
‘कूटनीति’ को जब अपना यह नाम नहीं मिला था, उससे बहुत पहले से ही भारत और ईरान संवाद में थे। सिंधु घाटी का प्राचीन फ़ारस के साथ लाजवर्द (लैपिस लाजुली) और हाथीदांत का व्यापार था। संस्कृत और अवेस्ता भाषाओं की जड़ें एक ही हैं। भारत की अदालतों, जमीन के रिकॉर्ड, संगीत और हिन्दी भाषा पर आज भी फ़ारसी असर दिखता है। इसीलिए, नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा ईरान को अचानक छोड़ देना न सिर्फ विदेश नीति की विफलता; बल्कि एक ‘सभ्यतागत विश्वासघात’ भी है, जिस पर न कोई विचार हुआ, न कोई घोषणा हुई। यह भी नहीं कि तेहरान या भारत की जनता को इसका कोई स्पष्टीकरण दिया जाता।
भारत और ईरान के बीच मतभेद रहे हैं, लेकिन पहले कभी ऐसा नहीं देखने में आया कि कूटनीतिक माध्यमों को दरकिनार करते हुए दोनों देशों के रिश्तों को इस तरह अचानक और गुपचुप, एकदम नए तरीके से परिभाषित किया गया हो।
1947 में भारत की आजादी से एक ढांचागत विभाजन पैदा हुआ। ईरान, जो भारत का एकदम पड़ोसी था, अब उसकी सीमाएं भारत से दूर हो गई थीं; पाकिस्तान इन दोनों देशों के बीच आ गया था।
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शाह का ईरान पूरी तरह पश्चिमी खेमे में था, जबकि जवाहरलाल नेहरू का भारत गुटनिरपेक्ष। ईरान-इराक युद्ध में जब भारत ने इराक का साथ दिया, दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़ गए। हैरानी यह कि 1979 में खोमैनी की इस्लामी क्रांति ने ही इन रिश्तों के लिए फिर दरवाजा खोला। अब दोनों ही देश अमेरिका के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर थे, और दोनों के पास ही पाकिस्तान की बढ़ती क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को चिंता के साथ देखने के अपने-अपने कारण थे।
भारत और ईरान के रिश्ते फिर से मजबूत करने में अफगानिस्तान की भी भूमिका रही। 1996 से 2001 के बीच जब अफगानिस्तान में तालिबान अपनी सत्ता जमा रहा था, भारत और ईरान इस लड़ाई में एक ही पाले में खड़े थे। पाकिस्तान की मिलिट्री इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई तालिबान की मुख्य समर्थक थी। भारत और ईरान ने रूस के साथ मिलकर ‘नॉर्दर्न अलायंस’ को राजनीतिक समर्थन, आर्थिक मदद और हथियार मुहैया कराए। यह महज कागजी बयानों या संयुक्त घोषणाओं की कूटनीतिक चमक-दमक वाली साझेदारी नहीं थी; बल्कि साझा दुश्मनों और आपसी हितों पर आधारित ठोस एकजुटता थी।
1994 में, 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की पृष्ठभूमि में, पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ ‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ (ओआईसी) को लामबंद करने की कोशिश की। ईरान ने ओआईसी की आम सहमति को रोक दिया और एक इस्लामी गणराज्य ने पाकिस्तान के बजाय भारत को चुना। तब से, तेहरान ओआईसी में नई दिल्ली की ढाल बना रहा है।
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अफगानिस्तान में मची उथल-पुथल ने भारत को वह चीज वापस दिला दी, जो बंटवारे में उसके हाथ से निकल गई थी- यानी पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए मध्य एशिया तक पहुंचने का रास्ता।
साल 2015 में, चीन ने ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे’ (सीपीईसी) के जरिये भारत के पश्चिमी हिस्से में अपनी स्थायी जगह बना ली। उसने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को अपने समुद्री केन्द्र के तौर पर चुना और पूरे एशिया में चीन-केन्द्रित आर्थिक ढांचा खड़ा करने के लिए ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) की रूपरेखा बनाई; जिसका मकसद निर्भरता का ऐसा भरोसा उत्पन्न करना था जो सरकारों के बदलने के बाद भी न टूटे।
