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एक जनरल की ‘अप्रकाशित’ किताब बनी फांस और 'जो उचित समझो, वह करो...' की संसद में गूंज

जनरल नरवणे के ‘अप्रकाशित’ संस्मरण से भारत सरकार अचानक इतना भयभीत क्यों हो गई है?

संसद के बाहर जनरल नरवणे की किताब दिखाते लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी
संसद के बाहर जनरल नरवणे की किताब दिखाते लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 

राहुल गांधी ने 2 फरवरी को लोकसभा में बोलना शुरू ही किया था कि बमुश्किल दो मिनट बाद ही, परेशान दिखते राजनाथ सिंह अपनी सीट से खड़े हो गए। विपक्ष के नेता ने जब तक पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे के संस्मरणों पर आधारित एक लेख की कुछ लाइनें पढ़ना शुरू नहीं किया था, सदन शांत था।  

“जब चार चीनी टैंक भारतीय इलाके में घुसे, तो जनरल लिखते हैं..." राहुल गांधी बस इतना ही कह पाए थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठे रक्षा मंत्री अपनी जगह पर  खड़े हो गए और उन्हें बीच में ही रोक दिया। कहा - 'ऐसी कोई किताब है ही नहीं! स्पीकर को बगैर सबूत वाली बातें पढ़ने की इजाजत नहीं देनी चाहिए!' 

अगले 10 मिनट के दौरान राजनाथ कम-से-कम चार बार खड़े हुए और उन्होंने वही बात दोहराई: 'एलओपी जिस किताब का जिक्र कर रहे हैं, वह कभी प्रकाशित ही नहीं हुई... मेरा सिर्फ एक सवाल है: वह जिस किताब से कोट कर रहे हैं, वह कहां है...? अगर उनके पास किताब है, तो उसकी एक प्रति हाउस में रखें... यह किताब कभी प्रकाशित ही नहीं हुई... वह किताब की एक कॉपी प्रस्तुत करें… ।'

(राहुल गांधी ने इस बात पर गौर किया और 4 फरवरी को अपने साथ किताब की एक प्रति लेकर आए। कैमरे के सामने दिखाते हुए उन्होंने कहा: “भारत के हर युवा को यह देखना चाहिए कि यह किताब मौजूद है।”)

कांग्रेस सांसद के. सी. वेणुगोपाल ने संसद में जब स्पीकर का ध्यान इस ओर दिलाया कि एलओपी फरवरी 2026 में ‘कारवां’ पत्रिका में प्रकाशित सुशांत सिंह का लिखा लेख ‘नरावनेज मोमेंट ऑफ ट्रुथ’ पढ़ रहे थे, तो अमित शाह ने जवाब दिया: “मैगजीन कुछ भी छाप सकती हैं… अगर किताब छपी ही नहीं है, तो उसे कैसे कोट किया जा सकता है?” राहुल गांधी के  जोर देकर कहने पर कि कंटेंट “सौ प्रतिशत सही” है, ओम बिरला ने उनकी बात खारिज कर दी… रक्षा मंत्री ने बोल दिया, और बात खत्म। वह किताब मौजूद ही नहीं थी।

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(बाएं) यह पेंग्वुईन की बेवसाइट का स्क्रीनशॉट है जिस पर जनरल नरवणे की किताब बाकायदा नजर आ रही थी और (दाएं) फ्लिपकार्ट पर भी यह किताब लिस्टेड थी

लेकिन पता चला कि ऐसा ही हुआ। जनरल नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस ने साफ तौर पर लिस्ट किया था, जिसमें प्रकाशन की तारीख: 30 अप्रैल 2024, प्रिंट लेंथ: 448 पेज, वजन: 650 ग्राम, ISBN नंबर: 10-0670099759 और 13-978-0670099 दर्ज है। इसे अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे ऑनलाइन रिटेलर्स ने भी लिस्ट किया था।  

हालांकि, ऑनलाइन दिख रहे ये निशान 48 घंटे से भी कम समय में हटा दिए गए। हाथ में भौतिक सबूत मौजूद होने पर राहुल गांधी ने सरकार को चुनौती दी: “अगर प्रधानमंत्री सदन में आते हैं, मुझे शक है कि वे आएंगे- तो मैं उन्हें यह किताब देना चाहूंगा… गृह मंत्री ने कहा था कि… किताब मौजूद नहीं है; रक्षा मंत्री और सरकार ने कहा कि किताब कभी पब्लिश नहीं हुई, लेकिन यह रही किताब…”

जो लेख उद्धृत करने से राहुल गांधी को रोका गया था, वह एक ऐसे अंश से शुरू होता है जिसे प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने दिसंबर 2023 में जारी किया था और जिसे ‘द प्रिंट’ ने 18 दिसंबर 2023 को छापा था। इसका ब्योरा पिछले दो सालों से सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है। फिर भी सरकार ने संसद में इसे दबाने की पूरी कोशिश की।

राहुल गांधी ने पूछा- “इसमें ऐसा क्या लिखा है जिससे वे इतना डर ​​रहे हैं? अगर वे डरे हुए नहीं हैं, तो उन्हें मुझे इसे पढ़ने देना चाहिए। वे इतना क्यों डर रहे हैं?" 

