ग्राउंड रिपोर्ट: सहारनपुर की इसी सीट से शुरू होती है राजनीतिक महाभारत! BJP के विरोध के बीच ये पार्टियां भी लगा हैं रही दम

बेहट भौगोलिक रूप से बेहद रमणीक स्थान है। यहां मुसलमानों की आबादी डेढ़ लाख है। मुस्लिम नेताओं को लगता है कि यहां उनके जीत की गारंटी है। मगर आंकड़े ऐसे होते नही है क्योंकि मुस्लिम वोटो का बंटवारा हो जाता है। इस बार भी इसकी संभावना हैं।

फोटो: आस मोहम्मद कैफ
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आस मोहम्मद कैफ

बेहट को पहले मुजफ्फराबाद विधानसभा के तौर पर जाना जाता था। सहारनपुर के इमरान मसूद इसी मुजफ्फराबाद सीट से विधायक चुने गए थे। इसकी कहानी भी बड़ी रोचक है 2007 में इमरान मसूद बेहट से समाजवादी पार्टी से टिकट मांग रहे थे, मगर समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव नें उस समय मंत्री रहे जगदीश राणा को प्रत्याशी बना दिया। इमरान मसूद के चाचा रशीद मसूद सपा में थे। इमरान मसूद ने पार्टी और अपने चाचा से बगावत करके निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा और सपा के प्रत्याशी जगदीश राणा को हरा दिया। इसके बाद 2012 में इमरान मसूद निश्चित थे कि वो बेहट से चुनाव लड़ेंगे, इमरान मसूद समाजवादी पार्टी में थे।

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मुलायम सिंह यादव ने दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के अनुरोध पर उनके दामाद उमर अली खान को बेहट से प्रत्याशी बना दिया। नाराज होकर इमरान मसूद ने कांग्रेस पार्टी जॉइन कर ली। मगर कांग्रेस से समाजवादी पार्टी का गठबंधन हो गया। उमर अली खान समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़े, इमरान नकुड़ विधानसभा सीट से मैदान में आए,दोनों हार गए। बेहट की लड़ाई 2017 में भी हुई। उमर अली खान और इमरान मसूद दोनों इस बार चुनाव नही लड़े,इमरान मसूद ने गठबंधन में नरेश सैनी को लड़ाया वो कांग्रेस से विधायक बन गए। अब भाजपा में चले गए। इस चुनाव से ठीक पहले इमरान मसूद सपा में शामिल हो गए और बेहट से चुनाव लड़ने की कवायद में जुट गए उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और समाजवादी पार्टी में बेहट से लड़ने के लिए शिफ्ट हो गए। बेहट उन्हें फिर भी नही मिली और अब चुनाव नही लड़ रहे हैं, लड़ा रहे हैं।

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सात विधानसभा सीट वाले सहारनपुर जनपद में बेहट में ऐसा क्या है कि यही विधानसभा सीट पिछले 20 साल पूरे जिले की उठापटक का केंद्र बनी हुई है! बेहट के कलीम मलिक बताते हैं कि सहारनपुर की सारी राजनीतिक महाभारत बेहट सीट से शुरू होती है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा क्षेत्रों की गिनती भी बेहट से शुरू होती है। बेहट भौगोलिक रूप से बेहद रमणीक स्थान है। यहां मुसलमानों की आबादी डेढ़ लाख है। मुस्लिम नेताओं को लगता है कि यहां उनके जीत की गारंटी है। मगर आंकड़े ऐसे होते नही है क्योंकि मुस्लिम वोटो का बंटवारा हो जाता है। इस बार भी इसकी संभावना हैं।

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हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा से सटे अवैध खनन की ज़मीन बेहट में माता शाकम्बरी का मंदिर है तो रायपुर की ऐतिहासिक खानकाह भी है। बेहट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी उमर अली खान को लड़ा रही है। भाजपा ने कांग्रेस से आए नरेश सैनी को प्रत्याशी बनाया है। बसपा यहां रईस मलिक को लड़ा रही है। बेहट की राजनीति में जाति का असर दिखाई देता है। यहां सभी जातियों की एक धुरी है। बड़े ठाकुरों की इस भूमि में पहली बार कोई ठाकुर प्रत्याशी मुख्य लड़ाई से बाहर है। भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर आज़ाद का घर भी इसी विधानसभा सीट में आता है। घाड़ इलाके में आने वाला बेहट में नेताओं के बड़े नाम तो रखता है मगर काम नही रखता है.यह बिहारीगढ़ के सुमित कश्यप कहते हैं वो बताते हैं कि यहां बिजली पानी की भी समस्या है। हर साल बाढ़ फसलों को खा जाती है। स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं भी बेहद पिछड़ी हुई है।

