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राजनीतिक गोलबंदी का केंद्र बनते धार्मिक अनुष्ठान: सईद नकवी

आजादी से लेकर अब तक बहुत बदलाव हुआ है। जो नहीं बदला है, वह है हमारा जातिवाद, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास। दिमाग का विभाजन हुआ है। यह बहुत भयानक है।

कांवड़ यात्रा/ फोटो: Getty Images 

रोहित प्रकाश

सईद नकवी जाने माने पत्रकार और लेखक हैं। पिछले करीब चार दशक से खबरों की तलाश में देश और दुनिया में घूमते रहे हैं। नकवी ने 1971 के भारत-पाक युद्ध से लेकर तमाम जंगों की रिपोर्टिंग की है। सईद नकवी ने विश्व की प्रसिद्ध राजनीतिक शख्सियतों को इंटरव्यू किया है। इनमें नेल्सन मंडेला, फिदेल कास्त्रो, मुअम्मर गद्दाफी, बेनजीर भुट्टो आदि शामिल हैं। नकवी भारत की विविध संस्कृति पर लेख लिखने के साथ डॉक्यूमेंट्रीज़ भी बनाते रहे हैं। उनकी किताबें, “रिफ्लेक्शंस ऑफ ए इंडियन मुस्लिम” और “दि लास्ट ब्राह्मण प्राइम मिनिस्टर” काफी सराही गयी हैं। उनकी नई किताब “बीइंग दि अदर” हाल ही में प्रकाशित हुई है।

सईद नकवी/फोटो: राज्यसभा टीवी, यू ट्यूब ग्रैब
सईद नकवी/फोटो: राज्यसभा टीवी, यू ट्यूब ग्रैब

इस साल देश की आजादी के 70 साल पूरे होने के मौके पर हमने सईद नकवी से लंबी बातचीत की। हमारा पहला सवाल था कि आजादी के सात दशक बाद, अब भी ऐसे कौन से सवाल हैं जिन्हें सुलझाया नहीं जा सका?

आजादी से लेकर अब तक बहुत बदलाव हुआ है। अर्थव्यवस्था बदली है, लोगों की अकांक्षाएं बदली हैं, नया मध्यवर्ग बना है, पूरी सूचना तकनीन का एक बड़े उद्योग के रूप में स्थापित हुई है। लेकिन यह सब बहुत सीमित दायरे में हुआ है। संसाधन के बंटवारे में इंसाफ नहीं हुआ। सिर्फ एक खास तबके के जीवन में बदलाव आया है। यह सबकुछ 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद हुआ है। ,कुछ न कुछ तो सही हुआ होगा तभी यह सब संभव हुआ है। लेकिन, जो नहीं बदला है, वह है हमारा जातिवाद, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास। धार्मिक अनुष्ठानों को राजनीतिक गोलबंदी में तब्दील कर दिया गया है। दिमाग का विभाजन हुआ है। यह बहुत भयानक है। कहीं न कहीं यह खत्म होगा। अगर यह रहेगा तो समाज और दूषित हो जाएगा।

भारत में मुसलमानों का क्या भविष्य है और अपने भविष्य को वे कैसे बना सकते हैं?

भारत में मुसलमानों के भविष्य को अलग-अलग तरीके से देखा जा सकता है। इस वक्त केरल और बंगाल में मुसलमानों की हालत अलग है। दरअसल मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा संकट हिंदी पट्टी में आया है। ऐसा लग रहा है कि ये इलाके एक देश नहीं बल्कि अलग-अलग हिस्से हैं। भगवा ताकतें दलितों के राजनीतिक एकीकरण में लगी हुई हैं और इसके साथ मुसलमानों को अलग-थलग करने की कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन सामाजिक एकीकरण करने में उन्हें अभी भी दिक्कत हो रही है क्योंकि दलितों को अपने घर में बैठाने में उन्हें समस्या है।

इन हालात में मुस्लिम बुद्धिजिवियों और नेतृत्व की क्या भूमिका है? जो सामाजिक और राजनीतिक मुख्यधारा बन रही है उसमें मुसलमान कैसे शामिल हो सकते हैं?

जो मुख्यधारा बन रही है, उसमें फर्क है। हमारे नेताओं ने मुल्ला-मौलवियों से दो वजहों से समझौता कर लिया है। हिन्दुओं और मुसलमानों का देश में अलग-अलग तरह से विकास हुआ। विभाजन के बाद एकीकरण के जो तत्व थे वे कमजोर हो गए। जिसे हम गंगा-जमुनी तहजीब कहते थे, वे कमजोर हो गए। मुस्लिम नेतृत्व धीरे-धीरे समझौता करने को मजबूर होगा और जो समझौता करेगा वह मौलवी होगा। क्योंकि दक्षिणपंथ को मुसलमानों के प्रतिनिधि के तौर पर मौलवियों को सामने रखना सुविधाजनक लगता है, ताकि वे उन्हें कट्टर लोगों की तरह दिखा सकें और यह बता सकें कि मुसलमान ऐसे ही होते हैं।

पिछले दिनों आपका एक लेख छपा कि पत्रकारों को क्या करना चाहिए। भारत में फिलहाल मीडिया की स्थिति में बारे में आपकी क्या राय है?