आखिर, क्यों?

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जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (रिटायर्ड) दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक सैन्य प्रमुख थे। यह वही समय था जब लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी; जिसमें 20 भारतीय सैनिक आमने-सामने की लड़ाई में मारे गए थे। यह वह समय भी था जब जनरल बिपिन रावत भारत के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) नियुक्त हुए, और तीनों सशस्त्र  सेनाओं की देखरेख जिनके जिम्मे थी। यह एक महत्वपूर्ण दौर था, जिसमें पूर्वी लद्दाख में चीनी घुसपैठ हुई और कुछ इलाका हाथ से निकल गया, जिसे भारत ने स्वीकार भी किया है। इसी दौरान विवादास्पद अग्निपथ योजना भी शुरू की गई, जिसके बारे में नरवणे लिखते हैं कि अचानक आई इस योजना का सेना ने विरोध किया था। 

येल यूनिवर्सिटी में लेक्चरर और ‘कारवां’ के कंसल्टिंग एडिटर सुशांत सिंह खुद भी एक्स आर्मी मैन हैं। उन्होंने अपना लेख नरवणे की किताब की टाइप की हुई पांडुलिपि पर आधारित किया है। वह लिखते हैं: ‘यही वजह है कि नरवणे के संस्मरण पर यह लेख मायने रखता है... यह चीनी आक्रामकता, उन फैसलों पर रोशनी डालता है जिनके कारण भारतीय लोगों की जान गई और इलाका खोना पड़ा, और ऐसे समय में राजनीतिक जवाबदेही की परेशान करने वाली कमी को दिखाता है जब देश युद्ध के कगार पर था।’

सुशांत सिंह ने 31 अगस्त 2020 को रात 8.15 बजे आर्मी चीफ को फोन आने के बाद जो कुछ हुआ, उसके जिक्र से अपनी बात शुरू की- गलवान में हुई हाथापाई को ग्यारह हफ्ते हो चुके थे। भारतीय और चीनी कमांडर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर डिसएंगेजमेंट बातचीत में लगे हुए थे। नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (एनएसए) अजीत कुमार डोभाल की अध्यक्षता वाले अनौपचारिक चाइना स्टडी ग्रुप की कई दौर की बैठकें हो चुकी थीं।

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नरवणे लिखते हैं कि इस बात पर सहमति थी कि भारत को कुछ करना होगा। हालांकि, उन्हें निर्देश था कि जब तक ‘ऊपर से’ मंज़ूरी न मिले, चीनी सैनिकों पर गोली न चलाएं। सेना ने इसका विरोध किया। गलवान की घटनाओं को देखते हुए, उकसाए जाने पर सेना को कार्रवाई करने की आजादी चाहिए थी। आखिरकार यह तय हुआ कि ‘अंतिम उपाय के तौर पर, अगर हमारी अपनी शारीरिक सुरक्षा खतरे में है, तो वह टुकड़ी और सिर्फ वही टुकड़ी आत्मरक्षा में गोली चला सकती है’।  

31 अगस्त को आया फोन नॉर्दर्न कमांड के हेड लेफ्टिनेंट जनरल वाई.के. जोशी का था। कैलाश रेंज पर राचिन ला में भारत के कब्जे वाली जगह की ओर चार चीनी टैंक आगे बढ़ रहे थे। भारतीय सैनिकों द्वारा चलाई गई चेतावनी फ्लेयर्स को नजरअंदाज किया जा रहा था। भारत के पास ऊंचाई, तोपखाने और भारी टैंकों का फायदा था। जनरल जोशी आगे बढ़ रहे चीनी सैनिकों को रोकने के लिए गोली चलाने की इजाजत चाहते थे। नरवणे ने सीडीएस जनरल रावत, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, एनएसए अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर को फोन करके पूछा: “मेरे लिए क्या आदेश हैं?”

पीटीआई द्वारा जारी किए गए अंशों और ‘कारवां’ के लेख में दिए गए अपने बयान में, जनरल नरवणे लिखते हैं कि उन्हें रात 10.30 बजे तक इंतजार करवाया गया। तभी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आखिरकार फोन करके प्रधानमंत्री मोदी का निर्देश उन्हें दिया: “जो उचित समझो, वह करो”।

नरवणे लिखते हैं, ‘मुझे एक मुश्किल काम सौंपा गया था। इस पूरी आजादी के साथ, अब सारी जिम्मेदारी मुझ पर थी।’ उन्होंने जोशी से कहा कि भारत को पहली गोली नहीं चलानी चाहिए, और उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा कि भारतीय भारी टैंकों को रिज के किनारे पर इस तरह तैनात किया जाए कि उनकी नोजल नीचे चीनी टैंकों की तरफ रहें।

अब अगर इतने अहम समय में भी प्रधानमंत्री रक्षा मंत्री, एनएसए, सीडीएस और विदेश मंत्रालय के लिए दो घंटे से ज्यादा समय तक वाकई उपलब्ध नहीं थे, तो सरकार को बहुत कुछ समझाना होगा। प्रधानमंत्री तक कम्युनिकेशन चैनल 24 घंटे खुले रहते हैं और सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता। तो फिर 31 अगस्त 2020 की शाम को क्या हुआ था? क्या हम कभी जान सकेंगे?

