
हाल में ही किसी सामाजिक विश्लेषक ने कहा था कि भारत में जनता को स्वाभाविक तौर पर गुलामी पसंद है। आज देश के हालात देखकर यह कथन बिल्कुल सटीक नजर आता है। मोदी और सत्ता एक दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं, मोदी से प्रश्न पूछना देश का अपमान करार दिया जाता है। वर्ष 2014 से पहले मोदी की उपलब्धि जनता की नजर में विकास वाली नहीं थी, बल्कि ध्रुवीकरण और एक वर्ग-विशेष के लिए जहर उगलने वाली थी। जनता के लिए सामाजिक सौहार्द्र कुछ नहीं है बल्कि उसे हिंदुओं का प्रचारक चाहिए था। इसीलिए सत्ता द्वारा लगातार कुचले जाने के बाद भी जनता खामोश है, उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समृद्धि नहीं बल्कि झूठ, शोषण और हिंसा चाहिए। यही बीजेपी की राजनीति का आधार भी है।
बीजेपी जिस विकास की बात करती है, दरअसल वह मानसिक गुलामी की पराकाष्ठा है।मानसिक गुलामी केवल जनता में ही नहीं है, बल्कि इसका अभूतपूर्व विस्तार न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के साथ ही मीडिया में भी है। इन सबके बीच पुलिस ने तो अंग्रेजों की पुलिस को भी बर्बरता में मात कर दिया है। अंग्रेजों के समय जनरल डायर बस एक थे, आज तो हरेक थाने में कई हैं। बलात्कारी और हत्यारा पुलिस संरक्षण में ऐयाशी करता है, राज्यपाल बना दिया जाता है और सरकार के विरोध में आवाज उठाते लोग देशद्रोही और घुसपैठिए करार दिए जाते हैं। जी हुजूरी की आदत इस कदर पड़ गई है कि अब तो बेरोजगारी, गरीबी और महंगाई का भी लोग समर्थन करने लगे हैं। अब तो तिरंगा यात्रा का अधिकार भी केवल बीजेपी को ही है।
लगातार सत्ता हासिल करने के बाद भी बीजेपी सरकारों की हालत यह है कि उनके पास कोई उपलब्धि ही नहीं है, जिसकी वे चर्चा कर सकें– प्रधानमंत्री से लेकर छुटभैये नेता भी बोलते तो खूब हैं पर यह केवल विपक्ष के बारे में झूठ से सना रहता है। यही झूठ बीजेपी, उर्फ मोदी को, वर्ष 2014 में सत्ता में लाया था। इसके बाद वर्ष 2019 में झूठ के साथ ही पैसे के बल पर विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त और ईवीएम पर नियंत्रण से बीजेपी फिर से सत्ता में पहुंची। वर्ष 2024 के चुनावों तक जनता की नींद कुछ खुली और मोदी उर्फ बीजेपी बहुमत से बाहर हो गए। पैसों के बल पर सरकार तो बन गई, पर अगले चुनावों तक सत्ता से बाहर जाने का भय सताने लगा।
सत्ताजीवी बीजेपी को अगली बार सत्ता में आने का एकमात्र तरीका मतदाता सूची के पुनरीक्षण में ही नजर आया। इसके लिए एक निहायत ही आज्ञाकारी लेकिन शातिर व्यक्ति की जरूरत थी, जो सत्ता पर काबिज आकाओं की आकांक्षाओं का और निर्देशों का चरणों में लोटकर पालन करता रहे। ऐसे व्यक्ति के चयन के लिए जरूरी था कि मोदी के भक्तों के अलावा चयन के समय और कोई ना हो। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष के प्रतिनिधियों को रास्ते से हटाना जरूरी था– इस तरह ज्ञानेश कुमार का उदय हुआ।
फिर, मोदी को यह डर भी सताने लगा कि यदि कभी तमाम घपलों के बारे में ज्ञानेश कुमार ने उगल दिया तो फिर क्या होगा– इसीलिए पूरे विपक्ष को संसद सत्र से बाहर कर ज्ञानेश कुमार को एक अभूतपूर्व सुरक्षा कवच दिया गया। जैसा कि अनुमान था, पूरी असंवैधानिक प्रक्रिया पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अभूतपूर्व मौन रखा। अब तो सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट बता दिया है कि कानून व्यवस्था से उसका कोई लेनादेना नहीं है। देश की आम जनता को भी बीजेपी द्वारा पूरे चुनावी प्रक्रिया के खुलेआम अपहरण में कहीं कोई दोष नजर नहीं आता।
