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पारदर्शिता और भ्रष्टाचार नियंत्रण के सवाल सरकार पीछे खींच रही है कदम

संसद ने दिसंबर 2013 में लोकपाल और लोक आयुक्त अधिनियम पास किया था। तब से अब तक 4 वर्ष से अधिक गुजर गए हैं, पर एक भी लोकपाल नियुक्त नहीं हुआ है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया लोकपाल नहीं लाने को लेकर प्रतिरोध करते सामाजिक कार्यकर्ता

हाल के समय में एक अजीब स्थिति यह देखी गई है कि भ्रष्टाचार नियंत्रण और पारदर्शिता की बात तो सरकारी स्तर पर बहुत की जाती है, पर यदि वास्तविक स्थिति देखी जाए तो कई महत्त्वपूर्ण संदर्भों में कदम आगे बढ़ने के स्थान पर पीछे हटते हुए नजर आते हैं।

संसद ने दिसंबर 2013 में लोकपाल और लोक आयुक्त अधिनियम पास किया था और इसे गजट में जनवरी 1 2014 को नोटिफाई किया गया। तब से अब तक 4 वर्ष से अधिक गुजर गए हैं, पर एक भी लोकपाल नियुक्त नहीं हुआ है। यहां तक कि लोकपाल के पद पर नियुक्ति के लिए उचित उम्मीदवार की खोज के लिए जरूरी चयन समिति भी नहीं बनाई गई है।

वर्ष 2018-19 के बजट में लोकपाल के लिए महज 4 करोड़ रुपए का आवंटन है। भला 4 करोड़ रुपए के बजट में यह महत्त्वपूर्ण कार्य कितना आगे बढ़ सकेगा, यह सवाल हमारे सामने है।

भ्रष्टाचार दूर करने और पारदर्शिता लाने की दिशा में एक जरूरी कदम यह माना गया है कि सूचना के अधिकार के कानून को असरदार ढंग से लागू करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं और सूचना आयोगों का कार्य व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए पूरा सहयोग किया जाए। पर वास्तविक स्थिति यह है कि सूचना आयोगों में जरूरी नियुक्तियां नहीं हो रही हैं, जिससे उनके द्वारा अपीलों पर समुचित कार्यवाही करने में बहुत देरी हो रही है।

केन्द्रीय सूचना आयोग पर वर्ष 2016-17 में 66 करोड़ रुपए खर्च हुआ था। वर्ष 2017-18 के बजट के संशोधित अनुमान में इसे 55 करोड़ रुपए तक सिमटा दिया गया। अब वर्ष 2018-19 के बजट में केन्द्रीय सूचना आयोग के बजट को और भी कम कर 35 करोड़ रुपए तक सिकुड़ा दिया गया। एक ही वर्ष में 36 प्रतिशत की कटौती की गई है। जहां जरूरत यह थी कि केन्द्रीय सूचना आयोग के बजट को बढ़ा कर वहां पर बहुत पीछे चल रहे कार्य को पूरा किया जाए वहां सच्चाई यह है कि उसके आंवटन में बड़ी कमी ला कर उसके कार्य को और कठिन बना दिया गया है।

आगे यह भी देखना महत्त्वपूर्ण है कि केन्द्रीय सूचना आयोग के किस मद पर अभी कटौती की गई है। यदि हम ‘केन्द्रीय सूचना आयोग व सूचना का अधिकार’ के लिए आवंटित बजट को देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2017-18 के संशोधित अनुमान में 23.6 करोड़ रुपए का आवंटन था जिसे वर्ष 2018-19 के बजट अनुमान में मात्र 8.7 करोड़ रुपए कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में, मात्र 1 वर्ष में 63 प्रतिशत की कटौती की गई है। इससे देश में सूचना के अधिकार की बहुत क्षति होगी, जबकि यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है।

जो लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं उन्हें कानूनी स्तर पर सुरक्षा मिले तो इससे उनकी हिम्मत बढ़ेगी। इसके लिए एक महत्त्वपूर्ण कानून ‘व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन अधिनियम 2014’ है, पर लगभग चार वर्ष के बाद भी इसके नियम नोटिफाई नहीं किए गए हैं जिससे इसका क्रियान्वयन नहीं हो सका है।

सरकारी स्तर पर यह कहना पर्याप्त नहीं है कि हमने अपनी कुछ जानकारी वेबसाइट पर डाल दी है तो हम पारदर्शी हो गए हैं। पारदर्शिता को कहीं अधिक समग्र संदर्भ में समझना होगा और पारदर्शिता की व्यवस्था लाने में सरकार को बहुत कुछ करना है।

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