
संसद में पास कराने के पांच साल बाद 21 नवंबर 2025 को चार श्रम संहिताओं को लागू कर दिया गया। ये संहिताएं कामगारों की पगार से लेकर, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, पेशेवर सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाज की स्थितियों को लेकर हैं। पहले इन सबके लिए जो 29 केन्द्रीय कानून थे, उन्हें अब इन संहिताओं में समेट दिया गया है। समर्थक कह रहे हैं कि ये वे कदम हैं जिनका लंबे समय से इंतजार था। वे इसे ऐसा ‘श्रम सुधार‘ मानते हैं जो भारत को श्रम कानूनों के मामले में विश्व स्तर के बराबर खड़े कर देते हैं। दूसरी तरफ, एक आलोचक की इस टिप्पणी पर ध्यान देना भी जरूरी है, ‘‘चीन जैसी मैन्युफैक्चरिंग सुपर पावर बनने की कोशिश में भारत ने अमेरिका के श्रम कानूनों वाले तौर-तरीके तो अपना लिए हैं, लेकिन भारत के सामाजिक-आर्थिक हालात को पूरी तरह नजरंदाज कर दिया है।’’
जिन पर इनका असर पड़ेगा, उनके असंतोष का बहुत स्पष्ट स्वर सुनाई दे रहा है। दस मजदूर यूनियनों ने इन्हें धोखा बताते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की है। इनमें बहुत सारी वे मजदूर यूनियनें हैं जो विपक्षी दलों से जुड़ी हुई हैं। बीजेपी और संघ से नाता रखने वाले भारतीय मजदूर संघ यानी बीएमएस ने भी इनके कुछ प्रावधनों से दूरी बना ली है। शुरू में बीएमएस ने इनका स्वागत किया था। बाद में एक बयान जारी कर औद्योगिक संबंध संहिता और पेशेवर सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियों संबंधी संहिता के कुछ प्रावधानों को मजदूर विरोधी बताया है।
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हालांकि इन संहिताओं में कुछ चीजें सकारात्मक और प्रगतिशील दिखाई देती हैं। जैसे- समाजिक सुरक्षा के फायदे अब श्रमिक के साथ ही रहेंगे चाहे वह कहीं भी जाए, या फिर वेतन की मानक संरचना। लेकिन इसका व्यापक असर श्रमिकों के लिए इतना सकारात्मक नहीं रहने वाला। आसानी से नौकरी से निकाल देना, काम के बढ़े हुए घंटे और सुरक्षा के अधकचरे प्रावधान उस देश के लिए अच्छे नहीं हैं जहां वेतनमान काफी समय से बढ़े नहीं हैं और बेरोजगारी बहुत ज्यादा है।
पहली नजर में वेतन संहिता प्रगतिशील दिखाई देती है। अब केन्द्र के स्तर पर न्यूनतम वेतन तय किया गया है। इससे राज्यों के बीच का अंतर खत्म होगा। फिर इसमें समय पर वेतन देने का वादा भी है। लेकिन न्यूनतम वेतन काफी कम है- 178 रुपये प्रतिदिन। यह गुजारे लायक खर्च के 375 से 700 रुपये (ग्रामीण और शहरी अलग-अलग क्षेत्रों के हिसाब से) के अनुमान से काफी कम है। कई मजदूर संगठन 26,000 रुपये प्रतिमाह न्यूनतम वेतन की मांग करते रहे हैं, यह उससे मीलों दूर है।
समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है। मजदूरों की कई श्रेणियां इस न्यूनतम वेतन वाली परिभाषा में भी नहीं आतीं। जैसे कि गिग और प्लेटफाॅर्म वर्कर। यानी जोमेटो और ब्लिंकिट के वे लोग जो हमारे घरों तक सामान पहुंचाते हैं, वे ‘कर्मचारी‘ की परिभाषा से बाहर हैं। न्यूनतम वेतन, ओवरटाईम और दूसरे अधिकारों जैसे संरक्षण उनके लिए नहीं हैं।
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एक और समस्या यह है कि अब ठेके पर श्रमिक देने वाले को ही प्राथमिक नियोक्ता माना जाएगा। यानी वे जिन कंपिनयों में अपनी सेवाएं दे रहे होंगे, उनकी जिम्मेदारी अब खत्म। किसी वजह से ठेकेदार उन्हें वेतन नहीं देता, तो श्रमिकों के पास बहुत कम विकल्प बचेंगे।