भारत का जवाब था चाबहार, जो पाकिस्तान की जमीन का एक भी मील पार किए बिना भारत को अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच देता है। इससे भी ज्यादा अहम बात यह कि चाबहार 7,200 किलोमीटर लंबे मल्टी-मॉडल नेटवर्क, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) का प्रवेश द्वार है, जो मुंबई को तेहरान और बाकू होते हुए मॉस्को से जोड़ता है। भारत, ईरान और रूस ने साल 2000 में आईएनएसटीसी समझौते पर दस्तखत किए थे। पूरी तरह चालू हो जाने पर, यह कॉरिडोर माल ढुलाई का समय 40 दिन से घटाकर 20 दिन कर देगा और ट्रांसपोर्ट की लागत में भी 30 प्रतिशत की कटौती हो जाएगी। इस तरह यह भारत को मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक पहुंचने के लिए एक अहम व्यापारिक रास्ता देगा, जो पाकिस्तान और चीन के पसंदीदा रुकावट वाले पॉइंट्स को दरकिनार कर देगा।
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चाबहार महज एक बंदरगाह नहीं है। यह भारत की विदेश नीति संरचना का ऐसा अहम हिस्सा है, जिसके जरिये वह चीन के सीपीईसी और बीआरई का जमीनी स्तर पर मुकाबला कर सकता है; यह भारत के लिए जाहिर करने का एक जरिया भी है कि वह चीन-पाकिस्तान गठजोड़ की वजह से जमीन से घिरा हुआ नहीं रहेगा। भारत की रणनीतिक सूची से बस चाबहार को हटा दीजिए, भारत अपनी पश्चिमी कनेक्टिविटी की बढ़त बीजिंग और इस्लामाबाद के हाथों हमेशा के लिए खो देगा, और इसका कोई विकल्प नहीं है।
इसीलिए, आने वाली हर सरकार चाबहार प्रोजेक्ट का समर्थन करती रही। 2012 में तेहरान की यात्रा के बाद, मनमोहन सिंह सरकार ने इसके विकास के लिए 100 मिलियन डॉलर देने का वादा किया। मोदी ने भी 2016 में तेहरान का दौरा किया और ‘शहीद बेहेश्ती टर्मिनल’ समझौते पर हस्ताक्षर किए। भारत ने मई 2024 में इस टर्मिनल का ऑपरेशनल कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। मोदी ने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया, और यह वाकई एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
जब 2011-12 में अमेरिका और यूरोपीय संघ ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए और ईरानी बैंकों को वैश्विक डॉलर प्रणाली से अलग कर दिया, तब डॉ. मनमोहन सिंह ने दिखाया कि एक संप्रभु विदेश नीति कैसी होती है। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि प्रतिबंधों के बावजूद भारत ईरान से तेल का आयात जारी रखेगा, और इसके बाद उन्होंने तेहरान के लिए एक व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भेजने की घोषणा कर दी।
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मार्च 2012 में, ईरानी बैंकों को ‘स्विफ्ट’ फाइनेंशियल मैसेजिंग नेटवर्क से अलग कर दिया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेन-देन की एक वैश्विक प्रणाली है। डॉ. सिंह ने यूको बैंक के जरिये ‘रुपया-रियाल भुगतान तंत्र’ बनाकर इस कदम को चुनौती दी। इसके तहत तेल का लेन-देन पूरी तरह डॉलर प्रणाली से बाहर और वॉशिंगटन की पहुंच से दूर रखा गया। इससे जो अतिरिक्त राशि जमा हुई, उसका इस्तेमाल भारतीय निर्यातकों को अरबों रुपये का बकाया भुगतान निपटाने के लिए किया गया। बाद में, जब 2022 के बाद भारत को रूस के साथ व्यापार की जरूरत पड़ी, तो यही वित्तीय ढांचा काम आया।
मनमोहन सिंह की ईरान नीति ने भारत की, प्रतिबंधों का सामना करने में सक्षम व्यापार प्रणाली का बुनियादी ढांचा तैयार किया।
