विचार

पक रही है प्रतिरोध की नई तहज़ीब

रेसिस्टेंस या प्रतिरोध हकीकत की कोख से उपजे तो हक़ की लड़ाई में तब्दील होता है। वही सत्याग्रह है। यह अधिकार से विराट है। बिना अभ्यास के संभव नहीं। यह प्रेम राजनीति में फिर आ रहा है। बन रही हैं मुहब्बत की दुकानें

तमिलनाडु में ढफली जैसे इस वाद्य यंत्र को परई कहते हैं। लोक कलाकारों ने विरोध के औजार के रूप में इसे अपनाना शुरु किया है
तमिलनाडु में ढफली जैसे इस वाद्य यंत्र को परई कहते हैं। लोक कलाकारों ने विरोध के औजार के रूप में इसे अपनाना शुरु किया है 

विगत दिनों भारतीय राजनीति के पटल पर एक शब्द की पुनर्स्थापना हुई है। इंडिया गठबंधन की बैठक में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष ने “रेसिस्टेंस”का आगाज़ किया। हिन्दी में रेसिस्टेंस को प्रतिरोध कहा जाए या सत्याग्रह। यह बहस हो सकती है। प्रति के मायने नकारात्मक भी होते हैं। मगर इससे इतर कुछ और भी है, जो बहुत सुकून भरा है। भला प्रतिरोध में सुकून कैसा! यह सवाल लाजमी है।

ऐसे में प्रतिरोध से जुड़े बहुत से प्रसंग याद आते हैं। मीराबाई के गीत नृत्य, आंडाल की पंक्तिया, सोयराबाई के अबंग, “अवघा रंग एक झाला” में प्रतिरोध है, तो प्रेम भी है। आखिर आज भी प्रेम से व्यवस्था डरती है ना! प्रेम से बढ़कर क्या ही प्रतिरोध हो सकता है?

रेसिस्टेंस या प्रतिरोध हकीकत की कोख से उपजे तो हक़ की लड़ाई में तब्दील होता है। वही सत्याग्रह है। यह अधिकार से विराट है। बिना अभ्यास के संभव नहीं। इंडिया गठबंधन की बैठक में यह भी रखा गया कि पुरातन तरीकों से प्रतिरोध हो नहीं सकेगा। ज़ाहिर है कि प्रतिरोध एक दिवसीय कार्यक्रम नहीं है। वह सनसनीखेज खबर नहीं है। सालों की तपिश से तैयार होता है। तिस पर भी चौरी चौरा सी घटना घट जाती है। तब सत्यान्वेषी को कहना पड़ता है कि अभी हमारी तैयारी पूरी नहीं थी। हिमालय सी भूल हो गई। यह तैयारी अभ्यास है।

पिछले कुछ वर्षों में रेसिस्टेंस के नए अभ्यास मिले हैं। बहुत प्रयत्नपूर्वक ढूंढे नहीं, पर तार जुड़ते चले गए। यह अभ्यास नवीन नहीं है। पहली बार इजाद नहीं हुए। राजनीतिक भूमि में पुनः दिखाई पड़ने लगे। 2021 में चरखा अभ्यास फिर शुरू हुआ। तब सोचा नहीं था कि किसी दिन यह पूरे देश मे फैलेगा। राजनीतिक प्रतिरोध के स्त्रीगामी,  संपूर्ण रूप से अहिंसक अभ्यास के बतौर इतना इस्तेमाल होगा। बार-बार सूत कट जाता, धागा मोटा या कमजोर बनता। सबको लगता था कि थोड़ा बहुत सूत कातेंगे, माला बनेगी।

फिर कहानी बदल गई। एक दिन महाराष्ट्र की महिला साथी ने चरखे को सार्वजनिक धरने में चलाया। पुलिस ने उससे कहा कि कुछ भी करो, नारे लगाओ, जो मर्ज़ी करो। पर यह मत चलाओ। क्या औपनिवेशी हुकूमत की आदत अभी बदली नहीं, कि लाठी लैस पुलिस चरखे से खौफज़दा हो गई। एक घटना और घटी। सुदूर हिमाचल में मनरेगा बन्दी के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था। धरने से थोड़ी दूरी पर बापू की प्रतिमा थी। गांव की सरपंच रह चुकी महिला को कोई तरज़ीह नहीं दी गई। जबकि उसके कार्यकाल में मनरेगा का काम उस गांव में अभूतपूर्व ढंग से हुआ था। महिला ने किसी से कुछ नहीं कहा। अपना चरखा उठाया और बापू प्रतिमा के नीचे शांति से बैठकर सूत कताई करने लगी। थोड़ी देर में मीडिया, प्रशासन और धीरे-धीरे धरने पर बैठे साथी उसके इर्दगिर्द आकर बैठ गए। उसने इतना कहा कि मजदूर, किसान के पसीने से सूत निकलता है। सो मैं मनरेगा बहाली के लिए यह प्रतिरोध कर रही हूं।

