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भारत डोगरा का लेख: सिर्फ घोषणाओं से हथकरघा उद्योग के नहीं लौटेंगे गौरवशाली दिन, बुनकरों के लिए उठाने होंगे कड़े कदम

मशीनीकरण के दौर में हथकरघों के हुनर का एक आधार यह है कि कई विशेष तरह के डिजाईन और विशेष तरह के वस्त्र हैंडलूम पर ही अच्छे बनते हैं। पर हाल के समय में कंप्यूटर से डिजाइन की नकल कर उनकी इस विशिष्टता पर चोट पहुंचाई जा रही है।

बुनकरों के हुनर और विशिष्ट पहचान की रक्षा हो।
बुनकरों के हुनर और विशिष्ट पहचान की रक्षा हो। फोटो: सोशल मीडिया

कुछ वर्ष पहले तक भारत में हथकरघे का कार्य कृषि के बाद रोजगार का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हुआ करता था, पर अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण यह बहुत महत्वपूर्ण हुनर और उससे जुड़ा रोजगार हाल के वर्षों में सिमटता जा रहा है। हथकरघे के हुनर के मशहूर केन्द्रों से लगातार ऐसे समाचार मिल रहे हैं कि यह हुनर संकट में है और जुलाहों को अपना परंपरागत हुनर छोड़कर मजदूरी करनी पड़ रही है।

इसके बावजूद यह जोर देकर कहना चाहिए कि यह ऐसा महत्वपूर्ण हुनर है जिसकी विशेष मांग आज भी देश में व देश के बाहर होती है। जो लोग हाथ से हुए काम का मूल्य जानते हैं वे तो विशेष तौर पर हैंडलूम (हथकरघे) के कपड़े की ही मांग करते हैं पर कई बार उन्हें हैंडलूम के नाम पर मशीन का बना कपड़ा देकर हैंडलूम के जुलाहे को उसके न्यायोचित बाजार से वंचित कर दिया जाता है।

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इस संकट के समाधान के लिए यह समझना जरूरी है कि जहां कुछ कार्यों का मशीनीकरण जरूरी और उपयोगी होता है, पर लाभ-हानि का संतुलित मूल्यांकन किए बिना अंधाधुंध मशीनीकरण को अपनाना उचित नहीं है। यह हैंडलूम के सन्दर्भ में बहुत स्पष्ट नजर आता है कि इसे अंधाधुंध मशीनीकरण से बचाना क्यों जरूरी है। एक ओर तो यह आजीविका का बहुत महत्वपूर्ण स्रोत है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कपड़ों की अनेक विशेष किस्में और डिजाइन हैं जो हैंडलूम पर ही सबसे अच्छे बनते हैं। आज जब ऊर्जा संरक्षण को इतना जरूरी माना जा रहा है, तो हाथ से चलने वाले करघे का महत्व और बढ़ जाता है। ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रित करने के लिए जरूरी है और इस दृष्टि से भी वस्त्र उत्पादन में हैंडलूम और खादी को आगे बढ़ाना बहुत उपयोगी है।

भारतीय सरकार ने बहुत पहले हथकरघे के महत्व को समझते हुए मशीनीकृत कपड़े (पावरलूम व मिल) की अनुचित प्रतिस्पर्धा से हैंडलूम की रक्षा की नीति घोषित की थी, पर कई कारणों से इसको ठीक से लागू नहीं किया जा सका। एल.सी. जैन ने एक चर्चित अध्ययन में बताया कि एक पावरलूम से छः हैंडलूम विस्थापित होते हैं, व एक हैंडलूम में चार व्यक्तियों को पूर्णकालीन या अंशकालीन रोजगार मिलता है।

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हैंडलूम से जुड़े कई अन्य हुनर हैं व उनपर भी अंधाधुंध मशीनीकरण का प्रतिकूल असर पड़ा है। हाथ की छपाई या कपड़ों की हैंडप्रिंटिंग के हुनर और आजीविका को बचाना भी सरकार ने जरूरी माना और इसलिए इस कार्य के लिए मशीनों के उपयोग की सीमा तय की। पर एल.सी. जैन के एक अन्य अध्ययन से पता चला कि इस सीमा के अतिक्रमण के कारण ऐसे हजारों रोजगार छिन गए जो बचाए जा सकते थे।

हाल के समय में जरदोजी और चिकन के हुनर पर भी अंधाधुंध मशीनीकरण से बुरा असर पड़ा है। वाराणसी में कई हुनरमंदों से बातचीत करने पर पता चला कि चीन से ऐसी मशीनें आयातित की गई हैं, जिनसे जरदोजी हुनरमंदों का रोजगार कम हो गया है। कई बुनकरों ने भी कहा कि कंप्यूटर में उनके डिजाईन की नकल करने के तौर-तरीकों से उनकी रोजी-रोटी छिन रही है।

