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आपकी डिजिटल पहचान का स्वामित्व या नियंत्रण किसके पास?

सिम से संबंधित नए नियम का लाखों लोगों पर असर होगा क्योंकि वे रोजमर्रा के कामोंके लिए मैसेजिंग ऐप्स पर निर्भर हैं। असली बहस सिर्फ सिम कार्डों के बारे में नहीं, बल्कि इस बारे में है कि डिजिटल पहचानों पर आखिरकर किसका नियंत्रण है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

भारत में मैसेजिंग प्लेटफॉर्मों के लिए सिम से संबंधित नया नियम, जो 1 मार्च 2026 से लागू हुआ है, लाखों नागरिकों के डिजिटल पहचान तक पहुंचने और उसे नियंत्रित करने के तरीके में मौलिक बदलाव ला सकता है। दूरसंचार साइबर सुरक्षा नियमों के तहत पेश किए गए इस निर्देश के अनुसार, मैसेजिंग एप्लिकेशनों को उपयोगकर्ता खातों को पंजीकरण के दौरान उपयोग किए गए भौतिक सिम कार्ड से लगातार लिंक रखना अनिवार्य है। यदि सिम कार्ड निकाल दिया जाता है, निष्क्रिय कर दिया जाता है, बदल दिया जाता है या निष्क्रिय हो जाता है, तो मूल सिम कार्ड को दोबारा डालने और सत्यापित होने तक खाते तक पहुंच अवरुद्ध हो सकती है।

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यह नियम वाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल और अन्य प्रमुख मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर लागू होता है जो प्रमाणीकरण के लिए मोबाइल नंबरों पर निर्भर करते हैं। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य साइबर धोखाधड़ी और मोबाइल नंबरों के दुरुपयोग को रोकना है, लेकिन गोपनीयता, डिजिटल स्वामित्व और उपयोगकर्ता स्वायत्तता पर इसके दूरगामी प्रभाव होंगे।

वाट्सएप का उदाहरण लें। नई व्यवस्था के तहत, उपयोगकर्ता तब तक अपने एकाउंट तक नहीं पहुंच सकता जब तक कि पंजीकरण के दौरान इस्तेमाल किया गया सिम कार्ड मुख्य डिवाइस में मौजूद न हो। व्यावहारिक रूप से, इसका मतलब यह है कि व्यक्तिगत बातचीत, संपर्क और डिजिटल इतिहास तक पहुंच एक विशेष सिम कार्ड के होने पर निर्भर करती है।

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इससे एक विचित्र विरोधाभास पैदा होता हैः जिस व्यक्ति ने एकाउंट बनाया, संपर्क नेटवर्क बनाया और डेटा निर्माएा किया, उसका अब उस पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रह जाता है। इसके बजाय, पहुंच प्रभावी रूप से सिम कार्ड द्वारा निर्धारित होती है।

लेकिन सिम कार्ड पर भी कानूनी स्वामित्व उपयोग करने वाले का नहीं होता। दूरसंचार ग्राहक तकनीकी रूप से सिम धारक होते हैं, सिम मालिक नहीं। सिम कार्ड जारी करने वाली दूरसंचार कंपनी की संपत्ति बना रहता है। परिणामस्वरूप, मैसेजिंग खातों पर नियंत्रण परोक्ष तौर पर एकाउंट बनाने वाले व्यक्ति के बजाय दूरसंचार कंपनियों के स्वामित्व वाले बुनियादी ढांचे से जुड़ा होता है। यह बदलाव प्लेटफॉर्म-आधारित संचार के युग में डिजिटल स्वामित्व और उपयोग करने वाले व्यक्ति के अधिकारों के बारे में मूलभूत प्रश्न खड़े करता है।

साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल ने संडे नवजीवन को बताया कि 'सिम-बाध्यकारी आदेश की नींव कमजोर है। चूंकि संसद ने इसके लिए कोई कानून पारित नहीं किया है, इसलिए इस आदेश को अदालत में आसानी से चुनौती दी जा सकती है।'

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भारत के संवैधानिक ढांचे में निजता को पहले ही मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जा चुकी है। ऐतिहासिक के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में, सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग है। इस फैसले में सूचनात्मक निजता को स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई है - यानी व्यक्तियों को अपने व्यक्तिगत डेटा पर नियंत्रण रखने का अधिकार है।

सिम बाइंडिंग इस सिद्धांत को जटिल बना देती है। यदि किसी व्यक्ति के डिजिटल एकाउंट तक केवल दूरसंचार कंपनी द्वारा जारी सिम कार्ड के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है, तो व्यक्ति की अपनी डिजिटल जानकारी को नियंत्रित करने की क्षमता सशर्त हो जाती है। आलोचकों का तर्क है कि जब उपयोगकर्ता अपने एकाउंट तक पहुंच का अंतिम नियंत्रक भी नहीं होता है, तो सूचनात्मक गोपनीयता की रक्षा करना कठिन हो जाता है।

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नए नियमों को लेकर चिंताएं सिर्फ प्राइवेसी ऐक्टिविस्टों तक ही सीमित नहीं हैं। प्रौद्योगिकी उद्योग समूहों ने भी कानूनी सवाल उठाए हैं। गूगल और मेटा जैसी वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम ने चेतावनी दी है कि यह आदेश दूरसंचार नियामक के वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर हो सकता है। सरकार को लिखे अपने पत्र में फोरम ने तर्क दिया कि प्रत्यायोजित कानून के जरिये दूरसंचार नियमों को इंटरनेट प्लेटफॉर्म तक विस्तारित करने से नियामक अतिव्यापीकरण और क्षेत्राधिकार संबंधी संघर्ष का खतरा है। इसने समानता के संवैधानिक अधिकार के संभावित उल्लंघन पर भी चिंता व्यक्त की।

