विचार

आकार पटेल का लेख: बहुसंख्यकवाद हमेशा एक दुश्मन ढूंढ लेता है

भारत इस मामले में सौभाग्यशाली था कि यहां पहले कुछ दशकों में नेहरू की उस कांग्रेस पार्टी ने शासन किया जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करता था।

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फोटो: Twitter@Khalsa_Aid अल्पसंख्यकों के खिलाफ धार्मिक और जातीय बहुसंख्यक इकट्ठा हो जाते हैं

उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय उपमहाद्वीप में यह परंपरा रही है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ धार्मिक और जातीय बहुसंख्यक इकट्ठा हो जाते हैं।

श्रीलंका में सिंहला भाषी बौद्धों ने धर्म और भाषा के नाम पर वहां रहने वाले तमिल लोगों से लड़ाई लड़ी। भारत में हमें आश्चर्य होता है कि कैसे बौद्ध और हिन्दू एक-दूसरे से नफरत करते हैं, लेकिन बहुसंख्यकवाद का यही चरित्र है। यह हमेशा एक दुश्मन ढूढ़ लेता है। श्रीलंका का गृह-युद्ध लगभग 25 सालों तक चला इसने भारत के राजीव गांधी और कई तमिल नेताओं समेत लाखों लोगों की जान ले ली। यह शिविरों में रह रहे तमिल लोगों पर एक क्रूर हमले में खत्म हुआ जहां कई नागरिक भी मौजूद थे।

बांग्लादेश का शुरूआती राष्ट्रवाद भाषा पर आधारित था और इसने बंगाली मुसलमानों और हिंदुओ को पश्चिमी पाकिस्तान के सैन्यवाद और उर्दू थोपे जाने के खिलाफ एकताबद्ध किया। आशचर्यजनक रूप से, गुजराती मूल के और बहुत कम उर्दू जानने वाले मोहम्मद अली जिन्ना बंगालियों पर उर्दू थोपना चाहते थे।

प्रतिरोध में हुई हिंसा ने 1971 में भारत की मदद से पश्चिमी पाकिस्तान की सेना को बाहर निकाल दिया। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से बांग्लादेशी राष्ट्रवाद का एक पहलू उसके बाद धार्मिक हो गया। संविधान का इस्लामीकरण करने की कोशिशें की गईं और अभी भी की जा रही हैं। राजनीति का विभाजन धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिक के बीच हो गया। इस संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का मतलब हुआ कि एक मुस्लिम पार्टी हिंदुओं को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती थी और एक दूसरी मुस्लिम पार्टी जमायत-ए-इस्लामी जैसे धार्मिक कट्टरतावादियों के साथ खड़ी थी। लगभग 10 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी ने मुख्यधारा की राजनीति का सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया। निश्चित तौर पर हम इस पूरे तौर-तरीके से वाकिफ हैं। पाकिस्तान में शुरूआती बहुसंख्यकवाद को जिन्ना द्वारा कम करने की कोशिश की गई। लाहौर के पंजाबी मुसलमानों ने जब उत्तर भारत के बिहार-यूपी के विस्थापित मुसलमानों को स्वीकार करने से मना कर दिया तो उन परिवारों को कराची में बसाया गया। वहां के शहरी और समृद्ध हिन्दू आबादी के खिलाफ हिंसा शुरू हुई जिन्हें हम आज अपने सिंधी लोगों के रूप में जानते हैं। जिन्ना ने कुछ भाषण दिए जिनमें छोड़कर जा रहे हिंदुओं को रोकने की कोशिश की गई क्योंकि वे चाहते थे कि अल्पसंख्यक वहीं रहें। लेकिन बड़े पैमाने पर हो रही हिंसा ने उनका मन बदल दिया और उन्होंने अपनी समस्याओं के लिए भारत पर दोष मढ़ते हुए विस्थापित हो रहे सिंधियों को रोकना बंद कर दिया। जिन्ना ने आजादी के कुछ दिनों पहले एक प्रसिद्ध भाषण दिया था जिसमें उन्होंने यह इशारा किया था कि वे एक धर्मनिरपेक्ष संविधान चाहते हैं। जिन्ना ने कहा था कि राज्य को धर्म के आधार पर नागरिकों की पहचान नहीं करनी चाहिए और उन्होंने कानून की नजर में सभी नागरिकों की समानता पर जोर दिया था।

