कश्मीर की जमीनी हकीकत
भारत को कश्मीर में लालच से परहेज करना चाहिए, लेकिन सरकार अपने ही जाल में फंसती नजर आ रही है

भारत को किसी तरह के लोभ में नहीं आना चाहिए, लेकिन सरकार इस जाल में फंसकर खुश नजर आ रही है।
हमलोग एक बहुत बड़े प्रचार में डूब रहे हैं। उपर से आदेश प्राप्त सत्ताधारी दल के प्रवक्ता ऐसे संदेश देने का कोई मौका नहीं छोड़ते जो एक ही सांस में खतरे की घंटी भी बजाता है और आश्वासन भी देता है।
ऐसी छवि बनाई जा रही है कि सीमा-पार से जारी आतंकवाद बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ गया है और दृष्टिसंपन्न कूटनीति और नेतृत्व के जरिये इससे निपटने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। पहले से आजमाए हुए प्रचार की चाशनी में घोलकर आतंकवाद जैसे पुराने खतरे की मिलावट बड़ी-बड़ी बातों के साथ की जा रही है।
काफी समय से आतंकी हमले बहुत केन्द्रित तरीके से किए जा रहे हैं। हमारे सुरक्षाबलों पर हमले के जरिये हमारी संप्रभुता को चुनौती देकर हमें उकसाया जा रहा है। इन हमलों से देश भर में जो गुस्सा फैलता है उसे हमलावर अच्छी तरह से समझते हैं। हमलावर समझते हैं कि नागरिकों पर अत्याचार से राजनीतिक प्रतिक्रियाएं होती हैं, जबकि वर्दी में मौजूद लोगों के खिलाफ किए गए वही अपराध हथियारबंद संघर्ष की संभावना बढ़ा देते हैं, जिससे लोगों में ज्यादा डर और असुरक्षा की भावना फैलती है।
हमारे लोगों का नुकसान बहुत त्रासद और दुख देने वाला है। एक भी जीवन का व्यर्थ में नुकसान नहीं होना चाहिए। इस वजह को ध्यान में रखकर हमें जमीनी हालात से कटी हुयी ताकत के सार्वजनिक दिखावे से बचना चाहिए।
बिना किसी डर और भय के जारी उकसावे की यह हरकतें ऐसे खतरों को पहले से भांपने में सरकार की नाकामी को साबित करती हैं। यह साफ हो चुका है कि भारत के दुश्मन पुराने किस्म के टकरावों की व्यर्थता को समझते हैं। बार-बार सामने आ रहे इन तथ्यों के बावजूद कि कश्मीर में उनकी रणनीति भारतीय संप्रभुता के प्रतीकों पर हमला करने की हो गई है, उसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए ही नहीं जा रहे हैं।
इसके लिए एक महत्वपूर्ण कदम यह हो सकता है कि एक विश्वासपात्र और तेजतर्रार सीमा-पार खुफिया नेटवर्क तैयार किया जाए।
ऐसा खुफिया नेटवर्क उन समुदायों के बीच से पनप सकता है जो हिंसा में विश्वास नहीं करते और शांति चाहते हैं। यह एक बहुत मुश्किल प्रक्रिया है जहां फैसले लेने में लोगों की ज्यादा से ज्यादा सहभागिता की जरूरत है। इसके लिए आम नागरिकों की पहुंच स्वास्थ्य, शिक्षा, अच्छे रोजगार के मौकों और राजनीतिक भागीदारी में बढ़ानी होगी और उनके जीवन स्तर को सुधारना होगा।
विकास के एजेंडे को सुरक्षा और रणनीति के मुद्दे से अलग नहीं किया जा सकता। जम्मू और कश्मीर की मौजूदा सरकार जनता का विश्वास जीतने में नाकाम रही है। आर्थिक विकास और शहरीकरण को बढ़ावा देने वाले बुनियादी ढांचे और अन्य क्षेत्रों में होने वाले निर्माण का काम रूक गया है।
आसान नियमों, व्यापारिक समर्थन और सरकारी लचीलेपन के जरिये स्थानीय व्यापारियों को बढ़ावा देने का काम भी नहीं हुआ है। घाटी के लोग नई दिल्ली से मिलने वाले संकेतों के प्रति ऐतिहासिक रूप से काफी संवेदनशील रहे हैं। हालिया चुनावों में मतदान का प्रतिशत काफी गिरा है। सुरक्षाकर्मियों के अंतिम संस्कार के दौरान भी कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिससे पता चलता है कि केन्द्र सरकार के सबको साथ लेकर चलने के एजेंडे में लोगों की आस्था बहुत कम है।
