तमिलनाडु चुनावः विरोधी वोटों के दावेदार हजार, स्टालिन के लिए अच्छे हालात

प्रदेश में बीजेपी की दिक्कत यह नहीं कि उसमें आकांक्षा-महत्वाकांक्षा की कोई कमी है, बल्कि यह है कि उसके पास उस राजनीतिक भाषा का अभाव है जो वहां के आम लोगों के दिलों को छू सके।

तमिलनाडु चुनावः विरोधी वोटों के दावेदार हजार, स्टालिन के लिए अच्छे हालात
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के ए शाजी

जैसे-जैसे तमिलनाडु एक और विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, राजनीतिक परिदृश्य में वह विरोधाभास दिखने लगा है जो राज्य की पहचान बन गया है। द्रविड़ वर्चस्व, जन-कल्याण आधारित शासन और धार्मिक ध्रुवीकरण का विरोध करने वाली राजनीतिक संस्कृति बनी हुई है। वहीं, विपक्ष में उभरते नए चेहरों और बनते-बिगड़ते गठबंधनों की हलचल है। इन सारी धाराओं को एक साथ देखें तो ये किसी बड़े उथल-पुथल की ओर कम, और राजनीतिक स्थितियों के और सुदृढ़ होने का अधिक संकेत करती हैं- खास तौर पर मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सत्ताधारी द्रविड़ मुन्नेत्र कजगम (डीएमके) के लिए।

हिन्दुत्व का राजनीतिक विरोध तमिलनाडु की खास पहचान बना हुआ है। ई.वी. रामासामी द्वारा रखी गई वैचारिक नींव यहां की राजनीति को आज भी आकार दे रही है; यह धार्मिक लामबंदी के बजाय सामाजिक न्याय, भाषाई पहचान और तर्कवाद को प्राथमिकता देती है। यह जीवंत ढांचा आज भी मतदाताओं की अपेक्षाओं और राजनीतिक रणनीतियों को प्रभावित करता है। जैसा कि चेन्नई स्थित शिक्षाविद सी. लक्ष्मणन कहते हैं, तमिलनाडु में चुनाव केवल पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि गरिमा, कल्याण और अधिकारों के मुद्दों पर लड़े जाते हैं।

इस ढांचे में अपने पैर जमाने के लिए बीजेपी को संघर्ष करना पड़ रहा है। अपने सांगठनिक आधार का विस्तार करने और नेतृत्व को चमकाने पर भारी-भरकम खर्च करने के बावजूद, उसकी रणनीतियां मोटे तौर पर राज्य की राजनीतिक सोच के अनुरूप नहीं दिखी हैं। धार्मिक पहचान को आगे लाने के प्रयासों को सीमित सफलता ही मिली है, जबकि गठबंधन बनाने की कोशिशें क्षेत्रीय पार्टियों की वजह से बाधित हुई हैं, जो अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं। जैसा कि पत्रकार एम. सतीश कुमार कहते हैं, तमिलनाडु में बीजेपी की समस्या आकांक्षा-महत्वाकांक्षा की कमी नहीं, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक भाषा की कमी है जो लोगों के दिलों को छू सके।

गठबंधन पर अपनी निर्भरता के कारण बीजेपी का एआईएडीएमके (ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कजगम) के साथ एक जटिल रिश्ता बन गया है; यह एक ऐसी पार्टी है जो खुद अंदरूनी अस्थिरता से जूझ रही है। जे. जयललिता के निधन के बाद से, एआईएडीएमके को एक एकजुट ताकत के रूप में खुद को फिर से स्थापित करने में काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान अब गुटों के बीच गहरी और स्थायी दरारों में बदल गई है।


हालांकि ई.के. पलानीस्वामी ने संगठन पर कुछ हद तक नियंत्रण हासिल कर लिया है, फिर भी पार्टी में एकता अब भी दूर की कौड़ी बनी हुई है। पकड़ मजबूत करने के उनके प्रयासों ने ओ. पनीरसेल्वम के खेमे से जुड़े गुटों को पार्टी से अलग-थलग कर दिया है; वहीं, वी.के. शशिकला की छाया अब भी पार्टी के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल की तरह मंडरा रही है।

कोयंबटूर के वरिष्ठ एआईएडीएमके नेता सिंगाई रामचंद्रन ने बड़ी बेबाकी के साथ समस्या की गंभीरता को स्वीकार किया: ऐसे समय जब वोट जुटाने पर ध्यान देना चाहिए था, पार्टी अब भी नेतृत्व के मुद्दे पर उलझी हुई है। आलोचकों का कहना है कि पलानीस्वामी अपनी ताकत स्थापित करने में तो सफल रहे हैं, लेकिन आम सहमति नहीं बना पाए हैं। यह असंतुलन पार्टी की उस क्षमता को कमजोर करता है जिससे वह ऐसे चुनाव में विश्वसनीय चुनौती पेश कर सके जिसमें दोनों की आवश्यकता है।

यह विखंडन एआईएडीएमके तक ही सीमित नहीं है। पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) अपने मजबूत वन्नियार आधार के साथ प्रभावशाली तो बनी हुई है, लेकिन राजनीतिक रूप से अस्थिर है। आंतरिक फेरबदल, पीढ़ीगत परिवर्तन और बदलते गठबंधन विकल्पों ने इसकी स्थिति को अनिश्चित बना दिया है। हालांकि उत्तरी तमिलनाडु में इसकी कुछ हद तक पकड़ मजबूत बनी हुई है, लेकिन व्यापक विपक्षी विमर्श को आधार देने के लिए आवश्यक एकजुटता का अभाव है। जैसा कि लक्ष्मणन बताते हैं, पीएमके वोट जुटा सकती है, लेकिन उन्हें एकजुट नहीं कर सकती।

