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सुवेंदु के भगवा सम्मान मार्च से तीखा हुआ लेफ्ट और आनंदबाजार के साथ बीजेपी का टकराव

छात्र गुटों के बीच झड़पों और दीवारों पर लिखी बातों (ग्राफिटी) को लेकर हुए विवाद से शुरू हुई यह बात अब धार्मिक प्रतीकों, राष्ट्रवाद पर सवालों, वामपंथियों पर हमलों और राज्य के सबसे बड़े अखबारों में से एक के साथ टकराव तक पहुंच गई है।

भगवा मार्च की अगुवाई करते पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी (फोटो - पीटीआई)
भगवा मार्च की अगुवाई करते पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी (फोटो - पीटीआई) 

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की बुधवार को जादवपुर में आयोजित ‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ में भगवा कपड़े पहने साधु, बीजेपी कार्यकर्ता और राष्ट्रवादी नारे तो एक साथ नजर आए, वहीं इस मार्च ने राज्य की वामपंथी राजनीति, जादवपुर यूनिवर्सिटी में असहमति की स्वतंत्रता और प्रेस-मीडिया की आज़ादी को लेकर पहले से चल रहे कड़वे टकराव को और तेज़ कर दिया।

गोलपार्क से 8बी बस स्टैंड तक लगभग तीन किलोमीटर लंबे मार्च की अगुवाई करते हुए, सीएम सुवेंदु अधिकारी अधिकारी ने बार-बार वामपंथ, कश्मीर और फ़िलिस्तीन से जुड़े नारों और ग्रैफ़िटी के ख़िलाफ़ चेतावनी दी। शंख, उलू-ध्वनि और लाउडस्पीकर पर बज रहे गायत्री मंत्र के साथ निकाले गए इस मार्च को भगवा रंग के बचाव के तौर पर पेश किया गया।

सुवेंदु अधिकारी ने नारा दिया, “स्वामी विवेकानंद की धरती पर भगवा राज करेगा...।” लेकिन उनके भाषण का अधिकतर हिस्सा राजनीतिक विरोधियों पर केंद्रित रहा। 'किशनजी को लाल सलाम' शब्दों ग्रैफिटी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "मैंने कसम खाई है कि यहां जादवपुर में - ऋषि अरबिंदो की भूमि से - मैं उन लोगों को उखाड़ फेंकूंगा जिन्होंने किशनजी को 'लाल सलाम' पेश किया।"

उन्होंने 'आज़ादी', 'फ़्री फ़िलिस्तीन' और 'कश्मीर को आज़ादी चाहिए' जैसे नारों पर भी सवाल उठाए। 'आज़ादी' के नारों पर सवाल करते हुए उन्होंने पूछा, "किस चीज़ से आज़ादी? देश को तो बहुत पहले ही आज़ादी मिल चुकी है।"

अधिकारी ने उस राजनीतिक लड़ाई को याद किया जिसने बंगाल में लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन को खत्म कर दिया था। उन्होंने कहा, "2011 में मैंने कम्युनिस्टों और फिर जमात-समर्थित सरकार को सत्ता से हटाने का संकल्प लिया था; आपके आशीर्वाद से ऐसा हुआ।" उन्होंने आगे कहा कि अब वह तथाकथित "टुकड़े-टुकड़े" और "आज़ादी गैंग" का मुकाबला करेंगे।

विरोधियों को "जड़ से उखाड़ने" की उनकी बार-बार की बातों ने जादवपुर यूनिवर्सिटी के आस-पास बढ़ते टकराव वाले राजनीतिक माहौल को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह कैंपस लंबे समय से छात्र सक्रियता, वामपंथी राजनीति और राजनीतिक बहसों का केंद्र रहा है, और हाल ही में वामपंथी छात्र संगठनों और आरएसएस-बीजेपी से जुड़े विद्यार्थी परिषद कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़पों ने तनाव को और बढ़ा दिया है।