उद्योग जगत के संगठन के अनुसार, डिजिटल प्लेटफॉर्मों को दूरसंचार-शैली के नियमों का पालन करने के लिए मजबूर करने से विभिन्न क्षेत्रों में असंगत अनुपालन जरूरतें पैदा हो सकती हैं और अनावश्यक ऑपरेशनल बोझ बढ़ सकता है।

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एक अन्य महत्वपूर्ण चिंता मोबाइल नंबरों की भूमिका से संबंधित है। फोन नंबर को व्यक्तिगत रूप से पहचान योग्य जानकारी (पीआईआई) माना जाता है। इसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म से मजबूती से जोड़ने से गोपनीयता संबंधी संभावित जोखिमों का दायरा बढ़ जाता है।

जब कोई संख्या कई सेवाओं में केन्द्रीय प्रमाणीकरण कुंजी बन जाती है, तो कई खतरे पैदा होते हैंः

- डेटा लीकः यदि किसी एक प्लेटफॉर्म में सेंध लग जाती है, तो हमलावर कई एकाउंट से जुड़े मोबाइल नंबर तक पहुंच सकते हैं।

- अवांछित संपर्क या उत्पीड़नः ऑनलाइन उजागर हुए फोन नंबर आसानी से स्पैम, दुर्व्यवहार या पीछा करने के उपकरण बन सकते हैं।

- क्रॉस-प्लेटफॉर्म ट्रैकिंगः कंपनियां या दुर्भावनापूर्ण तत्व एक ही नंबर के जरिये विभिन्न प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ता की गतिविधियों को ट्रैक कर सकते हैं।

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नई प्रणाली लक्षित उत्पीड़न और व्यक्तिगत जानकारी लीक होने के खतरे को और बढ़ा सकती है। यदि किसी व्यक्ति का फोन नंबर उसकी ऑनलाइन उपस्थिति की सार्वभौमिक कुंजी बन जाता है, तो उस नंबर के उजागर होने से एक साथ कई डिजिटल पहचानों का खुलासा हो सकता है। पत्रकारों, कार्यकर्ताओं या राजनीतिक टिप्पणीकारों के लिए - जो अक्सर ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करते हैं - यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर हो सकती है। एक लीक या समझौता किया गया फोन नंबर एक साथ कई मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर उत्पीड़न अभियान का दरवाजा खोल दे सकता है।

नागरिक स्वतंत्रता के पैरोकार निगरानी के विस्तार की संभावना को लेकर भी चिंतित हैं। चूंकि सिम कार्ड केवल ग्राहक को जानें (केवाईसी) सत्यापन के बाद ही जारी किए जाते हैं, इसलिए प्रत्येक सिम पहले से ही एक सत्यापित पहचान से जुड़ा होता है। जब मैसेजिंग खाते स्थायी रूप से इन सिम कार्डों से जुड़ जाते हैं, तो सैद्धांतिक रूप से अधिकारियों को डिजिटल संचार को वास्तविक दुनिया की पहचान से जोड़ने का एक आसान रास्ता मिल जाता है।

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दुग्गल इस बात पर जोर देते हैं कि यह आदेश निजता के अधिकार, अभिव्यक्ति के अधिकार और, बड़े स्तर पर, जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है।

सरकार ने इसे साइबर धोखाधड़ी और घोटालों से निपटने का एक उपाय बताया है। देश में हाल के वर्षों में डिजिटल धोखाधड़ी में भारी वृद्धि देखी गई है, जिसमें 'डिजिटल गिरफ्तारी' घोटाले और सिम-स्वैप धोखाधड़ी शामिल हैं। अधिकारियों का मानना है कि सिम सत्यापन को और सख्त करने से ऐसे अपराधों को कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सिम बाइंडिंग कोई अचूक समाधान नहीं है।

साइबर अपराधी बहुत जल्दी बदलते रहते हैं। इससे अपराध खत्म होने के बजाय, सिम क्लोनिंग जैसे नए रूपों में विकसित हो सकते हैं, जिसमें हमलावर पीड़ित के सिम कार्ड की नकल करके उससे जुड़े खातों तक पहुंच प्राप्त कर लेते हैं। यदि मैसेजिंग की सुविधा पूरी तरह से सिम पर निर्भर हो जाती है, तो सिम क्लोनिंग करना और भी अधिक आकर्षक तरीका बन जा सकता है।

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इसी प्रकार, जालसाज चोरी किए गए या अवैध रूप से प्राप्त किए गए सिम कार्ड का फायदा उठाकर पूरी तरह से सत्यापित डिजिटल पहचान बना सकते हैं।

लाखों भारतीय जो रोजमर्रा के संचार, व्यापार, पत्रकारिता और सामाजिक सक्रियता के लिए मैसेजिंग ऐप्स पर निर्भर हैं, उनके दैनिक जीवन में इसके परिणाम जल्द ही दिखाई देने लग सकते हैं। असली बहस सिर्फ सिम कार्डों के बारे में नहीं है, बल्कि इस बारे में है कि आधुनिक संचार को परिभाषित करने वाली डिजिटल पहचानों पर अंततः किसका नियंत्रण है।

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