इस चमक-दमक में हॉकी को न भूलें

भारत और दक्षिण एशिया के दूसरे देशों में खेल के कारोबार में क्रिकेट और फुटबॉल को हॉकी पर तरजीह मिलती है। जब तक हमें उसमें सफलता मिलती थी, वह हमारा राष्ट्रीय खेल था। हाल के वर्षों में हॉकी को लेकर उत्साह में लगातार गिरावट आई है। यह बात मीडिया की कवरेज में देखी जा सकती है।

फोटो: सोशल मीडिया
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प्रमोद जोशी

रूस में चल रही विश्व कप फुटबॉल प्रतियोगिता से पहले जर्मनी की विदाई हुई। उसके बाद मेसी के अर्जेंटीना, रोनाल्डो के पुर्तगाल और अब स्पेन की विदाई भी हो गई। सारी दुनिया विश्व कप के रंग से सराबोर है। हमारा भारत भी। बंगाल, गोवा, केरल और कर्नाटक में फुटबॉल के दीवाने बड़ी तादाद में हैं। इस दीवानगी के पीछे खेल परम्परा का हाथ है और उसकी मार्केटिंग की भूमिका भी है। भारत और दक्षिण एशिया के दूसरे देशों में खेल के कारोबार में क्रिकेट और फुटबॉल को हॉकी पर तरजीह मिलती है। जब तक हमें उसमें सफलता मिलती थी, वह हमारा राष्ट्रीय खेल था। हाल के वर्षों में हॉकी को लेकर उत्साह में लगातार गिरावट आई है। यह बात मीडिया की कवरेज में देखी जा सकती है।

रविवार की रात नीदरलैंड्स के ब्रेडा शहर में हॉकी की अंतिम चैम्पियंस ट्रॉफी का फाइनल मैच भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेला गया। मैच का फैसला पेनाल्टी शूट आउट से हुआ, जिसमें भारतीय टीम परास्त हो गई। ऑस्ट्रेलिया की टीम इस वक्त दुनिया की नम्बर एक टीम है, उससे हारने में अचरज नहीं है। अचरज इस बात पर जरूर है कि अब हॉकी का खेल दर्शकों और मीडिया की नजरों में दूसरे या तीसरे दर्जे पर पहुंच गया है। अखबारों को उठाकर देख लीजिए। टूर्नामेंट शुरू होने के पहले टीमों के विश्लेषण, खिलाड़ियों के परिचय, भाग लेने वाली टीमों की सेहत, रणनीतियों वगैरह के लिए अब जगह नहीं है।

मीडिया कवरेज के लिहाज से देखें तो क्रिकेट, फुटबॉल और टेनिस के मुकाबले हॉकी नीचे पहुँच गई है। कई बार फॉर्मूला-1 की कार रेस और गोल्फ जैसे खेल उससे ज्यादा जगह लेते हैं। कवरेज का मापदंड आमतौर पर सफलता से तय होता है। ज्यादा बड़ी सफलता, ज्यादा बड़ी कवरेज। बेशक चैम्पियंस ट्रॉफी हॉकी और विश्व कप फुटबॉल में कोई मुकाबला नहीं है। हॉकी की प्रतियोगिता अपने रूप और आकार में कहीं छोटी है। पर इनमें अपनी भागीदारी को भी तो देखिए।

फीफा की नवीनतम रैंकिंग में हम 97वें नम्बर पर हैं। इसे हाल के वर्षों का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन माना जा रहा है। एक साल पहले जून 2017 में हमारी रैंक 101 थी, उसके एक साल पहले 163, 2015 में 142, 2014 में 154 और 2013 में 148। हाल में भारतीय ओलिंपिक संघ (आईओए) भारतीय पुरुष और महिला फुटबॉल टीमों को इस साल अगस्त में इंडोनेशिया में होने वाले एशियाई खेलों में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी।