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लखनऊ के चिकन के मशहूर कार्य के हुनरमंदों ने भी चीन की मशीनों के कारण अपने रोजगार पर प्रतिकूल असर बताया। लखनऊ से लगे सीतापुर जिले के कुछ गांवों में यह लेखक गया और वहां जरदोजी व चिकन का काम करने वाले हुनरमंदों से मिला। उन सबने यह शिकायत की कि हाल के समय में रोजगार में कमी आई है।

यह स्थिति असहनीय है, विशेषकर जब सरकार स्वयं हैंडलूम और उससे जुड़े अनेक दस्तकारियों व हुनरों को बचाने की जरूरत को मान्यता दे चुकी है। अब जरूरत इस बात की है कि जो सैद्धान्तिक स्तर पर स्वीकार हो चुका है उसे जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए सक्रियता बढ़ाई जाए। जहां बुनकर और मिले-जुले हुनरमंद सक्रिय हैं, वहां उनके संगठनों का सहयोग इस कार्य के लिए मिल सकता है।

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सबसे पहली जरूरत तो यह है कि बुनकरों के लिए धागे और अन्य कच्चे माल की समुचित व्यवस्था हो। जहां तक सूती कपड़ों के लिए जरूरी धागे का सवाल है तो सरकार ने सूत के धागे का उत्पादन करने वाली मिलों की यह जिम्मेदारी दी है कि वह हैंक के रूप में पर्याप्त धागा हथकरघा बुनकरो को उपलब्ध करवाएं। पर मिलों के लिए इसके लिए मिलने वाली सबसिडी का लाभ उठाते हुए यह अधिक लाभप्रद रहता है कि इसे कोन रूप में बदल कर पावरलूम को या बिजलीकृत मशीन से उत्पादित कपड़े को अधिक धागा उपलब्ध करवाएं। इस तरह हथकरघा जुलाहों के लिए प्रायः धागे की कमी रहती है या धागा उन्हें महंगा मिलता है। इस कारण बाजार की प्रतिस्पर्धा में टिक पाना भी उनके लिए कठिन हो जाता है।

इसी तरह सरकार की जो अन्य नीतियां और कानून हथकरघा बुनकरों की भलाई के लिए बनाए गए थे, उनका क्रियान्वयन भी ठीक से नहीं हुआ। हथकरघा बुनकरों की विशिष्ट क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए कई तरह के उत्पादों का आरक्षण उनके लिए किया गया था, पर बाद में इन उत्पादों की संख्या कम कर दी गई। जिन उत्पादों का आरक्षण अभी तक हैंडलूम क्षेत्र के लिए चल रहा है, उसका पालन भी व्यवहारिक स्तर पर प्रायः नहीं होता है व इस कानूनी व्यवस्था को लागू करने के लिए सख्ती नहीं अपनाई जाती है।

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मशीनीकरण के दौर में हथकरघों के हुनर का एक आधार यह है कि कई विशेष तरह के डिजाईन और विशेष तरह के वस्त्र हैंडलूम पर ही अच्छे बनते हैं। पर हाल के समय में कंप्यूटर से डिजाइन की नकल कर उनकी इस विशिष्टता पर चोट पहुंचाई जा रही है।

हथकरघा बुनकरों के कार्य की संरचना अनेक स्थानों पर इस तरह की है कि जो कुटीर स्तर पर, बहुत छोटे स्तर पर कार्य करने वाला मेहनतकश बुनकर है या मजदूर बुनकर है उसे प्रायः न्याय नहीं मिलता है जबकि जिनका बड़े स्तर का कार्य है व जो व्यापार नियंत्रित करते हैं, अधिकांश लाभ उनको मिलता है। बाजार में निर्यात में जब तेजी आती है तो इसका लाभ भी चंद लोगों तक सिमट जाता है। सरकारी योजनाओं का लाभ भी तरह-तरह की जोड़-तोड़ कर यही व्यक्ति हथिया लेते हैं।

सरकार की अनेक लाभकारी योजनाएं बस इन व्यापारियों और निर्यातकों तक ही सिमट कर रह जाती हैं। अतः हथकरघा क्षेत्र की आंतरिक संरचना में भी ऐसे सुधार आने चाहिए जिससे कि मजदूर बुनकरों और छोटे स्तर के बुनकरों का शोषण न हो और न्याय मिले। सरकार को इसका मूल्यांकन करवाना चाहिए कि वत्र्तमान सहकारी समितियों के अन्तर्गत या अन्य तरह से जो विभिन्न तरह के सरकारी योजनाओं के लाभ मिल रहे हैं, वे जरूरतमंद बुनकरों तक पंहुच रहे हैं या नहीं। इस तरह की समझ बनाने के बाद ही सरकारी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन में वे जरूरी सुधार हो सकेंगे जिनके आधार पर वास्तव में जरूरतमंद बुनकरों तक समुचित लाभ पहुंच सकेगा।

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