फोटो: आस मोहम्मद कैफ
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अमीरों और गरीबों में बंटवारा बहुत है। दुर्भाग्यपूर्ण तरीकों से जनता यहां मुद्दों पर वोट नहीं करती है। बेहट के एस ए जैदी कहते हैं जनता अपने हक़ मांगने के लिए सँघर्ष करती नही दिखती है। बेहट सोना उगलने वाली जमीन है और स्थानीय लोग नेताओं और अफसरों के एक सिंडिकेट में फंसे हुए हैं। यहां बेहद सरल स्वभाव के लोग हैं। बेहट के लोगों पर पिछले पांच सालों में रोजगार को लेकर बहुत नकारात्मक असर पड़ा है। हजारों परिवार वालों का चूल्हा धीमा पड़ गया है। बेहट ने बेरोजगारी की मार सबसे अधिक महसूस किया है। यहां सांप्रदायिकता भी बढ़ गई है। सब सरकार बदलना चाहते हैं।

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सहारनपुर 40 फ़ीसद मुस्लिम और 30 फ़ीसद दलित आबादी के साथ एक ऐसा जनपद है जिसे उसकी सम्पन्नता को लेकर जाना जाता है। लकड़ी के नायाब नक्काशी वाले फर्नीचर इत्यादि के जाने वाले सहारनपुर में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी है। नोटबंदी, लॉकडाउन और सरकारी पॉलिसी ने पिछले कुछ सालों में कारोबार की रीढ़ तोड़ दी है। सहारनपुर शहर के सय्यद अथर बताते हैं कि वो पिछले 4 साल में 6 कारोबार बदल चुके हैं। इस दौरान उन्होंने पुरानी गाड़ी बेचने का काम किया। वो किसी ने नही खरीदी, लकड़ी का काम किया, कपड़े बेचे ,जूते की दुकान खोली और अब रेस्टोरेंट में साझा कर लिया। ग्राहक नही मिल रहे। जमा किया हुआ पैसा खत्म हो गया है। कर्जदार बन गया हूं। रोजगार सब से बड़ी समस्या हैं। महंगाई मुद्दा है मगर सहारनपुर का आदमी समझता है कि उसका अच्छा रोजगार होगा तो वो महंगी वस्तु भी खरीद लेगा,जब पैसे ही नही है तो वो सस्ती भी नही खरीद पाएगा। सहारनपुर में रोजगार बर्बाद हो गया है। हजारों नोजवान सड़क पर है। रोजगार से सभी प्रभावित हुए हैं। सहारनपुर टूट गया है।

सहारनपुर शहर से समाजवादी पार्टी संजय गर्ग को चुनाव लड़वा रही है। वो यहां से विधायक भी है। 2017 में वो 4 हजार के अंतर से चुनाव जीते थे। मुसलमान उनसे नाराज है मगर उनके पास कोई दूसरा विकल्प नही है। संजय गर्ग व्यापारियों के नेता भी है। सिर्फ शहर में डेढ़ लाख मुस्लिम वोट है। इसमें कोई बंटवारा नही दिख रहा है। कांग्रेस से सुखविंदर कौर चुनाव लड़ रही हैं। सिख वोटों का झुकाव उनकी और है। भाजपा पूर्व विद्यायक राजीव गुम्बर को चुनाव लड़वा रही है। सब समस्याओं को दरकिनार कर चुनाव धुर्वीकरण की और बढ़ता दिखता है।

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सहारनपुर देहात में समाजवादी पार्टी आशु मलिक को चुनाव लड़वा रही है। आशु मलिक समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं में शुमार होते हैं। संयोग यह है कि वो जिस सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं वहां भाजपा सामान्य सीट पर दलित समुदाय से आने वाले जगपाल सिंह को चुनाव लड़ा रही है। यह दांव बड़ा गहरा है। जगपाल सिंह इससे पहले 4 बार विधायक रह चुके हैं। एक बार सामान्य सीट से चुनाव जीते थे। बसपा सुप्रीमो मायावती जब मुख्यमंत्री बनी थी तो जगपाल सिंह ने उनके लिए अपनी विधानसभा सीट से इस्तीफा दिया था। अब जगपाल सिंह भाजपा में हैं। सहारनपुर देहात की इस सीट पर एक लाख से ज्यादा दलित है और बसपा से यहां अजब सिंह प्रत्याशी हैं। पूरे जनपद में सबसे रोचक चुनाव इसी सीट पर हो रहा है। यहां जीत का अंतर सबसे कम रहने की संभावना है।