इन चारों में सबसे विवादास्पद है औद्योगिक संबंध संहिता। मजदूर यूनियनों का कहना है कि श्रमिकों को अचानक ही बाहर कर दिए जाने से रोकने के जो प्रावधान थे, उन्हें खत्म कर दिया गया है। जिस कंपनी में 100 से ज्यादा कर्मचारी हैं, उसमें अचानक न तो छंटनी की जा सकती थी और न ही बर्खास्तगी। इस सीमा को बढ़ाकर अब 300 कर्मचारी कर दिया गया है। अब बहुत सी कंपनियां अपने आकार को 299 कर्मचारियों तक सीमित रखने की कोशिश करेंगी और फिर वे अपने कर्मचारियों को रातो-रात बाहर का रास्ता दिखा सकेंगी। इस सीमा में संगठित क्षेत्र की बहुत सी कंपनियां आ जाएंगी।
याद कीजिए, कोविड महामारी के अनुभव को, जब आईटी और सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने मनमाने ढंग से बहुत से कर्मचारियों को नमस्कार कह दिया था। नई संहिता ने इसे संस्थागत रूप दे दिया है।
कांट्रैक्ट पर कर्मचारियों को रखने के चलन को इस संहिता में विस्तार दिया गया है। अब नियोक्ता कर्मचारी को अल्पाविध के लिए भी कांट्रैक्ट पर रख सकेंगे। ये कांट्रैक्ट रिन्यू होते रहेंगे और उन्हें कभी स्थाई का दर्जा नहीं मिलेगा। पहले के मुकाबले इन कांट्रैक्ट में कुछ नए लाभ जोड़े गए हैं, लेकिन उन्हें दीर्घकालिक सुरक्षा नहीं मिलेगी। इससे वे गिग कर्मचारियों वाले उस मााॅडल की ओर बढ़ेंगे जहां वफादारी और अनुभव का कोई अर्थ नहीं होता।
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आईटी क्षेत्र में अस्पष्टताएं अरसे से चली आ रही हैं और शोषण का जरिया बनती हैं। अभी भी इस क्षेत्र में काम करने वालों को ‘कर्मचारी’ का दर्जा नहीं दिया गया है, जिसकी वजह से वे विवादों के निपटारे वाली व्यवस्थाओं से बाहर हो जाते हैं। इसी वजह से हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है। अति कुशल पेशेवरों को उस रोजगार बाजार के हवाले छोड़ दिया गया है, जो पहले ही नियोक्ताओं की तरफ झुका हुआ है।
ये संहिताएं हड़ताल के अधिकार पर भी पाबंदियां लगाती हैं। अब मजदूरों को हड़ताल पर जाने से पहले 14 दिन का नोटिस देना होगा। इससे प्रबंधन को हालात बदलने की पर्याप्त मोहलत मिल जाएगी। इस दौरान वे अस्थाई कर्मचारियों का इंतजाम कर सकते हैं और मजबूत स्थिति में आकर कर्मचारियों से बात कर सकते हैं। श्रमिक नेताओं का कहना है कि हड़ताल ऐतिहासिक रूप से कर्मचारियों के पास वाजिब मांगों को मनवाने का हथियार रही है। अब यही अधिकार छिन रहा है। एक कर्मचारी नेता के शब्दों में, ‘‘यह एक तरह से यूनियन चलाने के अधिकार का छिन जाना है।’’
समाजिक सुरक्षा संहिता में पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व अवकाश जैसे फायदों को असंगठित क्षेत्र और गिग कर्मियों तक पहुंचाने का लक्ष्य तो दिखाई देता है, लेकिन कानून जिस तरह से बनाया गया है, उसमें कई छेद हैं। इसके दायरे में सिर्फ वही कारोबार आते हैं जिनमें दस से ज्यादा कर्मचारी हों। बहुत छोटी इकाइयां, घरेलू और कुटीर उद्योग, ग्रामीण एवं अनौपचारिक क्षेत्र इसक दायरे से बाहर हो जाते हैं।
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हालांकि संहिता में गिग और प्लेटफाॅर्म कर्मियों के लिए अलग परिभाषा दी गई है, लेकिन उन्हें मिलने वाले फायदे विवेकाधीन होंगे। प्लेटफाॅर्म कंपनियों को इसके लिए अपने करोबार का एक से दो फीसद योगदान कल्याण कोष में देना होगा। लेकिन जितना वेतन वे दे रहे हैं, यह उसके पांच फीसद से अधिक नहीं हो सकता। इससे इस कोष की वास्तविक क्षमता काफी कम हो जाएगी। राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा जैसी कोष के पिछले अनुभव भी कोई उम्मीद नहीं जगाते, जिनका कार्यान्वयन बहुत खराब और बेमतलब रहा है।