चरखा फिर बन रहा है प्रतिरोध का जरिया

चुनाव आयोग की धांधली, सत्ता गठजोड़ के खिलाफ देश के तीस नगरों में चरखा चला। यह पूछा जा सकता है कि इससे क्या बदला? क्या मिला? चुनाव आयोग नहीं बदला। मगर बदलाव का नूतन अभ्यास मिला। राजनीतिक आंदोलन का व्यवहार बदला। हमेशा नितांत पुरुष प्रधान मांसलता से भरपूर आंदोलन, धरना स्थल कुछ-कुछ स्त्रीगामी हो चला। धरना स्थल पर बराबरी से महिलाएं बैठकर सूत कात सकीं। उनकी नैसर्गिक जरूरत का ध्यान रखा गया। 

ऐसा ही एक सुंदर अभ्यास धीरे-धीरे पक रहा है। क्रांति नाम के महिला शिविर में इसकी छोटी शुरुआत हो रही है। 

दक्षिण भारत के तमिलनाडु में ढफली समान एक वाद्य यंत्र है। यह परई कहलाती है। दुनिया के पहले पहल वाद्य यंत्रों में से एक होगी। यह मरे हुए गौवंश की खाल से बनती है। ज़ाहिर है कि सदियों तक यह केवल दलित समुदाय के द्वारा ही बजता था। मंदिर के सामने, सार्वजनिक त्यौहार और किसी प्रतिष्ठित की मृत्यु पर बजता था। उन्हें तिरस्कार के साथ परिया कहते थे और वाद्य यंत्र परई कहलाया। उस समुदाय का मुख्य गांव में प्रवेश नहीं था। वे मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ सकते थे। सार्वजनिक कुएं का प्रयोग नहीं कर सकते थे। उनकी शव यात्रा भी मुख्य गांव से नहीं गुजर सकती थी। आज भी कमोबेश यही परिस्थिति है। हालांकि अब वह कानूनी जुर्म है।

कई सुधारकों, जनवादी संगठनों ने परई का प्रयोग प्रतिरोध के लिए करना आरंभ किया है। मगर राजनीतिक हलकों में अब भी नहीं इस्तेमाल होता। गोयाकि इस शिविर में सभी क्षेत्र जाति धर्म वर्ग की महिलाएं सहभाग कर रही थीं। परई सिखाने वाली अभ्यर्थी दलित समुदाय की क्रांतिकारी साथी है। तमिल भाषी है। शिविर में अधिकांश साथी तमिल बिल्कुल नहीं समझते थे। सो भाषाई विघ्न था। फिर परई देखकर खुसुर-फुसुर शुरू हुई। खाल गौवंश की है तो कैसे हाथ लगाए। वह तो अशुद्ध होता है। हर महीने तीन दिन खुद अशुद्धता का लेबल लगाने के लिए मजबूर स्त्री भी सदैव अशुद्ध माने जाते हाशिये पर खड़े समुदाय के प्रति बिन अभ्यास संवेदनशील नहीं होती।

दो दिन बहाने चले। हाथ में तकलीफ है, कैसे इतना भारी यंत्र पकड़े। फिर दलित स्त्री से कुछ सीखना भी जाति प्राधन्य समाज के लिए सहज नहीं था। सिखाने वाली साथी पूरे स्नेह, सब्र से बस बजाती रही। तीसरे दिन परई की कहानी वीडियो द्वारा देखने के बाद कुछ पिघलने लगा। उसी दिन देवदासी स्त्रियों से बातचीत हुई। तमाम अशुद्धि के बोध आंसू बनकर बह चले। ह्रदय शुद्ध हो गया। उस शाम सबने परई उठाई और मैदान गूंज उठा। सबने दो कदम नृत्य के भी बोल सीखे। जैसे एक भेद से जूझते समूह ने दूसरे समूह को थामा हो। सिखाने वाली साथी को उस दिन कोई भाषाई अड़चन महसूस नहीं हुई।

परई ने अपनी एक भाषा ढूंढ ली थी। वह भाषा से परे हो गई। सिखाने वाली अभ्यर्थी ने कहा कि आज जब सहभागी महिलाओं ने परई को दोनों हाथों से थामा, उसे लगा जैसे सदियों के भेद को धकेलकर गले लगाया हो। उसे अंगीकार किया हो। उस दिन सबकी आंखें नमती रहीं। भेद, बोध बहता रहा। फिर कर्नाटक के लोक गायक ने गीत गाया- “ कट्टुतेवा”

माने भीतर की गुलामी डर को ललकारो, आओ कुछ निडर बनाएं। निडरता प्रेम से जगती है। वही शाश्वत प्रतिरोध है। बहरहाल प्रतिरोध की नई तहज़ीब पक रही हैं। अभ्यास बन रहा है।

दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का ढाई सौवां मना। मगर वह आज़ाद कहां? ढाई आखर प्रेम बिना। यह प्रेम राजनीति में फिर आ रहा है, मुहब्बत की दुकान बन रही हैं। प्रतिरोध के अभ्यास में।