इतिहास के पुनर्लेखन का क्या है मकसद, शिक्षा या राजनीति?

महाराष्ट्र सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम के इतिहास की पुस्तकों की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया है। यह साफ तौर पर विभाजनकारी एजेंडे को पूरा करने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को बिगाड़ने की एक कोशिश है।

शिवाजी के बचपन पर आधारित किताब / फोटो: YouTube
शिवाजी के बचपन पर आधारित किताब / फोटो: YouTube

सुजाता आनंदन

महाराष्ट्र सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम के इतिहास की पुस्तकों की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया है। यह साफ तौर पर विभाजनकारी एजेंडा को पूरा करने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को बिगाड़ने की एक कोशिश है।

महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा 7वीं कक्षा के इतिहास पाठ्य पुस्तकों के पुनर्लेखन का मामला सामने आने के एक सप्ताह बाद यह स्पष्ट हो गया है कि महाराष्ट्र सरकार और भाजपा के विचारकों इस स्पष्टीकरण से कोई भी संतुष्ट नहीं है कि यह बदलाव छात्रों के हित में किया गया है।

महाराष्ट्र सरकार ने अपने स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल इतिहास की पुस्तकों की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया है। स्पष्ट तौर पर यह विभाजनकारी एजेंडा को पूरा करने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करने का प्रयास है। स्कूल बोर्ड ने मुगल बादशाह अकबर पर केंद्रित एक पूरे पाठ को हटाते हुए उन्हें तीन पंक्तियों में सीमित कर दिया है। छात्र अब छत्रपति शिवाजी के संदर्भों के जरिए ही मुस्लिम शासकों के बारे में जान पाएंगे, जैसे अफजल खान, औरंगजेब आदि। और यह तय है कि शिवाजी के संदर्भ में इन मुस्लिम शासकों की नकारात्मक छवि ही गढ़ी जाएगी।

पाठ्य पुस्तकों का पुनर्लेखन करने वाली विषय समिति के प्रमुख सदानंद मोरे ने सरकार के इस कदम का जोरदार बचाव किया है। वे कहते हैं कि महाराष्ट्र के छात्रों को मुगलों से ज्यादा शिवाजी के बारे में जानना चाहिए। लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि इसके लिए मुगल राजाओं से संबंधित पूरा अध्याय ही हटा देने की क्या जरूरत थी।

शिवाजी के जीवनी लेखक और उनके गाथागीत लिखने वाले प्रसिद्ध इतिहासकार बाबासाहेब पुरंदरे कहते हैं, ‘यह मामला शिक्षा का कम और राजनीति का ज्यादा है और इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।’

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार ने 2015 में पुरंदरे को महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया था। इसका राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने कड़ा विरोध किया था जो शिवाजी की विरासत पर विशेष रूप से अपना दखल बनाना चाहती थी।

एनसीपी ने द्रोणाचार्य सम्मान के बराबर महाराष्ट्र के एक पुरस्कार को दादोजी कोंडदेव के नाम पर करने के लिए अपनी ही सरकार को मजबूर किया था। दादोजी कोंडदेव शिवाजी के गुरू थे जिन्होंने शिवाजी के पिता की अनुपस्थिति में उनका पालन-पोषण किया और उनको एक शानदार योद्धा बनाया।

मराठा केंद्रित पार्टी एनसीपी का वर्तमान सरकार के ब्राह्मण वर्चस्व से संघर्ष जारी है। लेकिन उनका यह ब्राह्मण विरोध पेशवा काल से ही है जब इस राजवंश के प्रधानमंत्रियों ने शिवाजी के बाद के वंशजों पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया और वे उनका मराठा साम्राज्य (1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद) हार गए। इसके बाद अंग्रेजों के लिए उनके साम्राज्य पर पूरी तरह से कब्जा करना आसान हो गया।

वास्तव में, जब 2014 में यह स्पष्ट होने लगा कि भाजपा विधानसभा चुनाव जीत सकती है तो एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से अपने समर्थकों को ध्यान दिलाया था कि राज्य में ब्राह्मण वर्चस्व वापस आने का खतरा है। वर्तमान कैबिनेट में मुश्किल से एक मराठा मंत्री को जगह मिलने से उनकी सबसे बड़ी आशंका सच साबित हुई। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना एक तीर से दो निशाना लगाने का प्रयास हो सकता है। पहला, शिवाजी को महत्व देकर नाराज मराठाओं को अपने पाले में करना और साथ में अपने मुस्लिम विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाना (हालांकि, मराठा कभी मुस्लिम विरोधी नहीं रहे और शिवाजी की सेना में भी कई मुस्लिम सेनापति थे)।

मराठा हमेशा से पुरंदरे जैसे इतिहासकारों को शिवाजी के ऊपर ब्राह्मण गाथा लादने का जिम्मेदार ठहराते रहे हैं और सवाल उठाते रहे हैं कि मराठाओं को हथियारों और युद्ध कौशल की शिक्षा कैसे एक ब्राह्मण दे सकता है। पुरंदरे के मार्गदर्शन में लिखी गई जेम्स लेन्स की किताब का उनके द्वारा किए गए विरोध के पीछे यही वजह थी।

