Hockey World Cup: भारतीय हॉकी को पुनर्जीवित करने की कोशिश और खोए सम्मान की तलाश

हॉकी वर्ल्ड कप का शुक्रवार से आगाज हो गया। आज पहले दिन 4 मुकाबले खेले जा रहे हैं। भारतीय टीम वर्ल्ड कप का आगाज स्पेन के खिलाफ करेगी। दोनों टीमों के बीच कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है। लेकिन भारतीय टीम को घरेलू माहौल का फायदा मिलने की उम्मीद है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया

स्टील सिटी राउरकेला का एक प्रमुख प्रमुख चौराहा ‘हॉकी चौक’ के नाम से लोकप्रिय है। यहां पत्थर तराशकर बनाई गई एक विशाल हॉकी स्टिक है जिसे आप ट्रैफिक पोस्ट भी कह सकते हैं। ‘हॉकी विश्व कप’ की इतनी ही विशाल प्रतिकृति भी स्टील सिटी को इन दिनों इसके साथ गौरवान्वित कर रही है जो 13 से 19 जनवरी के बीच आयोजित विश्वकप हॉकी 2023 का सह-मेजबान है। राउरकेला मंदिरों के शहर और सूबे की राजधानी ओडिशा के साथ इसका सह-मेजबान है। 

हॉकी स्टिक दरअसल खेल के प्रति जुनूनी, देश के इस हिस्से के लिए बड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक है जहां का आदिवासी समाज, खासकर युवा लड़के-लड़कियां एक सदी से भी ज्यादा अरसे से हॉकी के प्रति समर्पित हैं। कहते हैं कि यहां किसी बच्चे को कैसी भी छड़ी दे दीजिए, आगे उसे आप हॉकी खेलता पाएंगे।

यहां स्कूल जाते लड़के-लड़कियों के कंधे पर स्कूल बैग रहता है और हाथ में प्रायः उनके कद से भी बड़ी हॉकी। ओडीशा और झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों का लंबे समय से यह चिर-परिचित नजारा रहा है। यह घर में ही तैयार होती हैं। लंबी लकड़ी या पेड़ की डाली जिसका एक सिरा थोड़ा मुड़ा हुआ हो लिया और बन गई ‘हॉकी’। कई बार इसका एक सिरा धीमी आंच पर, धीमे-धीमे इस तरह जलाया जाता है, कि वह सिरा सख्त और थोड़ा ज्यादा टिकाऊ बन जाए।

यहां हॉकी स्टिक जीवन से मृत्यु तक साथ निभाती है। सिर्फ खेलने के लिए नहीं, बच्चे इसकी मदद से चलना सीखते हैं तो बुजुर्ग इसका सहारा लेकर खड़े रहना। यानी हर आयु वर्ग की पसंद भी है, जरूरत भी।

पूर्व ओलंपियन पीटर तिर्की याद दिलाते हैं कि दूरदराज इलाकों में स्कूल चलाने वाले ईसाई मिशनरियों का हॉकी की लोकप्रियता में कितना योगदान है। ऐसे नजारे आम हैं जहां बच्चे पुराने कपड़ों या नारियल के छीलन का गोला बनाकर, उसे सख्ती से बांधकर गेंद तैयार करते हैं और स्टिक तो उनके लिए सहज सुलभ होती है, लकड़ी या डाली के रूप में। यानी हॉकी जीवन में शामिल है और इसे उनसे कोई अलग नहीं कर सकता।


सुनने में ही अच्छा लगता है कि गांव-जवार में भी हॉकी प्रतियोगिताओं का आयोजन यहां खासा नियमित है और इनमें विजेता टीम को बतौर ट्रॉफी खस्सी (बकरा) दिया जाता है। ये खस्सी वाले टूर्नामेंट खासे लोकप्रिय और भीड़जुटाऊ होते हैं। समापन ग्रामीणों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता और इसमें हंडिया (घर निर्मित चावल की बीयर), महुआ (जंगलों में सहज सुलभ महुआ से बनी शराब) और भोजन के साथ खूब मस्ती होती है। गांव अगर थोड़ा समृद्ध हुआ तो पुरस्कार के तौर पर एक से ज्यादा बकरे, या विजेता को दो तो उपविजेता टीम को भी एक बकरा मिल जाता है। 