रामपुर मनिहारान सहारनपुर की सुरक्षित विधानसभा सीट है। यह एक ऐसी सीट है जहां भाजपा लड़ाई से बाहर दिखती है। बसपा यहां सपा के साथ मुख्य मुकाबलें में है। बसपा के प्रत्याशी पूर्व विद्यायक रविन्द्र मोल्हू है जो स्थानीय स्तर पर पकड़ रखते हैं। सपा यहां पूर्व सांसद जगपाल कांत के बेटे विवेक कांत को चुनाव लड़वा रही है। विवेककांत को प्रत्याशी इमरान मसूद की पैरोकारी के बाद बनाया गया है। समाजवादी पार्टी ने नकुड़ विधानसभा से पूर्व मंत्री धर्म सिंह सैनी को प्रत्याशी बनाया गया है। धर्म सिंह सैनी को स्वामी प्रसाद मौर्य का काफी नजदीकी माना जाता है। इमरान मसूद दो बार धर्म सिंह सैनी से नजदीकी अंतर से चुनाव हार चुके हैं। इस बार धर्म सिंह सैनी को जिताने के लिए प्रयास कर रहे हैं। भाजपा ने यहां मुकेश चौधरी को प्रत्याशी बनाया है। मुकेश चौधरी कभी इमरान मसूद के नजदीकी साथी रहे हैं। यह एक सीट है जिस पर समाजवादी पार्टी काफी कॉन्फिडेंट लगती है।

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मसूद परिवार की गृहनगरी गंगोह विधानसभा पर भी लड़ाई त्रिकोण बनाती है। मजेदार यह है कि यहां इमरान मसूद के सगे भाई नोमान मसूद बसपा से मैदान में है। सपा यहां इन्द्रसेन को चुनाव लड़वा रही है। इन्द्रसेन को लेकर मुसलमानों में नाराजग़ी है। भाजपा मौजूदा विद्यायक कीरत सिंह को लड़ा रही है। डेढ़ लाख मुसलमान वोट का बंटवारा इस सीट का भविष्य तय करेगा। पहले चरण के मतदान का अनुभव बताता है कि बंटवारे की संभावना कम है और चुनाव दो धुर्वो पर केंद्रित हो रहा है।

सहारनपुर जनपद की सबसे चर्चित सीट देवबंद है। लड़ाई यहां भी त्रिकोणीय है। मुख्य मुक़ाबला भाजपा,सपा और बसपा में है। भाजपा बृजेश सिंह को लड़ा रही है। सपा ने पूर्व मंत्री राजेन्द्र राणा के पुत्र कार्तिकेय राणा पर दांव खेला है। बसपा ने गुर्जर समुदाय से आने वाले राजेन्द्र सिंह को टिकट दिया है। देवबन्द सीट की तस्वीर एकदम धुंधली है। साफ तौर पर यहां कुछ नही कहा जा सकता है। देवबंद की इरम उस्मानी बताती है कि मौजूदा हालात इस प्रकार की है कि जनता सरकार बदलने को आतुर है इसलिए वो भाजपा को हराना चाहती है। वोटों का गणित अपनी जगह है और बहुमत में जनता भाजपा से नाराज है। रनखंडी गांव के अनुभव राणा कहते हैं कि भाजपा के विद्यायक बृजेश सिंह ने काफी नकारात्मक काम किए हैं और ठाकुर समुदाय में ही उनके प्रति नाराजग़ी हैं।

सहारनपुर में इस समय भाजपा के पास 4 विधायक है। दलितों और ठाकुर में शब्बीरपुर कांड के बाद काफी दूरियां बढ़ी हुई है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से लगातार यह जनपद दलित उत्पीड़न को लेकर चर्चा में रहा है। नया गांव रामपुर के विपिन जाटव कहते हैं हम बाबा साहब के मानने वाले लोग है, लोकतंत्र में वोट ही बदले लेने सबसे अचूक हथियार है। हम उसका प्रयोग करने जा रहे हैं। दलित और मुसलमान दोनों आबादी यहां लगभग 70 फ़ीसद है,इसके अलावा कुछ सरकार से नाराज लोग भी है। मगर यह 70 फ़ीसद सपा और बसपा में बंटा हुआ दिखाई दे रहा है। भाजपा की उम्मीद भी इसी बंटवारे पर टिकी हुई है।

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