
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने शुक्रवार को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर कहा कि ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी रिपोर्ट, अध्ययनों और योजनाओं को छिपाने के लिए इतनी असाधारण स्तर की अपारदर्शिता क्यों अपनाई जा रही है।
पूर्व पर्यावरण मंत्री ने यह आरोप भी लगाया कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन तथा इसके गंभीर पारिस्थितिकीय दुष्परिणामों को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब नहीं मिला और सरकार का रवैया टालमटोल वाला रहा है।
ग्रेट निकोबार परियोजना के संदर्भ में रमेश और यादव के बीच पिछले कुछ महीनों में कई बार पत्राचार हो चुका है।
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पत्र में रमेश ने कहा, ‘‘3 जून, 2026 के मेरे पत्र के उत्तर में 13 जून, 2026 को भेजे गए आपके उत्तर के लिए धन्यवाद। किंतु खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आपका उत्तर अत्यंत निराशाजनक और असंतोषजनक है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ मुझे एक बार फिर कहना पड़ रहा है कि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के विभिन्न पहलुओं से संबंधित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन स्पष्ट रूप से अपर्याप्त हैं तथा स्वयं पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। मैंने अपने पूर्ववर्ती पत्रों में इन कमियों का विस्तार से उल्लेख किया है, जिनका आपके पास वस्तुतः कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है।’’
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उन्होंने कहा, ‘‘आपका कहना है कि पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों के अंतर्गत सतत निगरानी का प्रावधान है। इस संदर्भ में मैं आपके विचारार्थ कुछ बिंदु प्रस्तुत करना चाहता हूं।’’
रमेश के अनुसार, प्रत्येक छह माह में अनुपालना रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए, लेकिन मार्च 2024 के बाद ऐसी कोई भी अनुपालन रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है तथा परियोजना निगरानी समिति की बैठकों के विवरण भी बैठक होने के कई महीनों बाद अपलोड किए जा रहे हैं।
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रमेश ने कहा, "मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि जिन सभी रिपोर्ट, अध्ययनों और योजनाओं को सार्वजनिक किए जाने की मैं मांग कर रहा हूं, उनकी तथाकथित सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति में कोई बाधा नहीं है, जिन्हें अब ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना का प्रमुख औचित्य बताया जा रहा है। इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन तथा इसके गंभीर पारिस्थितिकीय दुष्परिणामों को लेकर उठाए गए गंभीर और वैध प्रश्न अब भी अनुत्तरित एवं अनसुलझे हैं। आपके खेदजनक रूप से टालमटोल वाले उत्तर इन चिंताओं का समाधान नहीं करते।’’
उन्होंने यह भी कहा, ‘‘मैं यह समझ पाने में पूर्णतः असमर्थ हूं कि रिपोर्टों, अध्ययनों और योजनाओं को छिपाने के लिए इतनी असाधारण स्तर की अपारदर्शिता क्यों अपनाई जा रही है।’’
पीटीआई के इनपुट के साथ
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