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पीएम मोदी की आदर्श ग्राम योजना भी साबित हुई एक जुमला, सपने तो बहुत दिखाए गए, पर जमीन पर नहीं बदला कुछ

साल 2014 में सत्ता में आने के बाद पीएम मोदी ने बड़े-बड़े दावे करते हुए सांसद आदर्श ग्राम योजना की घोषणा की थी। उनके आह्वान पर बीजेपी सांसदों ने भी बड़े-बड़े वादे करते हुए कई गांव गोद लिए थे, लेकिन इतने साल बीत जाने के बाद भी उन गांवों की सूरत नहीं बदली है।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद आदर्श ग्राम योजना की घोषणा की थी। लोगों को लगा था कि इस योजना की सफलता से गांवों में विकास की बयार बहने लगेगी। लेकिन आज लगभग साढ़े चार साल बीत जाने के बाद इन आदर्श गांवों को किसी भी कोण से आदर्श नहीं कहा जा सकता। और तो और बीजेपी सांसदों के गोद लिए गांवों का हाल ये है कि उनमें से कई गावों में सामान्य योजनाएं तक नहीं पहुंची हैं। ऐसे ही गोद लिए गांवों की हालत से देश को रूबरू कराने के लिए नवजीवन ने एक श्रृंखला शुरू की है, जिसकी तीसरी कड़ी में आज पेश है चंडीगढ़ से बीजेपी सांसद और अभिनेत्री किरण खेर और झारखंड की राजधानी रांची से बीजेपी सांसद राम टहल चौधरी के गोद लिए गांवों की आंखों-देखी हकीकत।

चंडीगढ़ः सांसद किरण खेर ने तीन गांवों को लिया गोद, लेकिन कहीं कुछ नहीं बदला

फिल्मी पर्दे की दमदार अदाकारा किरण खेर लोकसभा सांसद के किरदार में तो बेदम नजर आईं ही, उनके गोद लिए गांवों की हालत भी काफी कुछ कह जाती है। चंडीगढ़ से सटे उनके गोद लिए तीन गांव सारंगपुर, रायपुर कलां और मक्खनमाजरा के निवासी आज भी अपने सपनों के हकीकत में बदलने का इंतजार कर रहे हैं। इन तीन में से एक गांव में 18 में से केवल 4 योजनाओं पर काम हुआ है जबकि दो गांवों में अब तक कुछ भी नहीं हुआ। इन गांवों की हालत देखकर लगता ही नहीं कि इन्हें किसी ने गोद भी ले रखा है।

पीएम मोदी के सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत किरण खेर ने सबसे पहले चंडीगढ़ से लगे गांव सारंगपुर को गोद लिया था। यहां होने वाले विकास कार्य साल 2016 तक ही पूरे हो जाने थे। पंचायत समिति सहायक ब्रह्मपाल ने बताया कि सारंगपुर के लिए 18 परियोजनाएं घोषित हुईं। इनमें से चार ड्रॉप हो गईं जबकि 14 में काम पूरा हो गया। इस सरकारी बयान के बाद असली कहानी बेपर्दा होती है। इस जमीनी सच को बयां करते हैं सारंगपुर के सरपंच साधु सिंह। वह बताते हैं कि गांव में एक स्टेडियम बना है, लेकिन इसे बनाने से पहले संबधित विभाग से कोई सलाह तक नहीं ली गई। इसका नतीजा यह हुआ कि स्डेडियम के नाम पर यह मजाक बन गया। इसकी बाउंड्री अधूरी है। गेट तक गिर चुका है। कहीं कोई चौकीदार तक तैनात नहीं किया गया। एक कम्युनिटी सेंटर बनाया गया, जिसमें न पंखे लगे और न ही पूरी लाइटें।

अब बात रायुपरकलां और मक्खन माजरा की। इन दो गांवों में काम साल 2019 तक पूरे होने हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव में मुश्किल से चार-पांच महीने बचे हैं और अब तक कुछ भी नहीं हुआ। ब्रह्मपाल ने बताया कि यहां के लिए भी 18 योजनाएं स्वीकृत हुई थीं। इसमें ड्रेनेज सिस्टम, पेयजल सप्लाई लाइन, पार्क, खेल का मैदान, श्मशान घाट, पशु अस्पताल, डिस्पेंसरी, स्कूल और एलईडी लाइट लगाने जैसे काम होने थे। इन दो गावों में विकास कार्यों का सच चंडीगढ़ पंचायत समिति के चेयरमैन नानक सिंह ने बयां कर दिया। उन्होंने बताया कि अब तक सिर्फ एक ही योजना पर काम हो रहा है। वह है स्कूल की इमारत का निर्माण। वह भी नींव डालकर छोड़ दिया गया है।

झारखंडः रांची के जिस गांव को सांसद ने गोद लिया, वहां खंभे हैं तो बिजली नहीं, नलके हैं तो पानी नहीं

झारखंड की राजधानी रांची के बीजेपी सांसद रामटहल चौधरी ने अपने लोकसभा क्षेत्र के जिस हहाप गांव को गोद लिया है, वहां वे पिछले एक साल से गए तक हैं। नामकुम प्रखंड के इस गांव की रांची शहर से दूरी महज 24 किलोमीटर है। अगर बहुत ज्यादा ट्रैफिक रहे, तब भी रांची से यहां पहुंचने में सिर्फ 44 मिनट लगते हैं। लेकिन, इस 44 मिनट की दूरी 365 दिनों में भी तय नहीं की जा सकी है। वहीं गांव में चार साल पहले बना स्वास्थ्य केंद्र आज भी उद्घाटन की बाट जोह रहा है। जबकि सांसद के वादे के बाद भी गांव में अब तक हाईस्कूल नहीं खुला है और प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई भी दो शिक्षकों के ही भरोसे है।

