
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की लड़ाई अब और तेज होती जा रही है। जैसे-जैसे राज्य 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए तैयार हो रहा है, मैदान में उतरी दो मुख्य पार्टियां - तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और बीजेपी पूरी ताकत से जुट गई हैं, और वह भी ऑनलाइन।
वैसे, कुछ लोगों को 2021 के चुनावी अभियान के गीतों के हास्य और रचनात्मकता की याद भी आ रही है- जैसे, तृणमूल का 'खेला होबे' (खेल होगा) बनाम बीजेपी का 'पिशी जाओ' (अलविदा बुआ) जो इतालवी लोकगीत 'बेला चाओ' की धुन पर आधारित था और जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फासीवाद-विरोधी गीत बन गया था। लेकिन इस बार तेवर ज्यादा तीखे हैं, क्योंकि टीएमसी भी ईंट का जवाब पत्थर से दे रही है।
इस बार टीएमसी अपने नारे 'जोतोई कोरो हमला, अबार जितबे बांग्लां' (हम पर जितना भी हमला करो, बंगाल ही जीतेगा) के साथ बीजेपी का डटकर मुकाबला कर रही है। बीजेपी को 'बांग्ला विरोधी जमींदार' के तौर पर पेश करते हुए, इस गाने के बोल बीजेपी के धर्म, भाषा, प्रवासियों, एसआईआर और एनआरसी पर किए गए हमलों का जिक्र करते हैं, वहीं ममता बनर्जी को बंगाल और बंगाली गौरव की रक्षा करने वाली के तौर पर दिखाया गया है। जनवरी में, जब इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (आई-पैक) पर ईडी की रेड चल रही थी, तब रिलीज हुए इस तीन मिनट के गाने को मार्च तक 12.8 करोड़ व्यूज मिल चुके थे।
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बीजेपी का साढ़े चार मिनट का गाना डर, बेरोजगारी और काले धन के मुद्दे को जोर-शोर से उठाता है। उसे यूट्यूब पर दो महीनों में 2,16,000 से ज्यादा बार देखा गया। उसका चुनावी नारा है- 'पॉल्टोनो दोरकार, चाई बीजेपी सरकार' (बदलाव की जरूरत है, हमें बीजेपी सरकार चाहिए)। इस वीडियो में मोदी ने अपने अंदाज में बोला है। लेकिन इसने अनजाने में ही टीएमसी को एक हथियार थमा दिया है। बांग्ला न जानने वाले बीजेपी के कुछ समर्थक इस नारे से 'चाई' शब्द हटा दे रहे हैं; और इस शब्द के बिना नारे का मतलब यह निकलता है कि जिसे बदलने की जरूरत है, वह बीजेपी सरकार ही है!
बीजेपी के तरकश में 'भाग तृणमूल भाग' (भागो तृणमूल भागो), 'बांचते चाई, बीजेपी ताई' (बीजेपी चाहिए क्योंकि हम जीना चाहते हैं) और 'जोनोगोन दिच्छे डाक, तृणमूल निपात जाक' (जनता ने आवाज दी है, तृणमूल का खात्मा हो) जैसे नारे भी शामिल हैं। ममता बनर्जी ने जब कहा कि अगर बीजेपी सरकार आएगी, तो वह अन्य बीजेपी-शासित राज्यों की तरह यहां भी त्योहारों के दौरान मांस-मछली बेचने वालों की दुकानें बंद करवा देगी।
इसका जवाब देने के लिए बिधाननगर सीट से बीजेपी उम्मीदवार ने हाथ में 'कातला माछ' (ताजा पानी में पाए जाने वाली कतला मछली) लेकर प्रचार किया। इसका वीडियो खूब वायरल हुआ। पूर्व सांसद और स्तंभकार स्वपन दासगुप्ता समेत बीजेपी के अन्य उम्मीदवारों ने भी टीवी चैनलों के लोगों को अपने साथ दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया, ताकि वे इस बात का सबूत रिकॉर्ड कर सकें कि उनके खाने की मेज पर हमेशा मछली परोसी जाती है।
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नामांकन की आखिरी तारीखें 8 और 12 अप्रैल हैं, इसलिए अभी तो शुरुआत ही हुई है। जहां एक तरफ आधिकारिक हैंडल नरेन्द्र मोदी और ममता बनर्जी पर निजी हमले करने से बच रहे हैं, वहीं बीजेपी समर्थक सोशल मीडिया पर पूरी तरह से बेलगाम हो गए हैं; वे मुख्यमंत्री पर अश्लील टिप्पणियां तक कर रहे हैं और उन्हें जान से मारने की धमकियां भी दे रहे हैं। टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इनका जिक्र करते हुए कहा है कि इनसे 'बीजेपी का असली चेहरा' सामने आ गया है और ये बंगाल की 'हर महिला' का अपमान है।
