया है कि विकास और काम के सामने नफरत की सियासत कहीं नहीं ठहरती।

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