लेकिन अब शिवाजी पर सबसे ज्यादा पढ़ी गई पुस्तक ‘राजा शिवछत्रपति’ के इस लेखक का मानना है कि छात्रों को इतिहास की सटीक जानकारी हासिल करने का हक है। हालांकि वह जोर देते हैं कि हाल में किए गए इतिहास के पाठ्य पुस्तकों के पुनर्लेखन पर यह टिप्पणी नहीं है, जिसे उन्होंने अभी तक पढ़ा भी नहीं और उसकी पिछले पाठ्य पुस्तक से तुलना भी नही की।

कांग्रेस नेता और कई स्कूल और कॉलेज संचालित करने वाले इसामीली एजुकेशन ट्रस्ट के प्रबंधकीय ट्रस्टी जावेद श्रॉफ अपनी टिप्पणियों को लेकर सावधानी बरतते हैं। लेकिन वे इस बात पर पुरंदरे से सहमत हैं कि छात्रों को इतिहास की अच्छी जानकारी की जरूरत है। वह कहते हैं, ‘इतिहास को विकृत नहीं किया जाना चाहिए। अगर उनकी मुगलों को लेकर नकारात्मक सोच है तो भी छात्रों को मुगल शासन और संस्कृति के सभी पहलुओं की जानकारी दी जानी चाहिए। यह उन्हें अपनी सोच बनाने में मदद करेगा।’

पहले कई स्कूली पुस्तक समितियों में रह चुके और अपने उदार विचारों के लिए बाहर कर दिए गए अमरकंटक स्थित राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के किशोर गायकवाड़ कहते हैं, ‘युवा मस्तिष्क में ‘दूसरों’ के प्रति नफरत भरे बिना कैसे उनके लिए इतिहास लिखा जाए, यह युवा छात्रों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने वालों के लिए सबसे मुश्किल काम है।’

उनका कहना है, ‘मुझे इतिहास की उन किताबों से बुनियादी समस्या है जो सिर्फ हमारे और उनके बारे में बात करती हैं। भारत संस्कृतियों, जातियों, धर्मों, परंपराओं और राजवंशों का मेल है। यहां तक कि मुसलमान भी अखंड नहीं हैं और कभी भी नहीं थे। अतीत में ये मुगलों, अफगानों, तुर्कों, ईरानियों और मंगोलों आदि के मिश्रण थे। वे सभी एक-दूसरे के साथ युद्ध करते रहते थे। लेकिन आम लोगों को पता था कि वे अलग थे और फिर भी उनके बीच कोई विवाद नहीं था। उस समय विभिन्नता में एकता एक सच्चाई थी, आज की तरह यह खोखला नारा नहीं था। हमें एक दूसरे से नफरत करने के बजाय विभिन्नताओं को स्वीकार करते हुए फिर से उसी एकता की ओर लौटना चाहिए।’

हालांकि उनकी इस अपील को कोई सुनने वाला नहीं है। इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मोरे से सहमत है, लेकिन इतिहास पाठ्यक्रम के सिर्फ कुछ बिंदुओं पर। 27 साल तक स्कूल पुस्तक समितियों में रहे पुणे स्थित सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय के राजा दीक्षित कहते हैं कि उन्हें भी इस बात की चिंता है कि नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशन, रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) द्वारा किस तरह से काफी हद तक उत्तर भारत केंद्रित इतिहास पढ़ाया जा रहा है। सिर्फ शिवाजी ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के अन्य राजवंशों का भी एनसीईआरटी के पाठ्य पुस्तकों में मुश्किल से उल्लेख मिलता है, चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम। इस प्रकार की पाठ्य पुस्तकों में सभी को शामिल करने के लिए पाठ्यक्रम सुधार की बहुत आवश्यकता है।

लेकिन भारत को बनाने वाली इन संस्कृतियों और परंपराओं को स्वीकार करने की कोई संभावना नहीं नजर आती है। बॉम्बे विश्वविद्यालय की सीनेट के पूर्व सदस्य और एक स्वतंत्र राजनीतिक कार्यकर्ता तुषार जगताप कहते हैं, ‘नए सिरे से इतिहास लिखने के इस प्रयास में हर जगह सावरकर नजर आ रहे हैं। सदानंद मोरे एक हार्डकोर सावरकरवादी हैं। और सावरकर अपनी विकृत विचारधारा के अनुरूप इतिहास को बिगाड़ने के लिए जाने जाते हैं। यहां किसी पाठ्यक्रम सुधार की उम्मीद न करें।’

यह बात उन सभी छात्रों के लिए वास्तविक खतरा पैदा करती है जो शिवाजी के नाम पर नफरत और कट्टरता की साजिश के साये में शिक्षित हो रहे हैं, जबकि शिवाजी उन मूल्यों के पूरी तरह खिलाफ थे जिसे आज युवाओं के दिमाग में भरा जा रहा है।

Published: 21 Aug 2017, 4:45 PM
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