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क्या भारत ने अमेरिका के साथ एक 'दबाव और शोषण' वाली 'अनुचित' डील के आगे सरेंडर कर दिया है?

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर विपक्षी दलों ने सरकार से और ज़्यादा स्पष्टता मांग करते हुए अगले हफ़्ते संसद में इस मुद्पूदे पर पूर्ण चर्चा का आग्रह किया है।

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भारत को अब अमेरिका के साथ अपने मौजूदा 40 अरब डॉलर सालाना के आयात को 100 अरब डॉलर सालाना करना होगा। तभी अमेरिका के साथ हुए उसके कारोबारी समझौते की अगले पांच साल में 500 अरब डॉलर का आयात करने की मुख्य शर्त पूरी होगी। इतना ही नहीं, ऐसा लगता है कि भारत ने अमेरिका को कृषि और औद्योगिक उत्पादों के मामले में भी भारी छूट दी है। भले ही भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर जारी साझा समझौते को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाए, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के दावे के उलट यह भारत के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है।

वॉशिंगटन में अंतरिम व्यापार समझौते के मुख्य बिंदुओं की घोषणा के कुछ ही घंटों के अंदर, भारत में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इस दौरान इस सबसे बेपरवाह प्रधानमंत्री शनिवार को यह कहते हुए मलेशिया रवाना हो गए कि यह 'भारत और अमेरिका के लिए बहुत अच्छी खबर है'। अपने पीछे वे केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को स्थिति संभालने और मुमकिन सवालों के जवाब देने के लिए छोड़ गए। अपेक्षित रूप से गोयल ने आशंकाओं और संदेह को कम करने की कोशिश में दावा किया कि 'अनाज, फल, तिलहन, सब्जियों...आदि में कोई रियायत नहीं दी गई है'। हालांकि उनके बयानों से झलक रहा था मानो वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं।

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केंद्र सरकार के बयानों पर विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस मामले पर संसद में पूर्ण चर्चा की मांग उठाई है। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने समझौते की बारीकियां शेयर करते हुए कटाक्ष किया है कि, “नाम नरेंद्र, काम सरेंडर...।”

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उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, “इतनी झप्पियों और फोटो-ऑप्स का कोई खास नतीजा नहीं निकला। नमस्ते ट्रंप, हाउडी मोदी पर भारी पड़ गया। दोस्त, दोस्त न रहा!” जयराम रमेश ने इस समझौते के बारे में लिखा है कि “अभी जारी किए गए अमेरिका-भारत संयुक्त बयान में डिटेल्स पर कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा गया है।“ उन्होंने लिखा है कि जो बातें सामने आई हैं उनसे निम्न बातें सामने आई हैं:

  • भारत अब रूस से तेल आयात नहीं करेगा। अलग से, अमेरिका ने यह भी घोषणा की है कि यदि भारत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूस से तेल खरीदता है, तो 25 प्रतिशत का दंड दोबारा लगाया जा सकता है।

  • भारतीय किसानों की कीमत पर अमेरिकी किसानों की मदद के लिए भारत आयात शुल्कों (import duties) में भारी कटौती करेगा।

  • अमेरिका से भारत का वार्षिक आयात तीन गुना हो जाएगा, जिससे वस्तुओं के व्यापार में हमारा लंबे समय से चला आ रहा सरप्लस समाप्त हो जाएगा।

  • अमेरिका को भारत के आईटी और अन्य सेवाओं के निर्यात को लेकर अनिश्चितता बनी रहेगी।

  • भारत के वस्तु निर्यात को अमेरिका में पहले की तुलना में अधिक शुल्कों (duties) का सामना करना पड़ेगा।

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इस समझौते को लेकर कि रणनीतिक मामलों के विश्लेषक डॉ. ब्रह्मा चेलानी भी चिंतित दिखे। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि, "...भारत आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था है, जिसकी ग्रोथ मुख्य रूप से घरेलू खपत पर टिकी है। 2025 में कुल अमेरिका-भारत द्विपक्षीय सामानों का व्यापार सिर्फ 132.13 अरब डॉलर होने के साथ, भारत को अमेरिका से सालाना लगभग 100 अरब डॉलर बिलियन का आयात करने के लिए मजबूर करना न केवल द्विपक्षीय संबंधों को बिगाड़ेगा — बल्कि भारतीय निर्यात में भारी बढ़ोतरी के बिना, यह भारत के कुल मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट को लगभग दोगुना करके 200 अरब डॉलर तक पहुंचा सकता है।

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भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 6 फरवरी को एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें कहा गया है कि अमेरिकी वाणिज्य मंत्री दूसरे मंत्रियों के साथ रूस के साथ भारत के व्यापार पर नज़र रखेंगे। अगर अमेरिकी टीम को पता चलता है कि 'भारत ने सीधे या परोक्ष रूप से रूस से तेल लेना फिर से शुरू कर दिया है, तो वे "सिफारिश करेंगे कि मुझे भारत के बारे में और क्या कार्रवाई करनी चाहिए और किस हद तक करनी चाहिए, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या मुझे भारत से आने वाली चीज़ों पर 25 प्रतिशत की एडिशनल एड वैलोरम ड्यूटी फिर से लगानी चाहिए।"

पीयूष गोयल के दावे के उलट, कथित संयुक्त बयान एक तरह से सिर पर बंदूक रखकर मनवाया गया एकतरफा समझौता लगता है। इसमें यह भी कहा गया है कि, “भारत सभी अमेरिकी इंडस्ट्रियल सामानों और कई तरह के अमेरिकी खाने-पीने और एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स, जिसमें ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स, जानवरों के चारे के लिए लाल ज्वार, ट्री नट्स, ताज़े और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स, और दूसरे प्रोडक्ट्स शामिल हैं, पर टैरिफ खत्म करेगा या कम करेगा।”

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व्हाइट हाउस से जारी किए गए जॉइंट स्टेटमेंट और एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से यह साफ है कि अमेरिकी खेती के उत्पादों पर या तो कोई इंपोर्ट ड्यूटी नहीं लगेगी या फिर इंपोर्ट ड्यूटी काफी कम कर दी जाएगी। हालांकि इसमें 'डेयरी' का खास तौर पर ज़िक्र नहीं है, लेकिन जानबूझकर दिया गया यह अस्पष्ट बयान भविष्य में दूसरे सेक्टर और प्रोडक्ट्स को शामिल करने की गुंजाइश रखता है।

कम टैरिफ के लिए अमेरिका ने जो 'शर्त' रखी है, वह यह है कि भारत रूस से एनर्जी खरीदना बंद कर दे यानी तेल खरीदना बंद कर दे - जिससे अमेरिका की दादागिरी और भारत की संप्रभुता के सवाल उठ रहे हैं। इसकी आलोचना एक 'एकतरफा बयान' के तौर पर की जा रही है, जिसमें सिर्फ एक पक्ष, भारत, ही रियायतें दे रहा है। बयान के हिसाब से देखें तो भारत ने अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर टैरिफ छोड़ने या काफी कम करने पर सहमत होकर एक तरह से सरेंडर कर दिया है।

विपक्षी दलों ने सरकार से और ज़्यादा स्पष्टता और अगले हफ़्ते संसद में पूरी चर्चा की मांग उठाई है। ऐसे में माना जा रहा है कि संसद में एक बार फिर हंगामी बैठक होने के आसार बन गए हैं।

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