आईओए नियमों के अनुसार महाद्वीपीय स्तर आठ तक रैंकिंग वाली टीमों को ही एशियाई खेलों में भाग लेने का मौका दिया जाएगा। भारतीय टीम की एशिया में रैंकिंग 14 है। विडंबना है कि सुधरते प्रदर्शन के बावजूद टीम को एशियाई खेलों में खेलने की स्वीकृति नहीं मिली। जब तक टीमों को अंतरराष्ट्रीय मैदानों पर खेलने का अनुभव नहीं होगा, उनसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। पिछले साल हमने फीफा की अंडर-17 विश्व कप प्रतियोगिता का आयोजन भारत में करके इसकी शुरूआत की है। बेहतर परिणाम मिलेंगे। हमें फुटबॉल में भी बेहतर प्रदर्शन की जरूरत है। हमारी टीम कभी एशिया चैम्पियन थी।

फुटबॉल के मुकाबले हॉकी में हम इस वक्त दुनिया में छठे नम्बर पर हैं। हमारी टीम आठ ओलिम्पिक स्वर्ण पदक जीत चुकी है। लम्बी बदहाली के बाद हाल के वर्षों में उसने फिर से सिर उठाया है। हमें मुगालता है कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। मीडिया के कारण कई तरह के ‘पर्सेप्शंस’ बनते और बिगड़ते हैं। हाल में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने हॉकी को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय खेल घोषित करने की मांग की थी। पता नहीं इस मांग का क्या बनेगा, पर इतना साफ है कि कोई भी खेल जनता के समर्थन से ही आगे बढ़ता है। आमतौर पर कॉरपोरेट हाउस खेल को आगे बढ़ाते हैं, पर हमारे देश में ओडिशा राज्य भारतीय हॉकी टीम का आधिकारिक प्रायोजक है। हॉकी इंडिया बनने के बाद से देश में इस खेल की गतिविधियाँ बढ़ीं हैं।

हॉकी इंडिया लीग की वजह से विदेशी खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका हमारे खिलाड़ियों को मिल रहा है। इसका असर टीम के प्रदर्शन में देखने को मिल भी रहा है, पर उसे ज्यादा समर्थन की दरकार है। लगातार विदेशी कोचों के साथ प्रयोग करने के बाद इस वक्त टीम की बागडोर हरेन्द्र सिंह के पास है, जिनके नेतृत्व में भारत की टीम ने 2016 में लखनऊ में हुई जूनियर विश्व कप प्रतियोगिता को जीता था। ब्रेडा में सीनियर और जूनियर खिलाड़ियों के बीच बेहतर संतुलन की वजह से भारतीय टीम ने बेहतर प्रदर्शन करके दिखाया, जबकि हाल में गोल्डकोस्ट में हुए कॉमनवैल्थ खेलों में हमारी टीम का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा।

रविवार की रात हुए फाइनल मैच के पेनाल्टी शूटआउट में टीम परास्त जरूर हो गई, पर पिछले तीन दशक की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारतीय टीम के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में यह एक था। इस प्रतियोगिता में हमने ओलिम्पिक चैम्पियन अर्जेंटीना को हराया। बेल्जियम और पाकिस्तान पर जीत हासिल की। हॉलैंड के खिलाफ बराबरी से खेला। यह अच्छा संकेत है। यह टीम बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, पर उसे सहारा और समर्थन चाहिए। इस साल भुवनेश्वर में हॉकी की विश्व कप प्रतियोगिता होने वाली है। यह मौका है जब हम विश्वकप जीतकर अपनी वापसी का एलान कर सकते हैं।

सन 1983 में जब कपिल देव की टीम ने एकदिनी क्रिकेट का विश्व कप जीता था तब उन्हें इस बात का एहसास नहीं रहा होगा कि वे दक्षिण एशिया में न सिर्फ खेल बल्कि जीवन, समाज, संस्कृति और मनोरंजन की परिभाषाएं बदलने जा रहे हैं। सामान्य दर्शक को सफलता और हीरो चाहिए। क्रिकेट ने दोनों चीजें दीं। बॉलीवुड के अभिनेता, अभिनेत्री क्रिकेट में और सारे देश के नेता क्रिकेट में। क्रिकेट में पैसा, इज्जत और शोहरत है। खिलाड़ी का एक छक्का उसे शोहरत के दरवाजे पर खड़ा कर देता है। पर क्या हॉकी के खिलाड़ी को वही शोहरत मिलती है? हम अपने हॉकी सितारों को कितना पहचानते हैं? क्रिकेट, फुटबॉल या टेनिस आप जिसे पसंद करना चाहें करें, पर गुज़ारिश है कि चमक-दमक में आप अपनी हॉकी को न भूलें।

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