आगामी चुनाव में प्रचार और दुष्प्रचार की रणभूमि बनेगा सोशल मीडिया, पिछली बार पारंपरिक मीडिया की थी भूमिका

भारत में जब साल 2014 में लोकसभा चुनाव हुआ था तो इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या कम होने की वजह से मतदाताओं पर सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत कम था और पारंपरिक मीडिया चरम पर था। लेकिन इस बार सोशल मीडिया रजानीतिक प्रचार में एक मुख्य भूमिका निभाने जा रहा है।

फोटोः आईएएनएस
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आईएएनएस

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विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में जब साल 2014 में 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुआ था तो उस वक्त मतदाताओं पर सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत कम था और पारंपरिक मीडिया अपने चरम पर था। इसकी वजह उस समय इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या बहुत कम होना था।

साल 2014 में भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या करीब 25 करोड़ थी। आज यह संख्या करीब 55 करोड़ है। वहीं पिछले साल देश में स्मार्टफोन का उपयोग करने वालों की संख्या 40 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है। दूसरी ओर जहां दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के भारत में करीब 30 करोड़ मासिक सक्रिय यूजर हैं, वहीं व्हाट्सएप पर 20 करोड़ से ज्यादा और ट्विटर पर 3.4 करोड़ से ज्यादा यूजर हर महीने सक्रिय रहते हैं।

ऐसे में यह स्पष्ट है कि 17वीं लोकसभा के लिए होने जा रहे चुनाव में विभिन्न दलों के रजानीतिक प्रचार को आकार देने में सोशल मीडिया एक मुख्य भूमिका निभाने जा रहा है। सात चरणों में होने वाला लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से शुरू होगा।

सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (एसएफएलसी) के लीगल डायरेक्टर प्रशांत सुगाथन का कहना है कि इस दौरान इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो चुकी है और इन नए यूजरों में ज्यादातर आबादी मोबाइल के माध्यम से वेब का प्रयोग करती है। विभिन्न दलों के पास समर्पित सोशल मीडिया सेल हैं, यह माध्यम निश्चित रूप से इस चुनाव में बड़ी भूमिका निभाएगा।

इस मामले में बीजेपी थोड़ा आगे दिखती है। साल 2009 से ट्विटर पर सक्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 26 मई 2014 तक मात्र 40 लाख प्रशंसक थे और आज उन्हें ट्विटर पर 4.63 करोड़ लोग फॉलो कर रहे हैं। जबकि अप्रैल 2015 में ट्विटर से जुड़े कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भी अब तक 88 लाख से ज्यादा प्रशंसक हो चुके हैं। वहीं मोदी के फेसबुक पर भी 4.3 करोड़ प्रशंसक हैं और इतना ही उन्होंने अपने नाम से नरेंद्र मोदी ऐप भी शुरू किया है, जिसे एक करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है।

ऐसे दौर में, दुष्प्रचार से लड़ना और सोशल मीडिया किस तरह मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है, इस चुनाव में यह सबसे बड़ा मुद्दा होगा। सुगाथन ने कहा, “धार्मिक और जातीय मतभेदों पर आधारित लक्षित संदेश मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर सकते हैं और देश के विविध सांस्कृतिक ताने-बाने को प्रभावित कर सकते हैं।" साल 2014 में 81.5 करोड़ मतदाता थे, जबकि इस बार मतदाताओं की संख्या 90 करोड़ है।

साइबर मीडिया रिसर्च एंड सर्विसेज लिमिटेड के अध्यक्ष और वरिष्ठ उपाध्यक्ष थॉमस जार्ज का मानना है कि 2019 का चुनाव मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर लड़ा जाएगा। सोशल मीडिया पहले ही हमारे लोकतंत्र में बातचीत के लिए एक जीवंत मंच के रूप में उभरा चुका है। उन्होंने कहा, “याद रखिए, यह पहला आम चुनाव है जहां 40 करोड़ नए डिजिटल नेटिव पहली बार मतदान करेंगे।”

थॉमस जार्ज ने कहा कि आगामी महीनों में होने वाले चुनाव के दौरान हम लोग सोशल मीडिया नेटवर्क को दुष्प्रचार की एक विशाल रणभूमि बनकर उभरते हुए देखेंगे।

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