कोरोना नियंत्रण में नाकामी, बंगाल में हार और सोशल मीडिया पर आलोचना: क्या शुरु हो चुकी है मोदी सरकार की उलटी गिनती!

पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे और कोरोना महामारी पर काबू पाने में नाकामी से मोदी सरकार की लोकप्रियता में तेजी से कमी आई है। भले ही अगले लोकसभा चुनाव अभी तीन वर्ष दूर हों लेकिन यह सरकार अब जिस ढलान पर आ गई है, उसे साफ तौर पर देखा जा सकता है।

फोटो : Getty Images
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पूरा सोशल मीडिया हैरान है। उससे भी ज्यादा परेशान है बीजेपी का आईटी सेल। जिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर ट्वीट पर लाखों रिट्वीट और लाइक्स आते थे, अब उनके हर ट्वीट पर सिर्फ आलोचना, भद्दी टिप्पणियां और ऑक्सीजन की मांग हो रही है। क्या यह देश और समाज के बदलते मिजाज का प्रतीक है? पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे और कोरोना महामारी पर काबू पाने में नाकामी से मोदी सरकार की लोकप्रियता में तेजी से कमी आई है। भले ही अगले लोकसभा चुनाव अभी तीन वर्ष दूर हों लेकिन यह सरकार अब जिस ढलान पर आ गई है, उसका अंत फिलहाल जल्द नजर नहीं आ रहा।

पश्चिम बंगाल में ‘अबकी बार 200 पार’ का नारा देने वाली बीजेपी मात्र 76 पर अटक गई। वहीं, बंगाल में चुनाव खत्म होते ही अंदरूनी फूट उभर आई है। वरिष्ठ बीजेपी नेता तथागत रॉय ने पार्टी की हार के लिए चार नेताओं को जिम्मेदार ठहरा दिया है- प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष, राष्ट्रीय महासचिव और चुनाव प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय, संगठन मंत्री शिव प्रकाश तथा सह चुनाव प्रभारी अरविंद मेनन। पश्चिम बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष रहे तथागत रॉय ने कहा कि बीजेपी मुख्यालय अग्रवाल भवन और सात सितारा होटलों में बैठकर इन चारों नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस से आए दागी नेताओं को टिकट दिलवाए। लेकिन अब पार्टी कार्यकर्ताओं के गुस्से का सामना करने के बजाय वे इस आशा में अपने कमरों में घुसे बैठे हैं कि मामला जल्द ही ठंडा हो जाएगा।

मानो यही काफी नहीं है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने वाली बीजेपी केरल में एक भी सीट नहीं जीत सकी। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक का मानना है कि बीजेपी के साथ तालमेल करने से उसे लोगों की हिंदी-विरोधी नाराजगी का सामना करना पड़ा, वरना द्रमुक के साथ मुकाबला थोड़ा और कांटे का हो सकता था।

कोरोना की दूसरी लहर ने मोदी सरकार की प्रशासनिक अक्षमता की रही सही पोल भी खोल दी है। ऐसा नहीं था कि विशेषज्ञों ने दूसरी लहर के बारे में आगाह नहीं किया था। लेकिन 24 जनवरी को वैश्विक मंच से प्रधानमंत्री मोदी ने जब कोरोना पर विजय की घोषणा कर दी, तो फिर ‘कोरोना-मुक्त’ भारत ने हर तरह की सावधानी से हाथ धो लिए। इसीलिए दूसरी लहर आने पर केंद्र और अधिकतर राज्य सरकारें लगभग सुप्तावस्था में पाई गईं।

यही वजह है कि आज गांव-गांव में मौतें होने से घर-घर में असंतोष है। न अस्पताल हैं, न डॉक्टर हैं, न बेड हैं, न ऑक्सीजन है और न ही दवाइयां हैं। सरकार ने बताया कि वैक्सीन लगेगी तो बच जाएंगे। फिर वैक्सीन ही गायब हो गई। जहां अधिकतर देशों ने अपने वैक्सीन के ऑर्डर पिछले साल अगस्त से अक्टूबर के बीच में दे दिए थे, वहीं सबसे बड़े वैक्सीन निर्माता का दावा करने वाले भारत ने अपने लिए वैक्सीन का पहला ऑर्डर इस वर्ष जनवरी में दिया। वह भी बहुत मामूली-सा।


अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ विभाग के डीन डॉ. आशीष के. झा के मुताबिक, कोरोना से पहले भारत में प्रतिदिन औसतन 2,700 मौतें होती थीं। कोरोना की पीक पर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यह संख्या 3,500-4,000 बढ़ गई। लेकिन इससे श्मशान गृहों में चिताओं की संख्या में आठ से दस गुना बढ़ोतरी तो नहीं हो सकती थी। उनकी गणना की अनुसार, आज देश में प्रतिदिन लगभग 80 हजार लोगों की मौत कोरोना से हो रही है, यानी मृतकों की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़े ढाई लाख से कई गुना अधिक हो सकती है। सरकार की प्रशासनिक विफलता की वजह से अपने घर, परिवार और जानने वालों की हो रही असामयिक मौतों को लोग जल्दी माफ करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं।

यह सब देख कर बीजेपी में घबराहट है। आखिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने में अब आठ-नौ महीने बचे हैं। उसके तुरंत बाद हिमाचल प्रदेश में चुनाव होना है। इनमें से केवल पंजाब को छोड़कर हर जगह बीजेपी की सरकार है।