सुंदरगढ़ की ऐसी तमाम परंपराएं, उनके किस्से खेलों के प्रति यहां के लोगों की दीवानगी का बयान हैं। कई बार तो शादी-ब्याह भी हॉकी टूर्नामेंट का बहाना बन जाते हैं जिनमें एक टीम वर, दूसरी वधू पक्ष की होती है, और दोस्ताना मैच होते हैं, जिनका समापन मैत्री-भोज से होता है।

यह आनायास नहीं है कि सुंदरगढ़ जैसे दूरस्थ जिले ने 70 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देश को दिए हैं जिनमें से पांच महिला और पुरुष हॉकी टीमों के कप्तान बने। इन्हीं में भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान दिलीप तिर्की भी शामिल हैं। पुरुष टीम के इग्नेस तिर्की, लाजर बारा, बीरेन्द्र लकड़ा, अमित रोहितदास और महिला टीम की ज्योति सुनीता कुल्लू, सुभद्रा प्रधान, सुनीता लकड़ा और दीप ग्रेस एक्का इसी जिले से आते हैं।

सुंदरगढ़ अब पंजाब के संसारपुर, कर्नाटक के कुर्ग, भोपाल और लखनऊ को पीछे छोड़ देने वाले भारतीय हॉकी के पालना घर के तौर पर याद किया जाता है। यह संभवतः देश का अकेला ऐसा जिला है जहां तीन हॉकी अकादमियां हैं। पहली अकादमी 1985 में पनपोश में बनी जब माइकल किंडो रिटायर होने के बाद राउरकेला बस गए। 1992 में राउरकेला स्टील प्लांट ने सेल हॉकी अकादमी शुरू की और 2002 में भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) ने सुंदरगढ़ में एक और अकादमी बना दी। जिले में अब राउरकेला के बिरसा मुंडा अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम (पिछले सप्ताह उद्घाटन) के अलावा 16 सिंथेटिक टर्फ भी हैं। 

इसी जिले का सौनमारा अब हेरिटेज हॉकी गांव है। सुदूर बालिसंकारा ब्लॉक में बसे इस गांव ने एक से बढ़कर एक हॉकी सितारे देश को दिए हैं जिनमें दिलीप तिर्की, इग्नास तिर्की, लाजरस बारला, ज्योति सुनीता कुल्लू, सुनीता लकड़ा, दीप ग्रेस एक्का, अमित रोहितदास (2012 में भारत को कांस्य पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले) और बीरेन्द्र लकड़ा शामिल हैं। दिलीप के पिता विंसेंट तिर्की राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने वाले गांव के पहले खिलाड़ी थे और उन्होंने ही अन्य ग्रामीणों को प्रतिस्पर्धी हॉकी में हिस्सा लेने और खेल स्तर सुधारने का मंत्र दिया।

उचित ही है कि विश्वकप से पहले सौनमारा से ही खेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक लंबी शृंखला शुरु हुई है। सबसे शानदार काम तो अंतर-जिला चैम्पियनशिप है जिसमें चौंका देने की हद तक 850 टीमें  हिस्सा ले रही हैं।


मामूली कौतुक का विषय नहीं है कि हॉकी विश्वकप 2023 की मेजबानी संयुक्त रूप से ‘टेम्पल सिटी’ भुवनेश्वर और ‘स्टील सिटी’ राउरकेला के हाथ में है, जिनके बीच 300 किलोमीटर के आसपास की दूरी है। दोनों शहर टूर्नामेंट के आधिकारिक नीले रंग में सराबोर हो चुके हैं।

यह भी दुर्लभ है कि चार वर्ष के अंतराल पर आयोजित होनेवाला विश्वकप लगातार उसी देश नहीं, बल्कि उसी शहर और उसी धरती पर भी हो रहा हो जहां पिछला हुआ था। लेकिन भारत 2018 में 14वें विश्वकप की मेजबानी कर चुका है और 15वें की करने जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि 2018 में सभी मैच भुवनेश्वर के कलिंग स्टेडियम में खेले गए थे जबकि इस बार 44 में से 20 मैच राउरकेला स्थित देश के सबसे बड़े हॉकी स्टेडियम बिरसा मुंडा इंटरनेशनल हॉकी स्टेडियम में खेले जाएंगे। 21 हजार दर्शकों के बैठने की क्षमता वाला यह स्टेडियम 15 महीने में बनकर तैयार हुआ है।

