
केंद्र में बैठी मोदी सरकार के दुष्प्रचारों की कोई सीमा नहीं है। निर्बाध, धाराप्रवाह और बेशर्म झूठ ही इस सरकार की विशेषता है। दिल्ली में विधानसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री मोदी के मुस्कराते चित्र से सजे एक पोस्टर में कहा गया था कि जिस तरह गुजरात में साबरमती नदी साफ की उसी तरह दिल्ली में यमुना को भी साफ करेंगे। तथ्य यह है कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार मोदी जी की तथाकथित साफ नदी, साबरमती, देश में तीसरे नंबर की सबसे प्रदूषित नदी है।
इसी तरह वर्ष 2014 से लगातार विकास के गुजरात मॉडल की चर्चा मोदी सरकार करती रही है, जबकि तथ्य यह है कि आर्थिक और सामाजिक विकास के अनेक पैमानों पर यह सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। भूख और कुपोषण के मामले में गुजरात राज्यों की सूची में अंतिम स्थान से चार स्थान ऊपर है। गुजरात में महिलाओं में खून की कमी सबसे अधिक है और यहां ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रति माह खर्च देश के औसत से भी नीचे है।
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राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट, पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, देश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह औसत खर्च 4122 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 6996 रुपये है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अंतर 70 प्रतिशत है। गुजरात में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति खर्च देश के औसत से कम, 4116 रुपये है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह राष्ट्रीय औसत से अधिक यानि 7175 रुपये है। इससे इतना तो स्पष्ट है कि गुजरात मॉडल में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी अधिक है और ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में अंतर अधिक विकराल है।
गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा पर लोग कुल मासिक खर्च में से औसतन 3.81 प्रतिशत ही करते हैं जो किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे कम है। इस संदर्भ में देश का औसत 6.11 प्रतिशत है और बिहार जैसे राज्य में भी शिक्षा पर औसतन 6.76 प्रतिशत खर्च किया जाता है।
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गुजरात मॉडल में ओबीसी समुदाय का बुरा हाल है। देश में ओबीसी ग्रामीण आबादी हरेक महीने औसतन 4206 रुपये खर्च करती है और शहरी आबादी 6738 रुपये। पर, गुजरात के लिए यह आंकड़ा क्रमशः 4008 रुपये और 6415 रुपये ही है। गुजरात की यह स्थिति तब है जबकि अपने आप को पिछड़े समुदाय का प्रतिनिधि और रहनुमा घोषित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय तक वहां के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अब एक दशक से अधिक इस देश के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हैं। गुजरात के शहरी क्षेत्रों में एसटी समुदाय भी देश के औसत से नीचे है। एसटी समुदाय द्वारा शहरी क्षेत्रों में हरेक महीने खर्च की जाने वाली औसत राशि 6030 रुपये है पर गुजरात में यह समुदाय महज 5837 रुपये ही खर्च कर पाता है।
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देश में ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि कार्यों में काम करने वाले श्रमिक हरेक महीने औसतन 5005 रुपये खर्च करते हैं जबकि गुजरात में श्रमिक 4589 रुपये ही खर्च कर पाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र में काम करने वाले कैजुअल श्रमिकों द्वारा प्रति माह औसतन 3652 रुपये खर्च किया जाता है, पर गुजरात में यह राशि महज 3441 रुपये ही है। गुजरात के शहरी क्षेत्रों में भी कामगारों द्वारा किया जाने वाला खर्च राष्ट्रीय औसत से कम है। सैलरी वाले श्रमिकों का राष्ट्रीय औसत 7606 रुपये है जबकि कैजुअल श्रमिकों का औसत 4964 रुपये है। गुजरात के लिए यह राशि क्रमशः 7296 और 4856 रुपये ही है।
राष्ट्रीय सर्वेक्षण कार्यालय की रिपोर्ट- भारत में पौष्टिक अंतर्ग्रहण 2022-23 और 2023-24 के अनुसार, गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण का स्तर गिरता जा रहा है और यह राष्ट्रीय औसत से भी नीचे है। वर्ष 2022-23 और 2023-24 के लिए देश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति कैलोरी के उपभोग का औसत क्रमशः 2233 और 2212 किलोकैलोरी है। गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति भोजन पर किया जाने वाला खर्च राष्ट्रीय औसत से अधिक है पर कैलोरी का उपभोग क्रमशः 2165 और 2105 किलोकैलोरी ही है। गुजरात के शहरी क्षेत्रों में पोषण का स्तर राष्ट्रीय औसत से अधिक है और यह बढ़ता भी जा रहा है।
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नीति आयोग की रिपोर्ट, सस्टैनबल डेवलपमेंट गोल्स इंडिया इंडेक्स 2023-24, भी गुजरात की बदहाली दर्शाती है। इसके अनुसार, गुजरात की 11.66 प्रतिशत आबादी बहु-आयामी गरीबी की चपेट में है। यहां की 62.5 प्रतिशत सक्रिय महिलायें खून की कमी, अनेमिया की चपेट में हैं और यह दर देश के सभी राज्यों की तुलना में अधिक है। भूख और कुपोषण संबंधित इंडेक्स में गुजरात अंतिम चौथे स्थान पर है, इस संदर्भ में देश का औसत अंक 52 है पर गुजरात के महज 41 अंक ही हैं। गुजरात में 5 वर्ष से कम उम्र के कुल बच्चों में से 39.7 प्रतिशत सामान्य से कम वजन वाले हैं जबकि 39 प्रतिशत बच्चों की लंबाई सामान्य से कम है।
देश के प्रधानमंत्री जी के विकास की परिभाषा में जनता कहीं नहीं रहती– देश की अर्थव्यवस्था का आकार, धार्मिक आयोजन, सड़कों जैसा इंफ्रास्ट्रक्चर और अरबपतियों के बड़े उद्योग ही उनके लिए विकास के पैमाने हैं, गुजरात मॉडल है। इस विकास को ही मीडिया दिनरात प्रचारित करता है। इस विकास से ही आर्थिक असमानता भयावह स्थिति में पहुंच गई है। देश के अरबपति लगातार और अमीर होते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीब पाताल तक पहुंच चुका है।
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आजकल सोशल मीडिया पर फैलाने जाने वाले झूठ की खूब चर्चा की जा रही है। सरकार से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक इससे परेशान नजर आ रहे हैं। पर, इसी देश में सत्ता ने जो झूठ और फरेब का जाल बुना है और जिसे मीडिया लगातार प्रचारित कर रहा है, उससे सभी बेखबर हैं। इसी झूठ का आलम है कि देश में सच उगलने वाले हरेक व्यक्ति को सरकार और तमाम संवैधानिक और न्यायिक संस्थाएं अपना दुश्मन समझती हैं, उसे देश का दुश्मन करार देती हैं और फिर सलाखों के पीछे डाल देती हैं। झूठ और ध्रुवीकरण ही बीजेपी की शक्ति है, उसे सच से परहेज है– सच बोलने वाले अर्बन नक्सल हैं।
बीजेपी शासन में जिसे विकास कहा जाता है, उसका रास्ता आम जनता के कब्र के ऊपर से जाता है। इसमें पूंजीपति ही आगे बढ़ते हैं और पूंजीपतियों का मीडिया इसकी जयकार करता है।इसमें गरीबों की जमीन पर आकाश अंबानी वैध-अवैध कारोबार करते हैं और अडानी सुर-ऊर्जा का कारोबार करते हैं। गरीब कुपोषण और भूख से पिसते हैं और सत्ता इसे गुजरात मॉडल के नाम से प्रचारित करती है।
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