बीजेपी की यह लामबंदी बांग्ला दैनिक 'आनंदबाजार पत्रिका' के साथ चल रहे एक अलग टकराव के बीच हो रही है। अखबार ने पहले जादवपुर विवाद से जुड़ी एक हेडलाइन में 'गेरुआ गुंडागर्दी' शब्द का इस्तेमाल किया था। अधिकारी ने इस शब्दावली पर आपत्ति जताई और माफी की मांग की। उनका तर्क था कि राजनीतिक दलों की आलोचना तो की जा सकती है, लेकिन भगवा रंग का अपमान नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि "नतीजे भयानक होंगे" और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने यह भी कहा कि अखबार "भयानक नतीजों को झेल नहीं पाएगा"।

बाद में यह विवाद अख़बार के पन्नों से आगे बढ़ गया। हेडलाइन को लेकर पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गईं। बाद में, भगवा कपड़े पहने प्रदर्शनकारी अख़बार के कोलकाता ऑफ़िस के बाहर जमा हुए और इमारत के कुछ हिस्सों को भगवा रंग से रंग दिया। इस घटना की प्रेस की आज़ादी के समर्थकों ने आलोचना की, जबकि प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने पत्रकारों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को वापस लेने की मांग उठाई गई।

इसलिए, आनंदबाज़ार का मामला जाधवपुर के बड़े विवाद से गहराई से जुड़ गया है। अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि 'भगवा गुंडागर्दी' शब्द सही था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भगवा राजनीति की आलोचना को अब उस रंग पर ही हमला माना जाने लगा है।

बंगाल सीएम ने ऐलान किया कि वे धार्मिक कार्यक्रमों के लिए फिर जाधवपुर लौटेंगे। उन्होंने कहा, "मैं एक बार वेद पाठ करने आऊंगा ताकि देश और भगवा विचारधारा का अपमान करने वालों को सबक सिखा सकूं। और दूसरी बार मैं हनुमान चालीसा का पाठ करने आऊंगा।" उन्होंने तीन दिन के वेद-पाठ कार्यक्रम की भी घोषणा की और "सभी राष्ट्रवादी लोगों" से इसमें शामिल होने का आह्वान किया।

वामपंथियों ने इस लामबंदी की कड़ी आलोचना की है। वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम ने इसे "जादवपुर यूनिवर्सिटी और दूसरी यूनिवर्सिटीज़ के ख़िलाफ़ साफ़ तौर पर जंग" बताया। साधुओं की मौजूदगी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल की बौद्धिक परंपरा पहले ही यह दिखा चुकी है कि यूनिवर्सिटीज़ को कैसे चलाया जाना चाहिए और साथ ही जोड़ा, "सिर्फ़ भगवा कपड़े पहनने से कोई साधु नहीं बन जाता।"

तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह न सिर्फ़ राजनीतिक चर्चा, बल्कि बंगाली जीवन के हर पहलू को भी अपनी मर्ज़ी से चलाना चाहती है। उन्होंने कहा, "वे तय करेंगे कि बंगाली लोग क्या पहनेंगे, क्या खाएंगे और बाकी सब कुछ भी वही तय करेंगे।" उन्होंने आगे कहा कि पार्टी अब यह भी तय करने की कोशिश कर रही है कि "मीडिया को क्या दिखाना और लिखना चाहिए"।

इस बीच, अधिकारी ने राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि विधानसभा के एक विशेष सत्र में तबादलों से जुड़ा एक "ऐतिहासिक बिल" पेश किया जाएगा और उन्होंने इस मुद्दे पर गुरुवार को बोलने के लिए "10-15 मिनट" का समय मांगा है।

इन घटनाओं ने जादवपुर को बंगाल में बढ़ती राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में ला खड़ा किया है। विरोधी छात्र गुटों के बीच झड़पों और दीवारों पर लिखी बातों (ग्राफिटी) को लेकर हुए विवाद से शुरू हुई यह बात अब धार्मिक प्रतीकों, राष्ट्रवाद पर सवालों, वामपंथियों पर हमलों और राज्य के सबसे बड़े अखबारों में से एक के साथ टकराव तक पहुंच गई है।