
शुभेंदु अधिकारी, कभी तृणमूल कांग्रेस का एक प्रमुख चेहरा हुआ करते थे। उन्होंने एक लंबा और विवादों से भरा राजनीतिक सफर तय किया है। तृणमूल कांग्रेस में वे एक शक्तिशाली संगठक के तौर पर उभरे। उन्होंने खासतौर से पूर्वी मिदनापुर में काफी अहम भूमिका निभाई। इसके बाद दिसंबर 2020 में पार्टी से अलग होकर, 2021 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बीजेपी का दामन थाम
बंगाल में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री अधिकारी का नाम कई साल से भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा रहा है, खासकर शारदा चिट फंड घोटाले के मामले में। रिपोर्टों के अनुसार, शारदा प्रमुख सुदीप्त सेन द्वारा दायर एक याचिका में अधिकारी पर ज़बरन वसूली करने और कंपनी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है। हालांकि शुभेंदु अधिकारी ने इन दावों को राजनीति से प्रेरित बताकर खारिज कर दिया है।
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2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारी पर 25 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से ज़्यादातर मामले तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के बाद दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में आपराधिक धमकी, हत्या का प्रयास, दंगा भड़काना, विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना, नफ़रत भरे और जातिवादी बयान देना, किसी को गलत तरीके से रोकना और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसे आरोप शामिल हैं।
चुनाव आयोग में दायर उनके हलफनामे में 2021 में केवल एक लंबित आपराधिक मामला दिखाया गया था, जो नारदा से जुड़े मामला था। लेकिन बाद में मामलों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई। उनकी कानूनी स्थिति को अदालती आदेशों ने भी आकार दिया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक मौके पर उनके खिलाफ 26 एफआईआर पर रोक लगा दी थी और कहा था कि भविष्य की शिकायतों के लिए अदालत की मंज़ूरी ज़रूरी होगी, जिससे पुलिस की कार्रवाई काफी धीमी हो गई।
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बाद की रिपोर्टों में बताया गया कि 15 एफआईआर रद्द कर दी गईं और पांच अन्य को एक विशेष जांच दल (एसआईटी) के पास भेज दिया गया। राजनीतिक नज़रिए से, उनके विरोधी कहते हैं कि इससे उन्हें एक तरह की सुरक्षा मिल गई, जबकि उनके समर्थक यह तर्क देते हैं कि बार-बार की शिकायतों के ज़रिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा था।
शुभेंदु अधिकारी पर उनके विरोधियों ने अक्सर चुनाव प्रचार के दौरान अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने और डराने-धमकाने का आरोप लगाया है। एक रिपोर्ट में एक राजनीतिक विरोधी के हवाले से कहा गया है, "उनकी राजनीति केवल धमकियों और डराने-धमकाने पर आधारित थी," जबकि एक अन्य रिपोर्ट में अधिकारी के उस बयान का ज़िक्र किया गया है जिसमें उन्होंने मुस्लिम प्रवासियों को चेतावनी दी थी कि "वोट डालने के बाद उन्हें बीजेपी शासित राज्यों से वापस जाना होगा।"
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उन्हें सांप्रदायिक और भड़काऊ बयानों के लिए आलोचना का भी सामना करना पड़ा है। हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने मुसलमानों को "कट्टरवादी" बताया और दावा किया कि उनकी जीत हिंदू समर्थन पर आधारित थी; इस बात को लेकर उनकी कड़ी आलोचना हुई, क्योंकि इससे बंगाल की राजनीति में विभाजन और गहरा हुआ।
तृणमूल से उनका जाना, हाल के वर्षों में पार्टी के लिए सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाने वाले दलबदलों में से प्रमुख रहा। अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक नेटवर्क में बहुत गहराई तक जुड़े हुए थे, और उनके जाने को एक बड़ा झटका माना गया, क्योंकि उन्हें पार्टी की स्थानीय संरचना, मतदाताओं के समीकरण और अंदरूनी कमज़ोरियों की पूरी जानकारी थी। यही वजह है कि तृमणूल में कई लोग अब भी उनके इस कदम को एक सामान्य राजनीतिक विभाजन के बजाय 'तोड़फोड़' ही मानते हैं। उनके नज़रिए से, उन्होंने केवल पार्टी छोड़ी ही नहीं; बल्कि एक अहम मोड़ पर पाला बदलने से पहले, उन्होंने पार्टी को भीतर से कमज़ोर करने में भी मदद की।
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अधिकारी के नजदीकी कई सहयोगियों की मौत भी लोगों की चिंता और राजनीतिक अटकलों का विषय बनी हुई है। कई मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि दो दिन पहले हुई चंद्रनाथ रथ की हत्या से पहले भी, अधिकारी पिछले 13 वर्षों में अपने तीन सहयोगियों को खो चुके थे, जिनमें 2013 में प्रदीप झा और 2018 में शुभब्रत चक्रवर्ती शामिल थे। इन मौतों के चलते एक रहस्यमयी स्थिति बनी है, लेकिन रिपोर्टें किसी एक साज़िश को साबित नहीं करतीं। रिपोर्टों से जो कुछ सामने आता है, वह है उनके करीबी लोगों पर हिंसा का एक सिलसिला, जो बंगाल की राजनीति का एक तरह से अभिन्न अंग बन गया है।
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