पश्चिमी देशों का दबाव चरम पर होने के बावजूद, उन्होंने अगस्त 2013 में राष्ट्रपति रूहानी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए, तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी (जो तेहरान में पूर्व राजदूत रह चुके थे) को भेजा। बिना किसी शब्द के संदेश बहुत स्पष्ट था- भारत ने ईरान का साथ नहीं छोड़ा है। रणनीतिक स्वायत्तता इसी को कहते हैं।
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2019 में, ट्रंप के दबाव के आगे झुकते हुए, भारत ने ईरान से कच्चे तेल का सारा आयात रोक दिया। उस समय ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर था, और भारत की कुल तेल खरीद में उसका हिस्सा 16.5 प्रतिशत था। ईरानी तेल के साथ माल ढुलाई में छूट, भुगतान की अनुकूल शर्तें और डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं में भुगतान की सुविधा मिलती थी; इसे छोड़ने से भारत को अरबों का नुकसान हुआ। फिर भी, चाबहार परियोजना अपने तय रास्ते पर चलती रही और दोनों देशों की दोस्ती भी कायम रही। हाल ही में 25 फरवरी 2026 को, ईरान ने विशाखापत्तनम में आयोजित भारत के ‘मिलन 2026’ नौसैनिक अभ्यास में भी हिस्सा लिया।
26 फरवरी को जब प्रधानमंत्री मोदी इसराइल गए, तो सब कुछ बदल गया। दो दिन बाद, जब ईरान के खिलाफ अमेरिका-इसराइल का युद्ध शुरू हुआ, भारत के रुख में एक स्पष्ट बदलाव देखने को मिला। उसने ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा नहीं की। उसने ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या पर शोक नहीं जताया। ‘मिलन 2026’ युद्धाभ्यास से लौट रहे ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस देना’ को जब श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो से निशाना बनाया, तब भारत की प्रतिक्रिया महज ‘मानवीय खोज और बचाव’ तक सीमित रही। भारत का एक मेहमान, भारत की ही चौखट पर हमले का शिकार हुआ, लेकिन भारत ने उससे आंखें फेर लीं। यह भारत की नीति नहीं थी।
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अमेरिकी दबाव में आकर, मोदी सरकार ने 2026-27 के केन्द्रीय बजट में चाबहार के लिए फंडिंग शून्य कर दी। ईरान के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार गिरकर 1.68 अरब अमेरिकी डॉलर पर आ गया। चाबहार में किया गया भारत का बुनियादी ढांचा निवेश एक बेकार संपत्ति बनने के जोखिम में है, जिसे चीनी या रूसी ऑपरेटरों को सौंपा जा सकता है। जो बंदरगाह भारत ने चीन से मुकाबले के लिए बनाया था, संभव है अंतत: उसका संचालन चीन को ही मिल जाए।
मोदी के इस अचानक घुटने टेक देने का मतलब है कि भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का अपना एकमात्र स्वतंत्र स्थलीय प्रवेश द्वार खो देगा। अरब सागर से लेकर कैस्पियन सागर तक फैला पूरा आईएनएसटीसी कनेक्टिविटी गलियारा इसकी चपेट में आ गया है।
अमेरिका ने यह खुला संकेत दिया है कि रूसी तेल खरीदने के लिए भारत को उसकी अनुमति की जरूरत है। समझना होगा कि यह किसी उभरती हुई शक्ति की विदेश नीति नहीं है; यह तो किसी आश्रित राष्ट्र की विदेश नीति है।
अब अगर भारत ईरान का साथ छोड़ देता है, तो वह चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ के मुकाबले अपने एकमात्र भौगोलिक, बुनियादी ढांचागत और रणनीतिक विकल्प को खो देगा। यह एक रणनीतिक ‘सेल्फ-गोल’ (आत्मघाती कदम) साबित होगा, और इतिहास इसे इसी रूप में दर्ज करेगा।
(गुरदीप सिंह सप्पल कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य हैं)
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