लेकिन उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के नतीजों ने बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। जिला पंचायत की 3,050 सीटों में से बीजेपी महज 750 सीटें ही जीत सकी। यानी 2,300 सीटें विपक्षी दलों और निर्दलीयों को मिलीं। बीजेपी के लिए यदि कोई संतोष की बात है तो यह कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष एकजुट नहीं है। लेकिन बीजेपी के किले में भी दरारें दिखने लगी हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ महज एक डंडाधारी दरोगा बनने की कोशिश करते हुए दिखे हैं। लेकिन सैकड़ों फर्जी मुठभेड़ों के बावजूद न वह कानून व्यवस्था को संभाल पाए और न ही कोरोना से लड़ाई का नेतृत्व कर पाए। पिछले सवा चार साल में उनकी प्रशासनिक विफलताओं की लंबी फेहरिस्त की वजह से बीजेपी को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा को रिटायरमेंट से दो वर्ष पहले ही सेवानिवृत्ति देकर विधान परिषद का सदस्य बनाना पड़ा। उनका जिम्मा उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक कील-कांटों को दुरुस्त करना था ताकि पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में अपनी उपलब्धियों के आधार पर लड़ सके।

लेकिन योगी ने शर्मा को किसी भी तरह का पद देने से इंकार कर दिया। हालत यह है कि पिछले चार महीने से शर्मा वाराणसी में डेरा डाल कर बीजेपी उम्मीदवारों को पंचायत चुनाव लड़ा रहे थे। उसमें भी प्रधानमंत्री के अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी में बीजेपी को 40 जिला पंचायत सदस्यों में से केवल 5 ही मिल पाईं। बिना बीजेपी से तालमेल के लड़ी उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल भी 5 जिला पंचायत सदस्य जिता लाई। फिर भी अंतर इतना कि बीजेपी केवल पांच वार्ड में दूसरे स्थान पर रही तो अपना दल के उम्मीदवार 21 वार्डों में।

इतनी नाराजगी के बाद भी यदि प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह उत्तर प्रदेश में योगी को हाथ भी नहीं लगा पा रहे तो वह इस डर से कि योगी हटाए जाने के बाद बीजेपी को और अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। मुख्यमंत्री बनने से पहले भी वह हिंदू महासभा और हिंदू युवा वाहिनी के बैनर तले अपने उम्मीदवारों को बीजेपी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ लड़ाकर अपनी हैसियत सिद्ध कर चुके हैं।


बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व चाहता है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले एक पिछड़े नेतृत्व को तरजीह मिले। प्रशासन चुस्त-दुरुस्त हो। पिछली बार बीजेपी ने 403 में से 313 सीटें जीती थीं। लेकिन तब योगी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तक घोषित नहीं हुए थे। जीत का श्रेय मुख्य रूप से प्रधानमंत्री मोदी के अलावा यदि किसी को मिला था तो वह थे तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य। लेकिन सरकार बनने के बाद मौर्य को उप मुख्यमंत्री पद से संतोष करना पड़ा। योगी की प्रशासनिक अक्षमता से भी बड़ी कमी उनका अहंकार और दंभ माना जाता है। वह जनता से लगभग कट गए हैं। उनके विधायक और मंत्री भी उनसे मिलने के लिए तरस रहे हैं। उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शीतल सिंह कहते हैं कि योगी उत्तर प्रदेश को ऐसे मनमाने तरीके से चला रहे हैं जैसे वह गोरखपुर स्थित अपना मठ चलाते थे।

वहीं उत्तराखंड में भी पार्टी को अपना मुख्यमंत्री इसीलिए बदलना पड़ा क्योंकि त्रिवेंद्र सिंह रावत पार्टी के विधायकों के लिए उपलब्ध नहीं होते थे और न ही बीजेपी की सामूहिक निर्णय की परंपरा का पालन कर रहे थे। गोवा और मणिपुर में पिछली बार जोड़-तोड़कर बनाई बीजेपी की सरकारें भी अपनी लोकप्रियता खोती जा रही हैं। पंजाब में किसानों की नाराजगी के चलते बीजेपी को अपनी हालत केरल-जैसी हो जाने की आशंका सता रही है।

माना जाता है कि सरकार संसद और विधानसभा में केवल बहुमत के सहारे नहीं चलती। सरकार का इकबाल, रुतबा जनप्रतिनिधियों की संख्या से अधिक अपने काम से कायम होता है। लग रहा है कि केवल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा ही नहीं, केंद्र में बीजेपी की सरकार धीरे-धीरे अपना इकबाल खोती जा रही है।

यही वजह है कि उसके सदस्य सोशल मीडिया में धोखाधड़ी के जरिये अपनी उपस्थिति और रुतबा कायम रखना चाहते हैं। लंदन के प्रसिद्ध अखबार ‘द गार्डियन’ की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में एक वेबसाइट ‘द डेली गार्डियन’ के नाम से बनाकर बीजेपी के प्रवक्ता सुदेश वर्मा द्वारा उसमें प्रधानमंत्री मोदी की झूठी उपलब्धियों पर लेख लिखना यही दिखाता है। लेकिन उस लेख को न सिर्फ बीजेपी के कार्यकर्ताओं बल्कि सभी केंद्रीय मंत्रियों द्वारा सोशल मीडिया पर ट्वीट करना जता रहा है कि घबराहट कितनी बढ़ रही है।

(लेखक सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। इस लेख में व्यक्त विचार उनके हैं)

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