संक्षेप में कहें तो, वाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एआई-आधारित रील्स पर चल रही लड़ाई उतनी ही जोरदार है जितनी कि जमीन पर चल रहे अभियान। बीजेपी के राष्ट्रीय आईटी सेल और उसके राज्य-स्तरीय डिजिटल वॉर रूम का मुकाबला करने के लिए, तृणमूल ने चुपचाप एक विकेन्द्रीकृत सोशल मीडिया सेल तैयार किया है, जो एक साथ मिनी न्यूज रूम, संकट प्रबंधन इकाई और अभियान नियोजन सेल के रूप में काम करता है।
टीएमसी का आईटी सेल 'दीदीर दूत' (दीदी का दूत) नाम के मोबाइल ऐप के जरिये अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से जुड़ा हुआ है। यह लोगों को एकजुट करता है, उनसे जुड़ता है, उन्हें काम सौंपता है, पल-पल की जानकारी देता है, और साथ ही इंटरएक्टिव क्विज और गेम जैसे फीचर्स भी देता है, ताकि यूजर्स अभियान की गतिविधियों में लगातार जुड़े रहें और उनका उत्साह बना रहे।
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'द इंडियन एक्सप्रेस' से बात करते हुए, तृणमूल कांग्रेस के आईटी सेल के प्रमुख देबांग्शु भट्टाचार्य ने कहा कि उनकी मुख्य रणनीति लोगों को यह समझाना है कि बीजेपी झूठ फैला रही है। यह 'जैसे को तैसा' वाली बात हैः जब भी बीजेपी का आईटी सेल बंगाल की किसी बात का मजाक उड़ाता है, तो तृणमूल यूपी और गुजरात-जैसे बीजेपी-शासित राज्यों की असलियत सामने रख देती है।
द इंडियन एक्सप्रेस ने अभी 23 मार्च को ही खबर दी है कि टीएमसी के सोशल मीडिया इकोसिस्टम ने 10,000 से ज्यादा रील्स और छोटे वीडियो बनाए हैं, जिन्हें पार्टी से जुड़े आधिकारिक चैनलों, वॉलंटियर नेटवर्क और स्वतंत्र इन्फ्लुएंसर्स के जरिये अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर फैलाया गया है। आई-पैक के पूर्व सदस्य आनंद चौरसिया ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि टीएमसी आईटी सेल को छोटे वीडियो, रील्स, मीम्स और ग्राफिक्स के जरिये रोजाना की कहानी को आकार देने का काम सौंपा गया है।
कंसल्टेंट ऋधि प्रोतिम नियोगी का कहना है कि 'बीजेपी का आईटी सेल अब भी ज्यादातर केन्द्रीय निर्देशों और आम मैसेजिंग पर ही निर्भर रहता है; स्थानीय पार्टी मशीनरी और बूथ-स्तर के फीडबैक लूप के साथ इसका तालमेल उतना अच्छा नहीं है। आई-पैक और टीएमसी के आईटी सेल ने वोटर-स्तर के डेटा और जमीनी कार्यकर्ताओं, बूथ-स्तर के एजेंटों, फील्ड टीमों और 'दीदी के बोलो' (दीदी को बताओ) हेल्पलाइन के बीच एक ज्यादा आसान और सीधा जुड़ाव बनाया है, जिससे अभियान में बदलाव करने के लिए रियल-टाइम जानकारी मिलती रहती है।'
किस आईटी सेल की जीत होगी, यह जानने के लिए हमें मतगणना के दिन 4 मई तक इंतजार करना होगा।
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'दीदी' ने केरल की एक 'लिपिकीय त्रुटि' को यहां मुद्दा बना दिया है। दरअसल, केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने चुनाव आयोग का एक दिशानिर्देश जारी किया, जिस पर बीजेपी की मुहर लगी हुई थी। मीडिया में छपी रिपोर्ट लहराते हुए ममता ने कहा कि 'अगर किसी को अब भी इस बात का सबूत चाहिए कि आयोग और बीजेपी आपस में मिले हुए हैं, तो यह रहा।'
जब पार्टी के सांसदों, विधायकों और सोशल मीडिया सेल ने इस विवाद को और हवा दी, तो साइबर पुलिस मुख्यालय हरकत में आ गया। महुआ मोइत्रा जैसी सांसदों को कड़े नोटिस भेजे गए, जिनमें चुनाव आयोग का मजाक उड़ाने वाली पोस्ट हटाने की मांग की गई थी। इसके बजाय, उन्होंने खुशी-खुशी उस नोटिस को ही दोबारा पोस्ट कर दिया, जिसमें उन पर आयोग का अपमान करने, सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने और फूट तथा वैमनस्य भड़काकर सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाया गया था।
लेकिन मुख्य चुनाव अधिकारी के दफ्तर में बीजेपी की मुहर पहुंची कैसे? चुनाव आयोग की तरफ से जो सबसे कमजोर सफाई दी गई, वह यह थी कि बीजेपी ने 2019 की एक गाइडलाइन शेयर की थी, जो एक 'क्लर्क की गलती' की वजह से आगे भेज दी गई। क्या आपने कभी इससे भी ज्यादा बेतुकी बात सुनी है?
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