सांसद राम टहल चौधरी ने सासंद आदर्श ग्राम योजना के तहत फरवरी 2015 में हहाप को गोद लिया था। तब दावा किया गया था कि यह गांव आदर्श बनेगा लेकिन आज यहां कुछ भी वैसा नहीं है, जिससे इस गांव को आदर्श कहा जा सके। करीब 2000 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 432 घर हैं। आपको जानकर हैरत होगी कि इनमें से ऊपरी टोले के सिर्फ 32 घरों में पाइपलाइन से पानी आपूर्ति के लिए नल लगाए गए हैं। लेकिन, इस नल से हर रोज पानी नहीं आता। जिन घरों में पानी के नल लगे हैं, उन्हें भी हैंडपप से पानी लेना पड़ता है। इन 32 घरों के अलावा बाकी के 400 घरों के लोग हैंडपंप और कुएं का पानी ही पीते हैं। यूं तो गांव में करीब 20 हैंडपंप लगाए गए हैं लेकिन इनमें से आधा दर्जन ही काम कर रहे हैं।

आदिवासी बहुल इस गांव में सिर्फ एक स्कूल है। दो कमरों के इस स्कूल में वैसे तो आठवीं कक्षा तक पढ़ाई होती है, लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिए सिर्फ दो शिक्षक हैं। यहां पढ़ने वाले करीब 100 बच्चे इन्हीं शिक्षकों के भरोसे हैं। गांव के दिनेश प्रमाणिक ने बताया कि इनमें से भी एक शिक्षक दफ्तर के काम से रांची जाते रहते हैं। ऐसे में एक शिक्षक आठ कक्षाओं के 100 बच्चों को कैसे पढ़ा पाएगा, यह आसानी से सोचा जा सकता है। ऊंची कक्षाओं में पढ़ाई के लिए बच्चों को या तो रांची जाना होता है या फिर वे बगल के गांव के हाईस्कूल में जाते हैं। सासंद रामटहल चौधरी ने यहां एक हाई स्कूल खुलवाने का वादा किया था, जो अब तक वादा ही है। विभागीय अधिकारी कहते हैं कि ऐसा कोई प्रस्ताव उनके पास नहीं आया है। जाहिर है, यह वादा अभी तक हवा-हवाई ही है।

वैसे तो गांव का विद्युतीकरण बहुत पहले हो चुका है लेकिन बिजली आपूर्ति के मामले में यहां की तस्वीर काफी बुरी है। लगातार होने वाली कटौती के कारण लोग आज भी लालटेन युग में रह रहे हैं। गांव की राशन दुकानों से होने वाली केरोसिन तेल की बिक्री इसकी चुगली करती है। गांव के लोगों ने बताया कि कभी-कभी तो 18-18 घंटे तक बिजली नहीं आती है।

अ स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर अभी यहां कुछ नहीं है। यहां चार साल पहले बनी स्वास्थ्य केंद्र की बिल्डिंग अपने उद्घाटन की बाट जोह रही है। नतीजतन, लोगों को मामूली सी बीमारी में भी नामकुम या रांची जाना होता है या फिर नीम-हकीम उनका इलाज करते हैं।

हहाप की मुखिया और कांग्रेस नेता अर्चना देवी मुंडा ने बताया कि विकास के नाम पर सिर्फ पुरानी सड़क की मरम्मत हुई है और कुछ नई सड़कें बनी हैं। लेकिन, रांची से यहां आने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अभाव है। इसके अलावा सांसद ने वैसा कुछ भी नहीं किया, जिसका उन्होंने वादा किया था। अव्वल तो यह कि गोद लेने के बाद वह सिर्फ 2-3 बार यहां आए। उनकी उपेक्षा के कारण कोई अधिकारी यहां नहीं आता। इसलिए, गांव सिर्फ होर्डिंग्स और बोर्ड में ही आदर्श दिखता है। न तो यहां के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है और न किसानों के लिए सिंचाई की सुविधा की कोई व्यवस्था की गई है।

बकौल अर्चना, हहाप में शौचालयों का निर्माण पंचायत की निधि से कराया गया है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनने वाले पक्के मकान कई लोगों के लिए अब भी सपना हैं और पेंशन भुगतान और दूसरी सुविधाएं भी अपने हिसाब से ही यहां पहुंचती हैं। दरअसल, यह किसी नजरिए से आदर्श ग्राम नहीं है।

यहां कानून-व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। कुछ ही दिनों पहले गांव में हुई लिंचिंग में भीड़ ने एक युवक को चोर बताकर पीट-पीट कर मार डाला था। कुछ जगहों से अफीम की खेती करने की भी खबरें मिली थीं। इसके बाद पुलिस ने वहां जाकर अफीम की खेती नष्ट भी की थी। ग्रामीणों की मांग है कि अगर यहां एक पुलिस पोस्ट बन जाए तो लोग निश्चिंत होकर रह सकेंगे।

(चंडीगढ़ से धीरेंद्र अवस्थी और रांची से रवि प्रकाश की रिपोर्ट)

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