
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 24 अप्रैल से लंबित महाभियोग नोटिस पर चर्चा तेज।
73 विपक्षी सांसदों ने नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर 9 गंभीर आरोप लगाए थे।
SIR को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियां सामने आने के बाद ज्ञानेश कुमार पर कार्रवाई की मांग।
कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बीच उनके खिलाफ लंबित महाभियोग नोटिस पर चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दलों के 73 राज्यसभा सदस्यों ने 24 अप्रैल को राज्यसभा के सभापति को ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का नोटिस सौंपा था। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा है कि यह नोटिस 24 अप्रैल से लंबित है और इसे खारिज नहीं किया गया है। ताजा रिपोर्टों में भी 24 अप्रैल के नोटिस और उसके लंबित होने का जिक्र किया गया है।
नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नौ गंभीर आरोप लगाए गए थे। इनमें पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाने, चुनाव आचार संहिता के क्रियान्वयन में अनियमितता और दस्तावेजी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने जैसे आरोप शामिल हैं। ये आरोप विपक्षी सांसदों की ओर से लगाए गए हैं और इन्हीं के आधार पर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की मांग की जा रही है।
SIR को लेकर दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर संधू और विवेक जोशी की ओर से पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की खबर के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि आयोग के भीतर इन आपत्तियों पर किस तरह विचार हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR और उससे जुड़े फैसलों को लेकर अलग-अलग मौकों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि 24 अप्रैल से महाभियोग का नोटिस राज्यसभा सभापति के पास लंबित है। माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने भी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की है। उनका कहना है कि 73 सांसदों की ओर से दिए गए नोटिस में सीईसी के खिलाफ नौ आरोप लगाए गए थे।
चुनाव आयोग ने दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों पर आधा अधुरा जवाब दिया है। आयोग का कहना है कि किसी संस्थान के भीतर अलग-अलग राय, टिप्पणियां और सुझाव निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में जारी किए गए उसके सभी आदेश और निर्देश पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए फैसलों का परिणाम हैं। आयोग के मुताबिक, केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखकर पूरे घटनाक्रम की तस्वीर नहीं समझी जा सकती।
14 आपत्तियों में उठाए गए सभी सवालों का स्पष्ट जवाब आयोग के बयान में नहीं मिलता। फॉर्म-6 में बदलाव, उसके लिए मंजूरी की प्रक्रिया और SIR से जुड़े ऑनलाइन फॉर्म में किए गए बदलावों को लेकर भी चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां दर्ज की गई थीं। यानी विवाद केवल SIR के सामान्य संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया और आंतरिक असहमति से जुड़े सवाल भी इसमें शामिल हैं, जिनके जवाब आयोग ने अपनी सफाई में नहीं दिए हैं।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा की शर्तों और कार्यकाल से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ के सामने भेजने का रास्ता साफ किया। दो जजों की पीठ में इस मुद्दे पर अलग-अलग राय आई। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने बड़ी पीठ को भेजने की जरूरत से असहमति जताई, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने मामले को संविधान पीठ के सामने रखने के पक्ष में राय दी। इसके बाद मामले को आगे की प्रक्रिया के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया।
इन याचिकाओं में 2023 के उस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है। अब इस व्यवस्था से जुड़े संवैधानिक सवाल बड़ी पीठ के सामने रखे जाने की प्रक्रिया में हैं।
SIR को लेकर विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, उनके खिलाफ कार्रवाई और SIR पर रोक की मांग की है। राहुल गांधी ने निर्वाचन आयोग को लेकर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी आयोग के भीतर अधिकारियों की ओर से दर्ज आपत्तियों को गंभीर मामला बताते हुए सवाल उठाए। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने SIR को तत्काल रद्द करने की मांग की। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसले पूरे आयोग की सहमति से लिए गए हैं।
अब इस पूरे मामले में संवैधानिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। एक ओर 24 अप्रैल से लंबित महाभियोग नोटिस पर आगे की कार्रवाई का सवाल है, तो दूसरी ओर चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और SIR से जुड़े आरोपों पर जवाबदेही की मांग है। इसी के साथ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून की वैधता का सवाल भी सुप्रीम कोर्ट के सामने है। इन सभी मामलों में आगे होने वाली संस्थागत और न्यायिक कार्रवाई से तस्वीर और स्पष्ट होगी।
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