
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 2:27 बजे) फ़ारस की खाड़ी में फिर से मंडरा रहे युद्ध के खतरे को टालते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए। उन्होंने 'ट्रुथ सोशल' पर पोस्ट किया कि वह संघर्ष-विराम को आगे बढ़ा रहे हैं।
ट्रंप ने अपनी पोस्ट में लिखा कि, “इस तथ्य के आधार पर कि ईरान की सरकार गंभीर रूप से बंटी हुई है—जो कि कोई नई बात नहीं है—और पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के अनुरोध पर, हमसे कहा गया है कि हम ईरान पर अपना हमला तब तक के लिए रोक दें, जब तक कि उनके नेता और प्रतिनिधि कोई एक-जुट प्रस्ताव लेकर सामने नहीं आ जाते। इसलिए, मैंने अपनी सेना को निर्देश दिया है कि वह नाकेबंदी जारी रखे और अन्य सभी मामलों में पूरी तरह से तैयार और सक्षम रहे; अतः मैं इस युद्धविराम को तब तक के लिए बढ़ा रहा हूं, जब तक कि उनका प्रस्ताव सामने नहीं आ जाता और बातचीत जिस भी रूप में हों—पूरी नहीं हो जातीं।”
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ट्रंप की घोषणा ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची के इस ऐलान के बाद आई जिसमें उन्होंने कहा था कि, "ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी करना एक युद्ध का कृत्य है और इस प्रकार यह संघर्ष-विराम का उल्लंघन है। किसी वाणिज्यिक जहाज़ पर हमला करना और उसके चालक दल को बंधक बनाना तो इससे भी बड़ा उल्लंघन है। ईरान जानता है कि प्रतिबंधों को कैसे बेअसर करना है, अपने हितों की रक्षा कैसे करनी है, और दादागिरी का विरोध कैसे करना है।"
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ट्रंप के सीज़फायर के ऐलान के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने ट्रंप को धन्यवाद देते हुए एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, “अपनी ओर से और फ़ील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर की ओर से, मैं राष्ट्रपति ट्रंप का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ कि उन्होंने हमारी उस गुज़ारिश को मान लिया, जिसमें हमने सीजफायर को आगे बढ़ाने की बात कही थी, ताकि चल रही कूटनीतिक कोशिशों को अपना काम करने का मौक़ा मिल सके। इस भरोसे और विश्वास के साथ, पाकिस्तान संघर्ष के बातचीत से हल के लिए अपनी पूरी कोशिशें जारी रखेगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि दोनों पक्ष संघर्ष-विराम का पालन करते रहेंगे और इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत के दूसरे दौर के दौरान, इस संघर्ष को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए एक व्यापक ‘शांति समझौता’ कर पाएंगे।”
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इस बीच अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ और ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी से ईरान का समुद्री व्यापार बाधित होगा और उसके तेल के कुएं बंद हो जाएंगे। जबकि ईरान की तस्नीम न्यूज़ ने रिपोर्ट किया है कि इसके जवाब में, 'ईरान कम से कम स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को दोबारा नहीं खोलेगा और अगर जरूरत पड़ी तो वह ज़ोर-ज़बरदस्ती से इस नाकेबंदी को तोड़ देगा।'
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ईरान में जन्मे स्वीडिश लेखक और एक्टिविस्ट ट्रिटा पारसी, जो अमेरिका-ईरान संबंधों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए जाने जाते हैं, ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “ट्रंप झुक गए और उन्होंने सीजफायर को बढ़ाने पर सहमति दे दी, लेकिन इसे उन्होंने इस तरह पेश किया जैसे यह ईरानी सरकार की अव्यवस्था का नतीजा हो। सबसे अहम बात यह है कि वह इस संघर्ष-विराम को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा रहे हैं, जो उस परिणाम को दर्शाता है जिसके सबसे अधिक संभावित होने का तर्क मैंने दिया था: न कोई समझौता, न प्रतिबंधों में कोई राहत, न कोई परमाणु समझौता, न ही युद्ध की ओर वापसी; जबकि ईरान स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण बनाए रखेगा। यह कोई स्थिर स्थिति नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति है जिसमें ट्रंप वह मुख्य चीज़ हासिल कर लेते हैं जिसकी उन्हें तलाश थी—यानी युद्ध से बाहर निकलना—जबकि ईरान उस मुख्य चीज़ से वंचित रह जाता है जिसकी उसे तलाश थी: प्रतिबंधों का हटना।”
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सभी विश्लेषक इस बात से सहमत नहीं हैं कि ट्रंप ने नरमी बरती है। उनका मानना है कि सीज़फ़ायर को आगे बढ़ाकर, लेकिन नाकेबंदी जारी रखकर, ट्रंप ने ईरान से वह बढ़त छीन ली है जो उसे अब तक बातचीत के दौरान हासिल थी। ट्रंप ने युद्ध से पीछे हटकर और सीज़फ़ायर व नाकेबंदी को तोड़ने का फ़ैसला ईरान पर छोड़कर, युद्ध से बाहर 'निकलने का रास्ता' हासिल कर लिया है जिसकी उन्हें तलाश थी। उन्होंने ईरान को 'लंबा युद्ध' लड़ने का मौक़ा भी नहीं दिया जो वह चाहता था, और खाड़ी देशों को ईरान के साथ बातचीत करने पर मजबूर किया है, साथ ही ईरान पर इतना दबाव डाला है कि वह 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' को खोल दे। उनका मानना है कि सीज़फ़ायर अभी भी नाज़ुक बना हुआ है और किसी भी समय टूट सकता है, लेकिन ईरान पर अपना शिकंजा कसते हुए, अमेरिका और ट्रंप को कुछ राहत का समय मिल गया है।
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अमेरिकी आतंकवाद-रोधी केंद्र के पूर्व डायरेक्टर, जो केंट (मार्च में जो केंट ने ईरान के खिलाफ़ ट्रंप की जंग के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया था) ने भी इस बात से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि, "यह एक अच्छा कदम है—इससे हमें कुछ समय मिल जाता है। यह ज़रूरी है कि हम इस समय का समझदारी से इस्तेमाल करें। यह बात माननी होगी कि मौजूदा हालात में, कोई भी सैन्य समाधान मुमकिन नहीं है और किसी असली समझौते की गुंजाइश भी कम ही है। रीगन के '84 वाले मॉडल को अपनाएं: इस इलाके से अपनी सेनाएं वापस बुला लें, अपने खाड़ी सहयोगियों को होर्मुज़ को फिर से खोलने के लिए बातचीत करने दें, और अपना ध्यान देश के अंदर के मुद्दों और अगला चुनाव जीतने पर लगाएं—ठीक वैसे ही, जैसा रीगन ने किया था। यह ठीक उसके उलट है, जैसा इज़रायल हमसे करवाना चाहता है। इज़रायल को हमें इस जंग में और ज़्यादा गहराई तक खींचने से रोकने के लिए, हमें इज़रायल को दी जाने वाली सैन्य मदद को सीमित करके, सचमुच का संयम बरतना होगा।"
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