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3 फरवरी को लोकसभा में राजनाथ सिंह के इस बयान के बाद कि नवरणे की किताब को ‘तथ्यात्मक त्रुटियों’ के चलते मंजूरी नहीं दी गई थी, रहस्य और गहरा गया है। क्या किताब बिना मंजूरी के मुद्रित और प्रकाशित हो सकती थी? क्या इसे अमेजन पर प्री-ऑर्डर के लिए लिस्ट किया जा सकता था (जिन्हें बाद में रद्द कर दिया गया)? क्या प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने इसका कोई अंश जारी किया था? सबसे बढ़कर यह कि अगर किताब कभी प्रकाशित ही नहीं हुई, तो उसकी भौतिक प्रति कहां से आई और कैसे मिली?  

ऐसा लगता है कि पूर्व सेना प्रमुख को खुद भी सरकार के क्लीयरेंस रोकने के फैसले के बारे में नहीं पता था; शायद यह फैसला उन्हें कभी बताया ही नहीं गया? अक्तूबर 2025 में आज तक और कसौली में खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्टिवल में उनसे साफ तौर पर पूछा गया कि किताब अभी तक रिलीज क्यों नहीं हुई है। नरवणे ने कहा, “मेरा काम किताब लिखना और प्रकाशकों को देना था। प्रकाशकों को रक्षा मंत्रालय से इजाजत लेनी थी। उन्होंने (किताब) उन्हें दे दी है। यह रिव्यू में है। …एक साल से ज्यादा हो चुका है।”  

जनरल नरवणे ने यह भी बताया कि जांच प्रक्रिया में रक्षा मंत्रालय के अलावा और भी लोग शामिल हो सकते हैं, ताकि किसी भी गड़बड़ी की आशंका न्यूनतम रहे। उन्होंने कहा कि हालांकि उन्होंने लिखा तो सैन्य अभियानों के बारे में था, लेकिन उसमें लिखी बातें विदेश मंत्रालय, रक्षा उत्पादन वगैरह को भी प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए जांच प्रक्रिया लंबी हो सकती है। हालांकि यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि मंजूरी देने से कब इनकार किया गया, लेकिन नरवणे को साफ तौर पर इसकी जानकारी नहीं दी गई है।

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सेवारत और रिटायर्ड दोनों तरह के सैन्य अधिकारियों को अपनी लिखी किसी भी किताब के लिए क्लीयरेंस लेना जरूरी होता है। ऑपरेशनल मामलों से जुड़ी किताबों की तीन स्तरों पर जांच होती है (आर्मी हेडक्वार्टर, रक्षा मंत्रालय और कैबिनेट सचिवालय)।

‘इंडिया टुडे’ को दिए एक इंटरव्यू में, लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ‘टाइनी’ ढिल्लों (रिटायर्ड), जिनकी किताब ‘ऑपरेशन सिंदूर: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज डीप स्ट्राइक्स इनसाइड पाकिस्तान’ सितंबर 2025 में पेंगुइन रैंडम हाउस से ऑपरेशन के ठीक तीन महीने बाद आई थी, ने तीन संभावित स्थितियों की चर्चा की है।

एक, अगर कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिलता है, तो किताब को मंजूरी मिल जाती है। दो, आपत्तियां उठने पर  लेखक को अपना नजरिया समझाने के लिए बुलाया जाता है और संपादन के बाद मंजूरी दी जाती है।

तीन, अगर किताब में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले ऑपरेशनल सीक्रेट्स हैं, तो मंजूरी नहीं मिलती है।

अपनी किताब के मामले में, ढिल्लों आर्मी हेडक्वार्टर में अधिकारियों से 30-40 बार मिले, कुछ वाक्य हटाए, कुछ नए  जोड़े, और किताब रिकॉर्ड समय में क्लियर हो गई। तब से यह उपलब्ध है।

जनरल नरवणे इतने भाग्यशाली नहीं रहे, हालांकि दोनों के प्रकाशक  एक ही हैं। लेफ्टिनेंट जनरल ढिल्लों का यह दावा कि प्रकाशक ने मंजूरी के लिए मैन्युस्क्रिप्ट जमा नहीं की होगी, सच नहीं लगता। नरवणे ने साफ तौर पर कहा है कि किताब जमा कर दी गई थी और उसकी जांच जारी थी।

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हालांकि सरकार के निर्देश “जो उचित समझो, वह करो” को लंबा फेंकने वालों ने सेना को खुली छूट देने के तौर पर समझा है, लेकिन वास्तव में इसका मतलब राजनीतिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है। सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सबसे बड़ी नीति बनाने वाली संस्था, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक बुलाने और सेना को साफ निर्देश देने में नाकाम रही। फैसले को नरवणे पर छोड़कर और उसे अपनाने से इनकार करके, राजनीतिक आकाओं ने बाद में इनकार करने या बच निकलने का रास्ता बना लिया।

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