मीडिया पूंजीपतियों के हाथ में है। उसकी नीतियां चलती हैं। फिलहाल वह देश के सत्ताधारी दल के साथ है। पहली दफा भारत के इतिहास में ऐसा हुआ है। अच्छी मीडिया का सिद्धांत यह होता था कि वह सरकार के कामों पर सवाल उठाए। इस वक्त यह अजीब है कि मीडिया सत्ता के पक्ष में विपक्ष पर सवाल उठा रहा है।

कश्मीर का मुद्दा आजाद भारत के 70 साल के बाद भी अनसुलझा है। इसका कोई समाधान है?

1947 में हम एक त्रिकोण में फंस गए। हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान और दिल्ली-कश्मीर वह त्रिकोण है। यह आपस में जुड़े हुए ऐसे जटिल मुद्दे हैं जिनमें किसी एक को भी छूने पर असर सब पर पड़ेगा। कश्मीर को सुलझाने के लिए पाकिस्तान से बात करनी पड़ेगी और जिस दिन पाकिस्तान को लाएंगे तो हिंदू-मुस्लिम रिश्तों पर उसका असर पड़ेगा। इसे फिलहाल कोई समझना नहीं चाह रहा है। अगर जो इन दिनों हो रहा है, वैसे ही चलता रहा तो इस त्रिकोण से हम नहीं निकल पाएंगे।

नरेन्द्र मोदी के तीन साल के शासन को आप कैसे देखते हैं?

बहुत नुकसान हुआ है। बहुत सामाजिक उथल-पुथल हुई है। कई तरह के झूठ बोले गए और उनका अपने पक्ष में इस्तेमाल किया गया, यह बात उनके समर्थकों की समझ में नहीं आ रही है।

चीन और भारत के लिए अपने सीमा संबंधी विवाद को सुलझाना इतना मुश्किल क्यों हो रहा है और वे नियंत्रण रेखा को अंतर्राष्ट्रीय सीमा के तौर पर स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

दो प्राचीन सभ्यताएं जो एक दूसरे के आसपास बसी हुई हैं, उनमें हमेशा एक प्रतिस्पर्धा रहेगी। यह बात बिल्कुल गलत कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में पड़ोसी देश मित्रवत रहते हैं। वास्तव में, पड़ोसी मुल्कों से बेहतर संबंध रखना एक कुटनीतिक कला है। हम अपने पड़ोसी देशों के साथ ऐसा करने में नाकामयाब रहे हैं। चीन हमसे कई मामलों में आगे है और हर वक्त इस तथ्य को सामने रखना चाहेगा। आप अपने एक पड़ोसी देश से कैसे निपटेंगे जो आर्थिक और तकनीकी रूप से आपसे आगे है? सत्ता-संतुलन बनाकर आप ऐसा कर सकते हैं। हम वहां भी असफल हो रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय सीमा एक जटिल मुद्दा है। जब आप जवाहरलाल नेहरू और चाउ-एनलाइ के बीच हुए पत्राचार को पढ़ेंगे, तो आपको यह बात समझ में आएगी।

चीन ने कई देशों के साथ अपनी सीमाओं को दुरूस्त किया है, हमारे लिए यह इतनी बड़ी समस्या क्यों है?

मेरी नजर में समस्या यह है कि एक अलग परिस्थिति में ब्रिटिश साम्राज्य ने जो सीमाएं बनाई थी, हम उसका फायदा ले रहे हैं। दूसरे शब्दों में, एक शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य ने जबरदस्ती एक सीमा खींच दी, हम उसे बनाए रखना चाहते हैं, जबकि हम कहते हैं कि हम उनसे आजाद हुए हैं।

इस बार चीन इतना झगड़े के मूड में क्यों है?