वे पूर्ण अधिकार से शासन कर रहे थे और इससे पहले कि संविधान सभा ऐसे किसी कानून को जामा पहनाती, एक साल बाद ही उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के बाद पाकिस्तान आंदोलन की प्राकृतिक दिशा काबिज हो गई और कानून का इस्लामीकरण शुरू हो गया। 1960 के दशक में अय्यूब खान के नेतृत्व में यह तय हुआ कि कोई गैर-मुस्लिम पाकिस्तान का राष्ट्रपति नहीं हो सकता। 1970 के दशक में जुल्फिकार अली भुट्टो के शासनकाल में एक कानून आया जिसके अनुसार किसी गैर-मुस्लिम के पाकिस्तान का प्रधानमंक्षी बनने पर रोक लग गई।

Published: 22 Apr 2018, 9:59 AM IST

1980 के दशक में जिया-उल-हक के जमाने में कई इस्लामिक कानून पारित हुए, जिनमें लोगों के शराब पीने पर पाबंदी और अपराध साबित न कर पाने की स्थिति में बलात्कार पीड़ित को ही जेल में डालना शामिल है। इसके अलावा अगर हत्यारा पीड़ित के परिवार को खून के पैसे चुका देता है तो उसे छोड़ देने के लिए भी एक कानून बना। 1990 के दशक में नवाज शरीफ ने इस्लामिक कानून पास करने की कोशिश की जो कुख्यात 15वें संशोधन के नाम से भी कुख्यात है। इसके अनुसार उन्हें स्थायी शासक बना दिया जाता। इस तरह की कोशिशों ने पूरी राजनीति को ही अपनी जद में ले लिया।

इसके थोड़े समय बाद, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों द्वारा ब्याज लेने पर रोक लगा दी और कहा कि यह गैर-इस्लामी है। शरीफ को हाल में ही प्रधानमंत्री का पद छोड़ना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट ने उनके राजनीति करने पर स्थायी रूप से रोक लगा दी है। इस फैसले के लिए कोर्ट ने उस कानून का सहारा लिया जो ‘अच्छे मुसलमान’ के गुण बताता है।

भारत इस मामले में सौभाग्यशाली था कि यहां शुरुआती कुछ दशकों में नेहरू की उस कांग्रेस पार्टी ने शासन किया जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करता था। हमारे संविधान में कुछ उच्च-जाति हिन्दू बहुसंख्यकवाद से जुड़े पहलू हैं, खासतौर पर निदेशात्मक सिद्धांतों के चौथे खंड में। जैसे कि गो-हत्या और शराबबंदी (आदिवासी नजरिया रखने वाले कांग्रेस नेताओं ने इसका विरोध किया था)। लेकिन संविधान का ज्यादातर हिस्सा धर्मनिरपेक्ष है और यह दक्षिण एशिया का सबसे बेहतर संविधान है। नेहरू और कांग्रेस की सबको साथ लेकर चलने वाली प्रवृति यहां खत्म नहीं हुई।

आज भारत के प्रधानमंत्री दुनिया को बताते हैं कि उन्होंने अंबेडकर को कांग्रेस से ज्यादा सम्मान दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि कांग्रेस ने अंबेडकर को संविधान सभा में जगह दी और उन्हें कैबिनेट में शामिल किया, बावजूद इसके कि वे चुनाव हार गए थे। कांग्रेस को संसद में दो-तिहाई बहुमत था, इसके बावजूद जन संघ नेता एसपी मुखर्जी को भी कैबिनेट में शामिल किया गया।

कांग्रेस के शासनकाल के पहले कुछ दशकों ने इस तथ्य को छुपाया कि हम भारतीय भी श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अपने भाईयों की तरह ही हैं। हममें एक बहुसंख्यकवादी प्रवृति है जो मजबूत है और आज अल्पसंख्यकों के खिलाफ खड़ी है। मेरे कहने का जो अर्थ है मुझे उस बात को उदाहरण से समझाने की जरूरत नहीं है। किसी दिन के भी अखबार को देखने भर से सारे तथ्य सामने आ जाएंगे।

हिंदुत्ववादी नेताओं और बौद्धिकों का दावा है कि हमारा बहुसंख्यकवाद पूर्व-सक्रियता में विश्वास नहीं करता, बल्कि प्रतिक्रियात्मक है। दावा यह है कि हम जो कर रहे हैं वह सही है और यह उस जैसा नहीं है जो दक्षिण एशिया के दूसरे भागों में हो रहा था या हो रहा है।

लेकिन निश्चित तौर पर इनमें कोई अंतर नहीं है।

Published: 22 Apr 2018, 9:59 AM IST

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Published: 22 Apr 2018, 9:59 AM IST