मतदाता सूचि को ही बीजेपी ने चुनाव आयोग के माध्यम से चुनावों को जीतने का हथियार बना लिया। कहीं-कहीं चुनाव हार का दिखावा भी किया, जिससे दुनिया को भारत में निरंकुश शासन नहीं बल्कि लोकतंत्र का एहसास हो, और विपक्ष पर हमले का मौका मिल सके। इस सूची के पुनरीक्षण के नाम पर सत्ता की मर्जी से नाम जोड़े गए, नाम काटे गए, कहीं-कहीं चुनाव से ठीक पहले नाम जोड़े गए और चुनाव के ठीक बाद इससे अधिक नाम काट दिए गए। चुनाव आयोग का पुनरीक्षण ही संदिग्ध हो ऐसा नहीं है, इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग नष्ट हो जाती है, मतदान प्रतिशत दो दिनों बाद बदल जाते हैं, ईवीएम जल जाती है, ईवीएम नेताओं के निजी वाहन में मिलती है, चुनाव आयोग विपक्षी नेताओं की शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं करता, बीजेपी नेताओं की हेटस्पीच और भड़काऊ भाषणों के दौरान चुनाव आयोग बहरा हो जाता है– पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग पूरी तरह सत्तामय हो गया है।
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विपक्षी दलों द्वारा मतदाता सूची के पुनरीक्षण के तीन चरणों में 13.39 करोड़ मतदाताओं के नाम काटने को लेकर प्रश्न करने के बाद हाल में चुनाव आयोग ने इसकी सफाई दी है। इसके अनुसार 13.39 करोड़ कटे नामों में से 2.80 करोड़ की मृत्यु हो गई, 3.01 करोड़ पते पर उपस्थित नहीं थे, 6.30 करोड़ अपने पते से कहीं और स्थायी तौर पर शिफ्ट हो गए और 1.02 करोड़ के पास दो या अधिक मतदान पत्र थे।
चुनाव आयोग ने इन गलत-सही आंकड़ों को प्रस्तुत कर अपना काम पूरा कर दिया और बीजेपी का हरेक प्रवक्ता और नेता इन आंकड़ों को दुहरा रहे हैं। पर, इन आंकड़ों पर गौर कीजिए तो देश की भयावह स्थिति का पता चलता है। यदि 13.39 करोड़ लोगों के एक सामाजिक समूह की कल्पना कीजिए, जो हमारे देश के हैं– जिनमें 21 प्रतिशत मृत हैं। इस संदर्भ में देखें तो हमारे देश के मतदाताओं की मृत्युदर दुनिया के किसी भी समाज से कई गुणा अधिक है।
दूसरी तरफ इसमें से 47 प्रतिशत विस्थापित हो गए, यानि देश की लगभग आधी आबादी विस्थापित हो रही है, और चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी नहीं कर रही है। ऐसा भी नहीं है कि विस्थापित होने के बाद मूल पते के मतदाता पहचान पत्र के रहते हुए इन लोगों ने नए पते पर नया पहचान पत्र बनवाया हो– चुनाव आयोग के अनुसार महज 7 प्रतिशत लोगों के पास दोहरा मतदान पत्र है। किसी को पाताल से भी खोज निकालने का दावा करने वाली सरकार की नाक के नीचे से चुनाव आयोग के अनुसार 22 प्रतिशत लोग लापता हो गए, और सरकार को कुछ पता ही नहीं है।
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आंकड़े केवल मतदाता सूची से संबंधित ही नहीं होते हैं– प्रधानमंत्री मोदी स्वयं संसद से लेकर चुनावी भाषणों तक वर्ष 2021 से लगातार 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त अनाज देने की चर्चा करते रहे हैं। वर्ष 2021 से 2026 तक यह संख्या एक ही रही है। जाहिर है सवाल लाजिमी है कि जब मतदाता मृत होते हैं, लापता होते हैं और विस्थापित हो रहे हैं तब मुफ़्त अनाज के लाभार्थियों की संख्या बिल्कुल एक कैसे हो सकती है? यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी तो इसमें से 25 करोड़ लाभार्थियों को गरीबी से छुटकारा भी दिला चुके हैं पर मुफ़्त अनाज अभी भी उन्हें दिया जा रहा है।
दूसरी तरफ मतदाता सूची से जिनका नाम बिना किसी आधार के काटा जा रहा है उन्हें चुनाव आयोग और मोदी के शब्दों में “लोकतंत्र उत्सव” से बाहर किया जा रहा है। कटे नामों का कोई आधार नहीं है क्योंकि चुनाव आयोग ने स्वयं कहा है कि इसमें जो योग्य पात्र होंगे वे अपना नाम फिर से मतदाता सूची में जुड़वा सकते हैं– जाहिर है कटे नामों में अधिकतर नाम योग्य है, यह चुनाव आयोग भी मानता है।
बीजेपी को यह स्पष्ट पता है कि पिछला चुनाव तो घपले के बाद भी बड़ी मुश्किल से जीता था, अगले चुनाव में घपले और धनबल के बाद भी जीतना असंभव है– इसीलिए चुनाव आयोग ही एकमात्र सहारा है। इसी बलबूते पर अमित शाह अगले चुनाव को जीतने का राग अभी से अलाप रहे हैं। अगले चुनावों में देखना दिलचस्प होगा कि जीत ज्ञानेश कुमार की होती है या फिर देश की जनता गुलामी की जंजीरें तोड़कर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सत्ता परिवर्तन का रास्ता अपनाती है।
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