मानव अधिकार संगठनों ने मानव अधिकार संगठन डिजिटल ट्रैकिंग और वेरीफिकेशन को लेकर भी संहिता की आलोचना कर रहे हैं। इसमें वे कर्मचारी बाहर हो सकते हैं जिनके पास स्मार्टफोन या भरोसेमंद इंटरनेट नहीं है। कई तरह के कामों में इसका नुकसान महिलाओं और गिग कर्मियों को हो सकता है। औरतों के लिए कम वेतन, मातृत्व सुरक्षा का अभाव और सीमित सुविधाओं का मतलब है कि जिनके सशक्तीकरण का दावा किया गया है, वे हाशिये पर रह जाएंगे।
अब एक पाली में कर्मचारी को एक दिन में 12 घंटे तक काम करना पड़ सकता है। हालांकि यह जरूर कहा गया है कि एक सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं होना चाहिए। इस प्रावधान की खासी आलोचना भी हो रही है। निर्माण और खनन जैसे जोखिम भरे कामों में 12 घंटे की पाली दुर्घटना का कारण भी बन सकती है।
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ओवरटाइम के लिए दुगने वेतन का प्रावधान बना हुआ है, लेकिन जरूरत पड़ने पर काम को 12 घंटे तक करवाने से कर्मचारी पर बोझ तो बढ़ेगा लेकिन उसे इसका कोई लाभ भी नहीं मिलेगा। फिर सरकार 'जनहित' के नाम पर कोई भी ढील दे सकती है। दस से कम श्रमिकों वाले कारोबार में ये सारे नियम वैसे भी नहीं लागू होते, जबकि ज्यादातर दुर्घटनाएं छोटे और सूक्ष्म उद्योगों में ही होती हैं। घरेलू नौकरों, गिग कर्मियों एप बेस्ड ड्राईवरों के लिए जो वर्गीकरण है, उसमें खतरनाक स्थितियों के लिए कुछ भी सुरक्षा नहीं है।
चारों संहिताओं को जोड़ दें, तो पता चलेगा कि श्रमिक को देखने का नजरिया बदल गया है। इसमें उस सोच की झलक मिलती है, जो कहती है कि काम एक ‘पवित्र दायित्व’ है। इनमें बढ़ते शोषण का न्यायोचित ठहराने की भी कई व्यवस्थाएं हैं। यह सब उस देश में है जहां बेरोजगारी और अर्धबेरोजगारी बहुत ज्यादा है। अकुशल श्रमिकों के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि आप उन्हें कितनी भी कम पगार क्यों न देते हों, आपको ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो उसी काम को उससे कम पगार पर करने को तैयार हैं। 8-10 फीसद बेरोजगारी दर वाले देश को ये संहिताएं बिना सुरक्षा वाले तदर्थ रोजगार की तरफ धकेल रही हैं।
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श्रम कानून महज तकनीकी ढांचा भर नहीं हैं, वे बताते हैं कि हमारा समाज किसे महत्व दे रहा है। उनसे पता चलता है कि श्रमिकों को आत्मसम्मान वाले इंसानों की तरह देखा जा रहा है या फिर अर्थव्यवस्था की गाड़ी का एक ऐसा पहिया माना जा रहा है जिसे जरूरत पड़ने पर बदला जा सकता है। ‘ईज़ ऑफ डूईंग बिजनेस‘ और ‘वैश्विक स्पर्धात्मकता’ के नाम पर सोच पूरी तरह से बदल गई है। कभी हम पूंजी और श्रम के जिस अंतर को पाटने की बात करते रहे हैं, अब उसे बढ़ाने का रास्ता खोल दिया गया है।
अर्थपूर्ण सुधार का मकसद कुछ और भी हो सकता था- भारत को सुरक्षित और सम्मानित श्रम का केन्द्र बनाया जाए, न कि ऐसी जगह जहां कर्मचारियों को आसानी से हटाया जा सकता है। इससे वास्तविक सामाजिक सुरक्षा का रास्ता खुलता। तब न्यूनतम वेतन ऊपर उठने का एक नैतिक आधार होता, वह छत नहीं जहां से नीचे जाने के जुगाड़ तलाशने हैं।
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