
कांग्रेस ने बुधवार को आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा पूरे देश में ई20 ईंधन को जल्दबाजी में लागू किया जा रहा है और इसके जल संसाधनों तथा खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों की अनदेखी की जा रही है।
पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि ई20 ईंधन के पर्यावरणीय प्रभाव का समग्र आकलन तभी संभव है, जब इसके जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखा जाए।
उन्होंने दावा किया, ‘‘जहां अन्य देशों में बड़े पैमाने पर कृषि अवशेषों और अन्य जैविक अपशिष्ट से एथनॉल का उत्पादन किया जाता है, वहीं भारत में इसका उत्पादन मुख्य रूप से गन्ना, धान और मक्का पर आधारित है, जो अधिक पानी की खपत वाली फसलें हैं।’’
रमेश के अनुसार, गन्ना और धान मिलकर देश के कुल सिंचाई जल का लगभग 70 प्रतिशत उपयोग करते हैं।
उन्होंने कहा कि गन्ने से एक लीटर एथनॉल के उत्पादन में लगभग 3,630 लीटर, चावल से एक लीटर एथेनॉल के उत्पादन में 10,790 लीटर तक और मक्के से एक लीटर एथनॉल के उत्पादन में लगभग 4,670 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि ये आंकड़े ऐसे समय में अधिक चिंता पैदा करते हैं, जब देश के बड़े हिस्से में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है।
कांग्रेस नेता का कहना है कि नीति आयोग के वर्ष 2021 के एथनॉल संबंधी मार्गदर्शी दस्तावेज में अधिक टिकाऊ कच्चे माल की ओर बढ़ने की आवश्यकता स्वीकार की गई थी।
रमेश ने आरोप लगाया कि इसके बावजूद केंद्र सरकार एथनॉल उत्पादन के लिए चावल के उपयोग को प्रोत्साहन दे रही है।
उन्होंने दावा किया कि सरकार ने हाल ही में संसद में स्वीकार किया है कि एथनॉल बनाने वाली इकाइयों को औसत खरीद मूल्य से लगभग 40 प्रतिशत कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराया जा रहा है।
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि वास्तव में पर्यावरण हितैषी ईंधन नीति वही होगी, जो जिस ईंधन को बढ़ावा देती है, उसके समग्र पर्यावरणीय प्रभाव का भी आकलन करे।
उन्होंने आरोप लगाया कि ई-20 को बढ़ावा देने के पीछे की प्रेरणा पर्यावरण संरक्षण नहीं है।
पीटीआई के इनपुट के साथ
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