भुवनेश्वर 2014 में चैम्पियंस ट्रॉफी और 2017 में विश्व हॉकी लीग की सफलतापूर्वक मेजबानी कर चुका है। 2021 में का एफआईएच जूनियर पुरुष हॉकी विश्वकप भी कलिंग स्टेडियम में ही खेला गया था।

2018 में ओडिशा के जिम्मेदारी लेने की पहल के बाद सहारा समूह ने हॉकी इंडिया से अपना प्रायोजन वापस ले लिया था। ओडिशा का खेल बजट 2022-23 में बढ़कर 506 करोड़ रुपये हो चुका है जबकि 2010-11 में यह महज 28 करोड़ रुपये (दिल्ली में 2010 में 12वां विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट आयोजित हुआ) था। हॉकी इंडिया लीग में ओडिशा अकेला ऐसा राज्य है जिसकी अपनी टीम ‘कलिंग लांसर्स’ भी है। हॉकी के अलावा ओडिशा एशियाई एटलेटिक्स चैम्पियनशिप की मेजबानी भी कर चुका है।   

यह सब शायद किसी विशेष रुचि के बिना संभव न होता और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का दून स्कूल वाले दिनों से ही आउटडोर खेलों के प्रति झुकाव राज्य में खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने के पीछे मुख्य कारण रहा है। राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी बीजू जनता दल (बीजद) और राजनीतिक तौर पर हर प्रयास में लंबी सेंधमारी की कोशिश में लगी बीजेपी में इस वक्त भविष्य की घटनाओं का श्रेय लेने की होड़ मची है। 2024 के आम चुनाव और उसी वर्ष राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के कारण यह होड़ ज्यादा गलाकाट हो गई है। बीजेपी द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति भवन में बिठाकर जहां अपनी पीठ ठोकती दिख रही है, बीजेडी चुनाव पूर्व उड़िया गौरव को भुनाने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहती और इसके लिए पूरी ताकत लगा रही है।

पटनायक ने 5 जनवरी को बिरसा मुंडा स्टेडियम का उद्घाटन करते वक्त दावा भी किया कि भुवनेश्वर देश की खेल राजधानी बनकर उभरा है। उन्होंने विश्व कप जीतने पर भारतीय टीम के हर सदस्य को एक-एक करोड़ रुपये के नकद पुरस्कार की भी घोषणा की थी। 


राउरकेला को विश्वकप के पहले बड़ी व्यावसायिक आमद की उम्मीद में पिछले पखवारे नवनिर्मित हवाई अड्डे पर पहली व्यावसायिक लैंडिंग के बाद नागरिक उड्डयन ग्रिड से भी जोड़ा जा चुका है। इस अवसर के बहाने स्टीलसिटी को एक चमकती हुई नई बस सेवा का तोहफा भी मिल गया है।

ताज समूह सभी टीमों को रहने-खाने की सुविधा मुहैया करा रहा है तो इस बार का विश्वकप गीत (एंथम) बॉलीवुड के संगीत निर्देशक प्रीतम ने तैयार किया है। 2018 का विश्वकप एंथम एआर रहमान का था।

भारतीय हॉकी 2021 में 40 साल के लम्बे सूखे से उबरी है। 1980 के मास्को ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद से भारत ने पॉवर हाउस वाली अपनी पुरानी प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए लंबा संघर्ष किया है। अगस्त, 2021 में पुरुषों की टीम ने जर्मनी को हराकर कांस्य पदक जीता था जबकि एक दिन पहले ही महिला टीम ने आस्ट्रेलिया को अप्रत्याशित तौर पर हराकर सेमीफाइनल में एंट्री मारी थी और उम्मीदें खासी बढ़ा दीं थीं। 2023 का विश्वकप भारतीय हॉकी के लिए खुद को भुनाने का एक और शानदार मौका है।    

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