कई मुद्दे हैं। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने ‘वन रोड, वन बेल्ट’ की पहल की है। यह दुनिया के एक बड़े हिस्से में फैला है। यह उनके सिल्क रूट तक जाता है। क्योंकि यह चीन की पहल है, इसलिए हम उसमें हिस्सा नहीं लेंगे। हमने कहा कि हम पाकिस्तान-चीन आर्थिक कॉरिडोर की वजह से इसके खिलाफ हैं। हम कह रहे हैं कि यह इलाका विवादित है। वे कह रहे हैं कि इस पर बातचीत करते हैं। हो सकता है कि वे कुछ समझौता करना चाहते हों। हमारे पास भी दबाव बनाने के कुछ मुद्दे हैं। असल में हम उस कॉरिडोर की रक्षा करना चाह रहे हैं जो पूर्वोतर को पूरे देश से जोड़ता है। अगर भूटान मदद मांगता है तो भारत को यह अधिकार है कि उसकी मदद करे।

जब ऐसा लग रहा है कि चीन लगातार रूस के नजदीक जा रहा है और भारत के भी संबंध अमेरिका से गहरे हो रहे हैं, तो क्या भविष्य के तनावपूर्ण होने की संभावना है?

भविष्य बहुआयामी है। कुछ भी वैसा नहीं रहेगा जैसा अभी है। हमने पहले कभी अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य को ऐसी हालत में नहीं देखा था। हम एक ऐसी शक्ति दांव पर लगा रहे हैं जो मौजूद ही नहीं है और एक दुश्मन के खिलाफ जिसकी पहचान साफ नहीं है।

मौजूदा सरकार की विदेश नीति को आप कैसे देखते हैं?

इस सरकार की विदेश नीति पुरानी सरकारों से काफी अलग नहीं है। 1990 तक हमारी विदेश नीति अलग थी। उस समय दुनिया के स्तर पर दो गुट थे और हम किसी के साथ नहीं थे। हालांकि हमारी गुटनिरेपक्षता सोवियत संघ के प्रति थोड़ी झुकी हुई थी। इसकी वजह यह थी कि वे हमारे करीब थे। उन्होंने बंगलादेश के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। 1990 के बाद, सोवियत संघ का पतन हो गया, इसलिए हमें गुटनिरपेक्षता से थोड़ा हटने की जरूरत महसूस हुई। लेकिन हम जल्दबाजी दिखाते हुए पूरी तरह से दूसरे गुट का हिस्सा हो गए।

इस सरकार की विदेश नीति में थोड़ा हल्कापन भी है। एक धारणा है कि हम पश्चिमी गुट का हिस्सा हैं, हम इजराइली गुट का हिस्सा हैं। अमेरिका और इजराइल के पक्ष में झुकाव बढ़ा है। हमने सारे मुस्लिम देशों से अपने रिश्ते खत्म कर दिए। सउदी अरब के हम इसलिए थोड़ा खुले हुए हैं क्योंकि उसके अमेरिका और इजराइल से दोस्ताना रिश्ते हैं।

काफी हद तक वाशिंगटन हमारी विदेश नीति को संचालित कर रहा है। 2005 तक यह ठीक-ठाक चल रहा था जब अमेरिका बहुत ताकतवर था। लेकिन 2008 की आर्थिक मंदी के बाद अमेरिका के लिए भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई।

पाकिस्तान की समस्या को आप कैसे देखते हैं? आपने अपनी किताब बीइंग द अदर में इसके बारे विस्तार से लिखा है कि कैसे यह समस्या सुलझाई जा सकती थी।

अगर यह सामाजिक नीतियां जारी रहीं तो पाकिस्तान से बातचीत संभव नहीं हो पाएगी। आखिरकार, उस बिल्ली वाली हालत हो जाएगी जिसे आप जितना दबाएंगे, वह उतना आपकी तरफ अपना पंजा चलाएगी।

अंतरर्राष्ट्रीय मामलों में चीजें रातोंरात बदल जाती हैं। भारत को पाकिस्तान से अपने रिश्ते सुधारने होंगे, हाथ मिलाना होगा और कश्मीर मुद्दे पर बात करनी होगी।

पाकिस्तान हालिया सालों के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। क्या आपको उनके नेतृत्व में ऐसी क्षमता दिखती है कि वे कोई रचनात्मक संवाद कर सकें?

भारत के पास एक सेना है, पाकिस्तानी सेना के पास एक देश है। उन्हें अपनी इस स्थिति को बनाए रखना है। इसके लिए उन्हें दुश्मनों की जरूरत है। जैसे ही अफगानिस्तान के मोर्चे पर चीजें थोड़ी संभली, उनका ध्यान फिर से भारत की ओर लौट गया। वे दो मोर्चों पर लड़ाई नहीं छेड़ सकते। इस मामले में अमेरिका की दिलचस्पी थी, लेकिन वह खुद ही अपने अंदरूनी मामलों में व्यस्त है। चीन दिलचस्पी ले रही है, लेकिन हम ऐसा नहीं चाहते।

Published: 8 Aug 2017, 2:51 PM
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