राज्य की भीड़भाड़ वाले राजनीतिक मंच पर अब अभिनेता विजय ने कदम रख दिया है, जिनका राजनीति में आना उत्साह और उथल-पुथल, दोनों का मेल है। अलग-अलग तबकों में जबरदस्त लोकप्रियता रखने वाले विजय एक नई राजनीतिक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि, उनका शुरुआती असर शायद बिखरा हुआ ही रहने वाला है। उनके समर्थकों का आधार काफी हद तक डीएमके-विरोधी मतदाता वर्ग से मेल खाता है, जिससे अलग-अलग सीटों पर सत्ता-विरोधी वोटों के बंट जाने की संभावना बढ़ जाती है।


जैसा कि डीएमके के प्रवक्ता सेलम धरणीधरन बताते हैं, विजय को अगर पांच से आठ फीसद वोट भी मिल जाते हैं, तो वे दर्जनों सीटों के नतीजों को बदल सकते हैं: अपनी छाप छोड़ने के लिए उन्हें किसी जबरदस्त जीत की जरूरत नहीं। फिलहाल, विश्लेषकों का मानना ​​है कि विजय डीएमके के लिए खतरा कम, बल्कि उसके विरोधियों के लिए नई उलझन ज्यादा हैं।

विपक्ष की आंतरिक फूट सत्ताधारी गठबंधन की आपसी एकता के बिल्कुल विपरीत है। डीएमके ने, कांग्रेस और सीपीआई (एम) जैसी वामपंथी पार्टियों के साथ मिलकर, न केवल अपने गठबंधन को एकजुट रखा है, बल्कि उसे और मजबूत भी किया है। डीएमके और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर शुरुआती मतभेद, जो अक्सर गठबंधन की राजनीति में टकराव का कारण बनते हैं, बातचीत से सुलझा लिए गए; दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी अधिकतम मांगें रखने के बजाय एकता के महत्व को प्राथमिकता दी। सीपीआई (एम) ने भी बिना किसी सार्वजनिक विवाद के बातचीत को आगे बढ़ाया, जिससे एक अनुशासित और तालमेल वाले मोर्चे की छवि और मजबूत हुई।

कांग्रेस नेता मनिकम टैगोर स्वीकार करते हैं कि मतभेद थे, लेकिन साथ ही इस पर भी जोर देते हैं कि दोनों पक्षों के बीच एक साझा समझ थी कि आपसी फूट का फायदा केवल विपक्ष को ही होगा। वामपंथी दल भी इसी व्यावहारिक सोच का समर्थन करते हैं; वे सीटों के बंटवारे को एक ऐसी समायोजन प्रक्रिया के तौर पर देखते हैं, जिसका मूल उद्देश्य एक व्यापक राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करना है।

इसके नतीजे साफ हैं। इस बहुदलीय मुकाबले में, अगर विपक्ष के वोट बंट जाते हैं, तो एक मजबूत गठबंधन, अपने स्थिर वोट शेयर के दम पर भी, आसानी से जीत हासिल कर सकता है। डीएमके को अपने विस्तार के लिए कोई बहुत बड़ा कदम उठाने की जरूरत नहीं। उसे बस अपनी जगह पर मजबूती से टिके रहना है, जबकि उसके विरोधियों में बचे वोटों की बंदरबांट होगी।


इससे एक बार फिर ‘सत्ता-विरोधी लहर’ की ओर ध्यान जाता है। हालांकि सरकार के प्रति कुछ जगहों पर असंतोष हो सकता है, लेकिन एकजुट विपक्ष के अभाव में, यह असंतोष एक निर्णायक चुनावी ताकत में तब्दील होता नहीं दिखता। इसके बजाय, यह असंतोष कई पार्टियों- जैसे एआईडीएमके, बीजेपी, पीएमके और विजय के राजनीतिक मंच- के बीच बंट जाने की संभावना है; और ये सभी पार्टियां एक ही तरह के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश करेंगी। जैसा कि एक अनुभवी विश्लेषक कहते हैं, असंतोष तो मौजूद है, लेकिन इस बात पर कोई सहमति नहीं कि इसका फायदा किसे मिलने जा रहा। और यह डीएमके के पक्ष में जाने वाला सबसे बड़ा फायदा है।

जैसे-जैसे तमिलनाडु चुनावों के करीब पहुंच रहा है, बड़ी तस्वीर में एक असंतुलन दिख रहा है। जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक एस. सुंदर राजन ने संक्षेप में कहा है, तमिलनाडु में चुनाव केवल ताकत के बारे में नहीं, बल्कि एकजुटता के बारे में होते हैं। फिलहाल, केवल एक ही पक्ष के पास वह एकजुटता मौजूद है।

जब तक एआईएडीएमके के भीतर और विपक्षी दलों के बीच कोई बड़ा फेरबदल नहीं होता, या किसी नई ताकत के इर्द-गिर्द कोई अप्रत्याशित एकजुटता नहीं बनती, एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके के सत्ता में बने रहने की स्थिति मजबूत नजर आ रही है।