जमीन स्तर पर विकास कार्यों का अभाव और उसके साथ-साथ सत्ताधारी दल की राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकताओं से लोगों की बनी दूरी ने बड़े पैमाने पर कश्मीर के लोगों को अलगाव में डाल दिया है। स्थानीय समुदायों के साथ निरंतर बातचीत के जरिये मद्दों पर सहमति बनाने के समझदारी भरे रास्ते को त्याग दिया गया है। ऐसी राजनीतिक सर्वसम्मति बनाने की कोई कोशिश नहीं की जा रही है जिससे लोगों को यह आश्वासन मिल सके कि नीतियों की निरंतरता में सरकार का भरोसा है। राजनीतिक विपक्ष को नकारते हुए एक अलगाववादी एजेंडा रखने वाली पार्टी के साथ मिलकर सरकार चलाने की तिकड़म ने यह साबित कर दिया है कि उनके मन में सिर्फ सत्ता का लालच है। जनता और सरकार के बीच विभाजन को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।
अपने लोगों और सीमाओं की रक्षा के मामले में, दोनों दलों की अंतर्विरोधी नीतियों और विकासहीनता जैसी कई चिंताजनक बातें सामने आती हैं। एक तरफ, कश्मीर देश के दूसरे हिस्सों से विकास के कई मापदंडों पर काफी पीछे है। इस फर्क के बढ़ने का खतरा भी है। निवेश और रोजगार का माहौल बुरे हाल में है। राज्य में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, फिर भी न तो आर्थिक विकास और न ही सरकारी सेवाओं में ये प्रतिभाएं शामिल होती हुई दिख रही हैं। सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो स्थानीय समुदायों का हिस्सा रहे खुफिया सूचना देने वाले लोग बिल्कुल नहीं बचे हैं। लोगों के भीतर लगातार एक डर का माहौल बनता जा रहा है कि अगर कानूनी संस्थाओं को मदद की गई तो दोनों तरफ से उनकी जान को खतरा हो सकता है।
आतंक के प्रायोजकों का एक बड़ा उद्देश्य यह है कि कानूनी संस्थाओं के प्रति हमारे रवैये को चालू और सख्त बना दिया जाए। उनका यह इरादा है कि उनकी कायराना हरकतों से हमारे लोगों का ज्यादा से ज्यादा दमन हो। वे उम्मीद करते हैं कि ऐसी घटनाओं से कानूनी संस्थाओं पर लोगों की प्रतिबद्धता में संदेह बढ़ेगा और इसके चलते उन्हें कई मुश्किलों से गुजरना होगा, जो उनके भीतर असंतोष को और बढ़ा देगा।
ज्यादातर गैर-हथियारबंद, शांतिप्रिय और कई तरह की मुश्किलें झेल रही आबादी के भीतर मौजूद इस हौसले का होना थोड़े वक्त के लिए खुद को शाबाशी देने का मौका हो सकता है, लेकिन लंबे दौर में यह लोगों के इस भरोसे को खत्म कर देगा कि सरकार समाधान दे सकती है। यह उस बहुत जरूरी और उदार स्थानीय नेतृत्व के महत्व को भी कम कर देगा जो लोकप्रिय भावनाओं को दिशा देने के साथ-साथ उन्हें सामने रखती है।
हमें किसी किस्म के लोभ में नहीं पड़ना होगा। हमें लोकतंत्र में अपनी आस्था को बनाए रखना होगा, अपने सभी नागरिकों की भलाई में विश्वास करना होगा, और किसी जबरदस्ती के आदेश से नहीं, बल्कि सहभागिता के जरिये एक नया भारत बनाना होगा। हमें स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा देना होगा। और यह काम बाहर से आए नेता रूपी प्रबंधक तो बिल्कुल नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास न तो समझ है और न संवेदना।
जब अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए हम उपलब्ध आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं, उसके साथ हमें सभी नागरिकों की समृद्धि, गरिमा और शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी गहरा करना होगा।
(लेखक पूर्व सूचना तकनीक, टेलीकॉम और कार्पोरेट अफेयर्स मंत्री और राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष हैं)
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Published: 07 Aug 2017, 4:22 PM
